अक्तुबर 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: October 1, 2026

1-क्या सुलूक किया जाए

सभा तनाव में थी। रंग, नस्ल, सूरत-शक्ल, छोटे-बड़े ,खानपान का भेदभाव..सब कुछ आज उनकी साझा नफ़रतों और नाराज़गी  तले दब गया था। सबकी गुस्से भरी निगाहे उस अभियुक्त पर गड़ी हुई थीं जो घेरे के बीचमबीच डरा सहमा खड़ा था। पहले का वक़्त होता, तो राजे-महाराजे एक ही वार में ऐसे दुष्ट अपराधी का काम-तमाम कर देते। पर अब मजबूरी थी। लोकतंत्र था, सो अभियुक्त को क्या दण्ड दिया जाए, जूरी सिस्टम के तहत इसका बहुमत द्वारा फ़ैसला किया जाना जरूरी था। सो यही मशक्क़त चल रही थी।

” हमारी जड़ों पर इसने अट्टालिकाएँ खड़ी कर दीं। हमारे हिस्से की नदियां चीर दीं, हमारे मैदानों पर अपनी सड़कें खींच लीं। हमारे जल जंगल जमीन सब कब्जिया लिये ” किसी ने अपने ज़ख्म सहलाते कहा-“ऊपर से हमे ही मारते भी हैं ये लालची। इसके भी घर-द्वार सब तोड़के..भूखा-प्यासा बांध के कहीं छोड़ देना चाहिए।”

दूसरे के स्वर में अचरज और दुःख दोनों घुलेमिले थे, “कैसी भूख है इसकी बताओ, हमारे बच्चों को तक को निगल जाता ये नीच। लेकिन पेट न भरता। हमारी मानो, तो अंतड़ियाँ बाहर निकाल लो इसकी। “

।कहीं से एक रुंधी आवाज़ आई, “क्यों न हम भी अंट-शंट प्रयोग करें इसपर। दवाइयां,इंजेक्शन, क्रीम ,कैमिकल्स.. सब इसी पर टैस्ट कर डालें। खाल खींच लें इसकी। “

इस तरह मुजरिम को सजा देने के सुझाव लगातार आते गये, उनपर विचार होता रहा। अंत मे जज ने फ़ैसला पढ़ा-  “अपने परिवार के हर भुक्तभोगी से हमें पूरी सहानुभूति है। पर हम इंसान के जैसे नीचे नहीं गिर सकते। जल्द ही प्रकृति ख़ुद इंसानों को कड़ी-से-कड़ी सज़ा देकर हमारा बदला लेने वाली है; इसलिए हमारा न्याय कहता है कि इसे ज़िंदा छोड़ दिया जाए, ताकि ये ख़ुद अपना और अपनी नस्ल का अंत देख सके।”

सबने सहमति जताई। जानवरों की न्यायपालिका ने जंगल के कानून का सम्मान किया था।

-0-

2-जीवन चक्र

रात के दो बज रहे थे। परिवार के सभी लोग नींद में ग़ुम थे। जाग रहे थे तो यदाकदा खंखारते दादाजी, और बरामदे वाली दीवार घड़ी। उस घड़ी में भी तो एक छोटा-सा परिवार बसता था, जिसमे थी शांत स्वभाव वाली सोच समझ कर धीमे-धीमे कदम बढ़ाती घण्टे वाली सुई, थोड़ा उतावला थोड़ा मनमौजी उसका पति मिनट वाला कांटा और चंचल चपल ज़रा भी दम न लेने वाला सेकेंड वाली सुई यानी उनका सपूत। टिकटिक की भाषा मे उनकी आपस मे बातचीत, मेलमिलाप, लड़ना-झगड़ना रूठना मनाना सब हो जाता था। एक दायरे में बंधा उनका रूटीन था, एक लय में चलती थी उनकी ज़िंदगी। इसी से घर के लोगों का भी जीवन बंधा हुआ था । उनका उठना, काम पर, स्कूल बाज़ार या कहीं और को आना-जाना, पढ़ना, सोना और भी न जाने कितने काम थे जो इस घड़ी से ही निर्धारित हुआ करते थे। ख़ास तौर से दादाजी को टहलने जाना हो, टीवी रेडियो पर मनपसंद प्रोग्राम लगाना  हो, सुबह दोपहर शाम की अपनी दवाएं लेनी हो …इसी घड़ी की ओर ताका करते थे।

 पर आज गड़बड़ हो गयी थी। घर के सारे लोग सुबह से किसी फ़ंक्शन में शामिल होने  गए थे,और देर रात लौटकर सीधे बिस्तर पर ढुलक गये थे। पीछे रह गए थे दादाजी ,जो तबियत ठीक न होने की वजह से आंख मूंदे लेटे रहे थे। किसी का ध्यान ही न गया कि दिन में लगातार डिस्चार्ज होता दीवार घड़ी का सैल अब खात्मे की कगार पर है। उनको ख़बर ही नहीं थी कि उन सुइयों की रफ़्तार लगातार सुस्त होती जा रही है, जो सुबह होते-होते शायद थम ही जाये।

तभी इस वक़्त, रात के 2 बजे इनकी मायूसी चरम पर थी। आपस मे 60 डिग्री का कोण बनाये हुए दोनों मातपिता धीरे-धीरे निढाल होते जाते अपने लाड़ले- सेंकेंड वाली सुई को निहार रहे थे। थकावट थी, सांस फूल रही थी, धड़कनें सुस्त होती जा रही थीं, पर अंतिम सांस तक चलना तो था ही। मिनट वाले कांटे को गुस्सा भी आ रहा था। घिसटते हुये वो टिकटिकाया “मतलबी कहीं के! जब अपने दादाजी की जरूरतें भूल जाते हैं,तो भला हमारा सैल चैक करते रहना याद क्या रखेंगे। हुंह “

घण्टे वाली सुई ने उसे ढांढस बंधाते हुए नज़दीक हाँफते हुए आते बेटे को थपथपाकर आगे को ठेल दिया। ज़िंदगी की इस जद्दोजहद पर हावी होती जा रही हताशा के बीच  कितना वक़्त और बीता,  कहना मुश्किल था। जाने कितनी देर से मिनट और घण्टे वाली सुइयों की मुलाकात हुई ही नहीं थी। सेकेंड बेचारा भी अब दूर कहीं बस कंपकंपा रहा था। तय था कि अब कोई भी पल उनका आख़िरी हो सकता था। भरी आँखों और डूबते मन से वो बस एकदूसरे को देख रहे थे.. कि तभी एक जानीपहचानी आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया।

वो आवाज़ थी छड़ी की खटखट और चप्पलों की घिसिर-घिसिर की, जो उनके नज़दीक आती जा रही थी। साथ ही दादाजी की जोरदार पुकार भी “ओहो वही मैं कहूँ, आज योगा करने को देर कैसे हो गई। अरे कोई फ़टाफ़ट घड़ी नीचे उतारो तो…नया सैल लगा दूं “

-0-

3- वापसी

“सुनिए, जरा अम्मा बाबूजी से बात कर लीजिए”- ऑफिस से लौटे रमन का बैग लेते हुए रजनी बोली।

“क्या हुआ?”

“अरे, फ़िर से वो वापस जाने को कह रहे हैं।”

” अच्छा। तुम उन्ही के कमरे में चाय ले आओ, साथ पीते हुए बात भी कर लूँगा।”

चार कप चाय लेकर रजनी गेस्ट रूम में ही चली गई। टीवी की आवाज कम कर दी। और बात शुरू करते हुए बोली-“लगता है, हमारे साथ रहना अच्छा नहीं लग रहा आप लोगों को। तभी गाँव वापस जाने को कह रहे हैं…”

“अरे…ना रजनी बहूरानी…”

” सुनो अम्मा, वहाँ बिजली पानी की कितनी समस्या है। डॉक्टर मिलना मुश्किल हो जाए अगर तबियत खराब हो जाए। जाने क्यों आपने रट लगा रखी है जाने जाने की, बताइए?

“ये बात ना है बेटा…हम तो बस ऐसे ही…”

” अच्छा बाबूजी आप ही देखिए न,  यहाँ दसवें माले पर बना ये साफ़ सुथरा फ़्लेट। गाँव में तो आँगन ही  बुहारे बुहारे दाई की  कमर दोहरा जाती है और बरसात में साँप बिच्छू का खतरा अलग। यहाँ आपको तकलीफ क्या है, मुझे बताइए?

“अरे मोर बहुरिया,बिटवा…तकलीफ कोई नाय है हम लोगन को इहाँ पर। तुम लोग खूब  ख्याल भी रखे हो हमारा…”

“फिर क्या बात है?

“वो ….यहाँ की लिफ्ट…बड़ी सँकरी है….

“लिफ्ट?? तो उससे क्या?”

“अरे तुम बताए रहे न कि यहां शिफ्ट होते समय अलमारी तक को भी इन्ही चक्करदार सीढ़ियों से ही ऊपर लाना पड़ा था…”

“हाँ..”.

“बेटा, हमार अर्थी भी ऐसे ही नीचे ले जाहियो का? वो भी सीधे सड़क पर? उन घुमावदार सीढ़ियों से नीचे देखने पर  हमको तो वैसे ही चक्कर आवें हैं। न बाबा न! हमे तो वापस अपने गाँव छोड़ ही आओ….

-0-

4-कुछ यूँ बदला फिर मौसम

सोफे पर पसरे पतिदेव ने पोज़िशन बदली, और मोबाइल के की पैड पर दोगुनी रफ़्तार से उँगलियां दौड़ाने लगे। लाख कोशिशों के बाद भी न उनकी उठती गिरती साँसें काबू में आ रही थीं और न ही होठों पर फैलती खुराफ़ाती मुस्कान- “अरे भई, .. कहाँ हैं तुम्हारी पकौडियाँ?” की बीच-बीच मे हाँक लगाते हुए वो खोजी निग़ाहें इधर-उधर भी डाल लेते थे, ताकि  “क्यों जी, किससे चैट हो रही है ? ऐसे तो हम चाहें जियें-मरें…देखने की भी फुर्सत नहीं। लेकिन वैसे देखो, लगे पड़े हैं किसी निगोड़ी से….आग लगे…वरना दिखाइए हमें फोन ?” की गरज और चमक के बाद होने वाली आँसुओं की बौछार से पहले ही यहाँ का मामला समेटा जा सके।

लेकिन आज उन्हें ऑफिस से लौटकर फोन को दुलारते काफी देर हो चुकी थी। मगर टीवी से आती- “नेशन वांट्स टू नो” की दहाड़ के अलावा…कमरे में अभूतपूर्व शांति थी। हैरानी से उन्होंने फिर पोज़िशन बदली और ग़ौर से दूर कुर्सी पर बैठी पत्नी  की तरफ देखा। अचानक उनकी आँखों मे बिजली लहरा गई…सारा मानसूनी रोमांस कलेजे में अटक  गया। पत्नी जी का पूरा ध्यान..उनके अपने मोबाइल पर था। उनकी साँसें कुछ बेतरतीब-सी थीं …और उनके होंठ रहस्यमय अंदाज़ में फैलकर सिकुड़े जा रहे थे…

-0-

5- सबक/ छवि निगम

ऋचा के कमरे से बाहर आते ही नीरव दाँत पीसते हुए बुदबुदाया, “ये अंदर मैथ्स की ट्यूशन ले रही थीं या इन हाईस्कूल के स्टूडेंट्स का दिमाग खराब कर रही थीं, हैं!”

ऋचा की आवाज शांत थी, “क्लास खत्म करके पाँच मिनट तो मैं बच्चों से रोज बात करती ही हूँ; लेकिन आज अचानक आकर आपने ऐसा क्या सुन लिया?”

नीरव और झल्ला गया, “अरे उनको ये सब खबरें-वबरें बाँचना… और क्या ! और ये सब वाहियात उलटी-सीधी सुर्खियाँ.. ये सब डिटेल उन्हें बताने की जरूरत ही क्या है? जरा ये तो सोचो तुम हमारे राहुल और पीयूष को भी तो साथ पढ़ाती हो। क्या असर पड़ेगा उन पर?”

ऋचा ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा, “असर ये पड़ेगा कि मेरे सारे विद्यार्थियों की तरह वे भी संवेदनशील बनेंगे। कल ये सब खौफनाक सुर्खियाँ ही गायब हो जाएँ, इसके लिए मैं आज को सुधार रही हूँ। मैं उन्हें लड़कियों की इज्जत करना, उनकी तकलीफ महसूस करना सिखा रही हूँ, बस।”

नीरव के पंजे का दबाव उसकी बाँहों पर बढ़ता चला जा रहा था- “बंद करो ये सब बकवास…” आगे कुछ कहते हुए अचानक वह खड़ा का खड़ा रह गया। उसका हाथ नीचे गिर गया। सामने बैग टाँगे हुए उसका बेटा राहुल खड़ा उसे एकटक देख रहा था और नीरव पहली बार उससे नजरें नहीं मिला पा रहा था।

-0-

6-खिड़की

शाम की खिड़की खुली। ट्रे सजाकर कमरे के अंदर लेकर आती विभा के हाथ अचानक कांप गये। ऑफिस से लौटकर सोफे पर पसरे अजय के हाथों में इस वक्त विभा का ही फ़ोन था , किसकी स्क्रीन पर नज़रें  गड़ाए  उसकी त्यौरियाँ चढ़ती चली जा रही थीं। हाथों पर महसूस होती गर्म चाय की छीटों की जलन के बावजूद विभा ने अपनी चिंता छिपाने को एक झूठी मुस्कुराहट ओढ़ ली, जो अगले ही पल अजय की तेज चिल्लाहट से गायब भी हो गई।

“ये क्या ऊटपटाँग  लिखके पोस्ट करती रहती हो तुम !! हैं ? और ये लोग कौन हैं ,जो वाह वाह लिखे डाल रहे हैं ? बन्द करो ये सब फ़ौरन !समझीं ?

विभा ने कुछ हिम्मत बटोरी- ” वो…कविता…लिखी थी…बस .”

अच्छा!!” अजय की आवाज़ ज्यादा तेज थी या फर्श पर पटक दिए गए कप के टूटने की खनक… बताना मुश्किल था। फिर भी झुककर टुकड़े बीनती विभा की कराह उसे सुनाई पड़ ही गई ,”…ख़ुद तो अपने फ़ोन को खोलने का…पासवर्ड तक नहीं…बताते…और…हमें…!”

सोफे से उठते अजय के चेहरे पर सोशल मीडिया का आभासी सभ्यता का मुखौटा चटखने लगा था।

खिड़की बन्द हो चुकी थी।

सम्पर्क-डॉ छवि निगम,503, हर्षित अपार्टमेंट,ए पी सेन रोड, चारबाग़, लखनऊ-226001

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine