हिन्दी-लघुकथा के विकास में जिन लघुकथाकारों ने उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह किया है उनमें एक महत्त्वपूर्ण नाम सतीशराज पुष्करणा का भी है। इन्होंने इस विधाके विकास हेतु प्रत्येक संभव पक्ष एवं माध्यम का सार्थक एवं सटीक उपयोग किया है।
मधुदीप के सम्पादकत्व में ‘पड़ाव और पड़ताल’ के 15 खंड प्रकाशित हुए हैं। 16वें खंड से उन्होंने लघुकथा के शीर्षस्थ हस्ताक्षरों को 25वें खंड तक प्रकाशित करने की योजना के अन्तर्गत 22 खंड प्रकाशित किये हैं। यह 22वाँ खण्ड सतीशराज पुष्करणा की 66 लघुकथाओं पर केन्द्रित है। यह पुस्तक 286 पृष्ठों तक पसरी हुई है, जिसमें सम्पादकीय एवं पुष्करणा के परिचय के पश्चात् सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा-यात्रा प्रस्तुत है, जिसमें पुष्करणा ने अपने लघुकथा-लेखनारंभ से अब तक प्रायः प्रमुख कार्यों एवं घटनाओं की सटीक चर्चा की है, जिससे लघुकथा के इतिहास-पक्ष को बल मिलता है।
लघुकथा-यात्रा के पश्चात् पुष्करणा के प्रायः चर्चित 66 लघुकथाएँ हैं जिनसे लघुकथा-जगत् के अतिरिक्त प्रायः सभी पाठक पूर्णरूप से परिचित हैं। इनकी लघुकथाओं की क्रमशः डॉ०शंकर प्रसाद, अनिता ललित, डॉ०ज्योत्स्ना शर्मा और प्रियंका गुप्ता ने काफी गम्भीरता से पड़ताल की है। पड़ताल करने के क्रम में डॉ०शंकर प्रसाद लिखते हैं – डॉ० पुष्करणा के लघुकथा-सृजन में विषय-वैविध्य पर्याप्त मात्रा में है। अतः उन्होंने इस बहाने प्रयोग भी काफी किए हैं। उन्होंने अपनी अनेक लघुकथाओं में अनेक-अनेक उद्देश्यों की पूर्ति कर डाली है ; किन्तु लघुकथा के अनुशासन का अतिक्रमण भी नहीं किया।” वस्तुतः किसी रचनाकार को यही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए ,तभी विधा का विकास संभव हो पाता है। अनिता ललित की दृष्टि में – पुष्करणा जी की लघुकथाओं का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। शायद ही कोई विषय ऐसा होगा ,जो उनकी पारखी निगाह से बचा होगा। समाज और राजनीति से लेकर मानवीय संवेदनाएँ तथा हृदय और मस्तिष्क के उलझते हुए धागों का भी खूबसूरत वर्णन एवं चित्रण आपकी लघुकथाओं में दृष्टिगोचर होता है।” वस्तुतः पुष्करणा जी समाज में आँख-कान खुले रखकर समाज एवं समय का अवलोकन करते हैं और अपने वर्तमान के सच को सही एवं सटीक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। पड़ताल की तीसरे पायदान पर डॉ०ज्योत्स्ना शर्मा तटस्थ पड़ताल करते हुए लिखती हैं, “शीर्षक चयन में पुष्करणा जी बहुत सोच-विचार कर सटीक शीर्षक का चयन करते हैं । यही कारण है कि ‘बोफोर्स काण्ड’, ‘रक्तबीज’, ‘फ़र्ज’ जैसी लघुकथाएँ भ्रष्टाचार पर करारा व्यंग्य करने के साथ-साथ अपने शीर्षक से भी विशिष्ट हैं। ‘कुमुदिनी का फूल’ लघुकथा भी पुरानी मान्यताओं से आगे अपने सुन्दर कथावस्तु और उसके मर्म को अभिव्यक्ति करते शीर्षक से बहुत प्रभावी बन पड़ी है।” डॉ० पुष्करणा की लघुकथाओं में उनके शीर्षक प्रायःअपना औचित्य सिद्ध करते आते हैं और लघुकथा का अभिन्न अंग बन जाते हैं । प्रियंका गुप्ता अपनी पड़ताल के क्रम में डॉ० पुष्करणा की लघुकथाओं के विषय में लिखती हैं-पुष्करणा जी की लघुकथाएँ अपने पाठकों के सामने कभी प्रत्यक्ष, तो कभी परोक्ष रूप से कोई-न-कोई ऐसा सवाल खड़ा कर देती हैं, जिस पर वह सोचने पर मजबूर हो जाता है। बस कुछेक लघुकथाएँ थोड़ी सामान्य रचनाएँ कही जा सकती हैं, पर उनकी संख्या नगण्य ही है। पुष्करणा जी का लघुकथा-संसार बहुत विस्तृत है।” निस्संदेह डॉ०पुष्करणा कथानक के चुनाव में काफी सतर्कता बरतते हैं,ताकि वे अपने उद्देश्य की पूर्ति करते हुए किसी-न-किसी सवाल को खड़ा कर सकें ।
पुस्तक के अन्त में ‘धरोहर’ खंड में डॉ०पुष्करणा का ‘कथादेश’ (सं डॉ०सतीशराज पुष्करणा) 1991 में प्रकाशित लेख ‘हिन्दी-लघुकथा में समीक्षा की समस्याएँ एवं समाधान’ प्रकाशित है जिससे लघुकथाकार का दृष्टिकोण समझने में सुविधा हो सके। डॉ०पुष्करणा ने इस लेख में एक बड़े ही मार्के की बात कही है- “आपकी लघुकथाओं में दम होना चाहिए, फिर चाहे कोई भी, कुछ भी लिखता रहे, कोई अन्तर नहीं पड़ता । समय न्याय करता है और अच्छी रचनाओं से ही लेखक और स्वस्थ समीक्षाओं से ही समीक्षक, साहित्य और साहित्यरूप जीवित रहते हैं।” डॉ० पुष्करणा की यह बात बहुत तथ्यपूर्ण है, जो भावी लेखकों का भी मार्गदर्शन करती है।
कुल मिलाकर मैं यह कहना चाहती हूँ कि ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-22 के संपादक मधुदीप ने सामग्री के चयन में बहुत श्रम किया है और उन्होंने इसे एक श्रेष्ठ कृति बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है ।लघुकथा-शोधकर्ताओं हेतु यह पुस्तक अपना औचित्य सिद्ध करेगी, ऐसा विश्वास किया जा सकता है।
सतीशराज पुष्करणा की 66 लघुकथाएँ और उनकी पड़ताल, संपादक: मधुदीप, प्रकाशकः दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035, संस्करण: 2016, पृष्ठ 286, मूल्य: रु. 500
-0-डॉ० मिथिलेशकुमारी मिश्र,‘वाणी-वाटिका’,सैदपुर, पटना-800 004,मो०: 9430212579