हिंदी साहित्य की आधुनिक विधाओं में लघुकथा ने बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान बना ली है। यह आकार में छोटी होती है; लेकिन अपने विषय और असर के लिहाज से बहुत बड़ी होती है। लघुकथा जीवन की घटनाओं, विसंगतियों, अनुभवों या मानवीय स्थितियों को बहुत कम शब्दों में असरदार तरीके से पेश करती है। इसकी असली ताकत इसके विस्तार में नहीं, बल्कि इसके संकेत, गहराई और छिपे हुए अर्थों में होती है।
आज के समय में लोगों के पास समय कम है; ; लेकिन उनके सामने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक सवाल बहुत हैं। ऐसे माहौल में लघुकथा किसी एक छोटे से दृश्य के जरिए बड़े मुद्दे दिखा सकती है। इसी वजह से हिंदी में लघुकथा को न सिर्फ एक साहित्यिक विधा के रूप में, बल्कि आज की सामाजिक सोच की मजबूत अभिव्यक्ति के रूप में भी अहम जगह मिली है।
मीनू खरे की लघुकथा ‘प्राइमरी स्कूल’ इस परंपरा की एक खास मिसाल है। यह लघुकथा बहुत छोटी है ; लेकिन इसमें सरकारी स्कूलों की हालत, निजी स्कूलों की होड़, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव, ईर्ष्या, संस्थागत दमन और एक आदर्श शिक्षक के टूटते सपनों को एक साथ दिखाया गया है। इव्यंग्यपूर्ण अंत पाठक को हँसाने के बजाय सोचने पर मजबूर कर देता है।
मीनू खरे की ‘प्राइमरी स्कूल’ एक अत्यंत संक्षिप्त, संवादप्रधान और व्यंग्यात्मक लघुकथा है। कथा की शुरुआत ही एक तनावपूर्ण परिस्थिति से होती है। प्राइमरी विद्यालय की प्रिंसिपल के मोबाइल पर अचानक बेसिक शिक्षा अधिकारी का फोन आता है। वह घबरा जाती हैं और अत्यंत सम्मानपूर्वक बातचीत शुरू करती हैं।
इसके बाद प्रिंसिपल अपने स्कूल की उपलब्धियाँ बताती हैं: सौ प्रतिशत रिजल्ट, अच्छी उपस्थिति, बढ़ते दाखिले, बच्चों की अंग्रेजी बोलने की क्षमता, खेल और भाषण प्रतियोगिताओं में सफलता, और यहाँ तक कि निजी स्कूलों से बच्चे सरकारी स्कूल में आ रहे हैं।
इन उपलब्धियों को सुनकर लगता है कि शिक्षा-व्यवस्था में कुछ अच्छा बदलाव आया है; लेकिन अधिकारी हर बार सिर्फ एक शब्द “हम्म!” कहकर जवाब देता है।
यहीं से कथा में वास्तविक तनाव उत्पन्न होता है।
प्रिंसिपल के लिए स्कूल की सफलता गर्व की बात है; लेकिन अधिकारी के लिए यही सफलता अब एक गलती बन गई है। उस पर आरोप है कि वह निजी स्कूलों के खिलाफ माहौल बना रही हैं। अधिकारी इशारा करता है कि निजी स्कूल के पीछे ताकतवर लोग हैं और उसकी नौकरी भी जा सकती है। फिर आदेश मिलता है, “आप सिर्फ़ मिड-डे मील पर ध्यान दें, बाकी समय आराम करें।” लघुकथा का आखिरी वाक्य पूरे सिस्टम पर सीधा तंज करता है, ‘प्रिंसिपल ने खाली समय में परचून की दुकान खोल ली।’
यह अंत लघुकथा को एक साधारण शिक्षा-कथा से ऊपर उठाकर पूरे सिस्टम पर कटाक्ष करने वाली व्यंग्य कथा बना देता है।
लघुकथा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष शिक्षा-व्यवस्था पर उसका प्रश्न है। प्रिंसिपल ने जिन उपलब्धियों का उल्लेख किया है, वे वास्तव में किसी भी सरकारी विद्यालय के लिए गौरव की बात होनी चाहिए—परिणाम शत-प्रतिशत है। उपस्थिति अच्छी है। दाखिले बढ़ रहे हैं। बच्चे अंग्रेजी बोल रहे हैं। खेलों में सफलता मिल रही है। भाषण प्रतियोगिताओं में विद्यालय आगे है। निजी विद्यालयों से बच्चे सरकारी विद्यालय में आ रहे हैं। अर्थात विद्यालय अपने घोषित उद्देश्य में सफल है ; लेकिन यही सफलता व्यवस्था के लिए असहज हो जाती है।
यहाँ लेखिका शिक्षा के एक बड़े संकट की ओर ध्यान दिलाती हैं। क्या सिस्टम सच में अच्छी सरकारी शिक्षा चाहता है, या बस सरकारी स्कूलों को औपचारिकता तक सीमित रखना चाहता है?
लघुकथा इस सवाल का सीधा जवाब नहीं देती, बल्कि बस हालात को सामने रखती है। यही इसकी खासियत है।
कथा का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष सरकारी और निजी विद्यालयों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। प्रिंसिपल का सपना है—“सरकारी विद्यालय पब्लिक स्कूल से बेहतर हों।” यह वाक्य उनके चरित्र की मूल आकांक्षा को स्पष्ट करता है। वह व्यवस्था से लड़ने वाली कोई राजनीतिक पात्र नहीं, बल्कि अपने विद्यालय को बेहतर बनाने के लिए काम करने वाली एक आदर्शवादी शिक्षिका हैं।
उनकी नज़र में निजी स्कूल की खासियत अंग्रेजी, प्रचार और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी है। वे अपने स्कूल में बच्चों की अंग्रेजी सुधारने पर ध्यान देती हैं, जिससे अभिभावक सरकारी स्कूल की ओर आकर्षित होते हैं। इसी से बाजार और शिक्षा का रिश्ता सामने आता है। लघुकथा दिखाती है कि जब शिक्षा कारोबार और ताकतवर लोगों से जुड़ जाती है, तो अच्छी सरकारी शिक्षा उनके लिए चुनौती बन जाती है।
कथा की शिल्पगत उपलब्धियों में अधिकारी का बार-बार कहना, “हम्म्म!”, खास तौर पर ध्यान देने लायक है। प्रिंसिपल उपलब्धियाँ बताती जाती है और अधिकारी बस “हम्म्म!” कहता है।
यह “हम्म्म!” कई तरह के मतलब देता है। इसमें अविश्वास, असंतोष, उपेक्षा, साजिश की तैयारी, सत्ता की चुप्पी, उपलब्धियों के प्रति बेरुखी और छुपी चेतावनी शामिल हैं। लघुकथा में यह छोटा सा शब्द पूरे प्रशासन की सोच को दिखा देता है। यहाँ लेखिका ने लंबा विवरण नहीं दिया, बल्कि बार-बार संवाद दोहराकर किरदार को सामने रखा है। यही लघुकथा की गहराई है।
कथा का सबसे तीखा व्यंग्य उस बिंदु पर आता है, जहाँ अधिकारी कहता है, “पब्लिक स्कूल किसका है, पता है? नहीं न? इतने बड़े लोगों का स्कूल ठप्प करके नौकरी कर पाएँगी आप?” यह संवाद लघुकथा के सत्ता-विमर्श का केंद्रीय बिंदु है।
यहाँ ‘बड़े लोग’ केवल कुछ व्यक्तियों का संकेत नहीं हैं। वे उस पूरे सत्ता-तंत्र का प्रतीक बन जाते हैं, जिसमें राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक शक्तियाँ परस्पर जुड़ी होती हैं। प्रिंसिपल की काबिलियत और स्कूल की सफलता की तुलना उन ताकतवर हितों से होती है, जिनके सामने ईमानदारी भी गुनाह बन जाती है। इस तरह लघुकथा का संघर्ष सिर्फ सरकारी और निजी स्कूलों के बीच नहीं रहता, बल्कि ईमानदार मेहनत और ताकतवर स्वार्थों के बीच हो जाता है।
प्रिंसिपल का चरित्र कथा का सबसे मानवीय पक्ष है। उन्होंने विद्यालय को बेहतर बनाने का सपना देखा। उन्होंने बच्चों की अंग्रेजी पर काम किया, खेल और भाषण प्रतियोगिताओं में उन्हें आगे बढ़ाया और विद्यालय में दाखिले बढ़ाए। उनका सपना बहुत सीधा है: “सरकारी विद्यालय पब्लिक स्कूल से बेहतर हों।” यही बात उनके किरदार को ऊँचा बनाती है ; लेकिन सिस्टम उनके सपने को अपनाने के बजाय उसे दबा देता है। उन्हें कहा जाता है कि वे बस मिड-डे मील पर ध्यान दें और बाकी काम छोड़ दें।
यानी सिस्टम उन्हें एक शिक्षिका से प्रबंधक, फिर औपचारिक कर्मचारी और आखिर में एक निष्क्रिय इंसान बना देता है।
‘मिड-डे मील’ कथा में केवल विद्यालय की एक योजना नहीं है। लघुकथा के संदर्भ में यह एक प्रतीक बन जाता है। जब शिक्षा, गुणवत्ता, खेल, भाषा और प्रतिभा-विकास जैसी जरूरी चीजों को छोड़कर स्कूल को सिर्फ खाने के वितरण तक सीमित कर दिया जाता है, तो सिस्टम की प्राथमिकताओं पर सवाल उठता है। लेखिका का व्यंग्य पूछता है कि क्या स्कूल का मकसद सिर्फ बच्चों को खाना देना है, या उन्हें ज्ञान, हुनर, आत्मविश्वास और अच्छा भविष्य देना भी है?
इसी बिंदु पर लघुकथा का सामाजिक सरोकार सर्वाधिक स्पष्ट रूप में प्रकट होता है।
लघुकथा का अंतिम वाक्य— ‘प्रिंसिपल ने खाली समय में परचून की दुकान खोल ली।’ —अत्यंत प्रभावशाली है। यहाँ कथा समाप्त नहीं होती; बल्कि पाठक के भीतर शुरू होती है।
एक शिक्षिका, जो स्कूल को बेहतर बनाने का सपना देखती थी, अब काम न होने की वजह से परचून की दुकान खोल लेती है। यह हालत इतनी अजीब है कि पाठक पहले मुस्कराता है, फिर उसकी विडंबना समझता है और आखिर में सिस्टम की गंभीरता तक पहुँचता है। यहाँ मजाक के पीछे दुख और व्यंग्य के पीछे गुस्सा छुपा है। उत्तम लघुकथा के अंत की यही विशेषता है कि उसका अंतिम वाक्य कथा को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसके अर्थ को विस्तार देता है।
‘प्राइमरी स्कूल’ असल में समाज और प्रशासन पर तंज कसने वाली लघुकथा है। लेखिका ने लंबा भाषण देने या सीधी टिप्पणी करने के बजाय हालात ऐसे दिखाए हैं कि सिस्टम खुद ही मजाक और विडंबना का कारण बन जाता है। .प्रिंसिपल को पुरस्कार के बजाय चेतावनी मिलती है। 2. शिक्षा का अवमूल्यन, शिक्षा की गुणवत्ता से ज्यादा महत्त्व ‘मिड-डे मील’ को दिया जाता है। 3. ईमानदारी की विडंबना, प्रिंसिपल ने अच्छा काम किया; लेकिन वही काम उनके लिए संकट बन गया। 4. सत्ता का संरक्षण मिलने पर, शक्तिशाली निजी हितों के सामने सरकारी तंत्र झुक जाता है। 5. निष्क्रियता की संस्कृति, काम करने वाले व्यक्ति को काम न करने की सलाह दी जाती है।
इन सभी स्तरों का संक्षिप्त समन्वय कथा की प्रभावशीलता को बढ़ाता है।
भाषा और शैली की बात करें तो लघुकथा की भाषा आसान, बोलचाल की है और संवादों पर टिकी हुई है। इसमें फालतू सजावट नहीं है। अधिकारी और प्रिंसिपल की बातचीत से सामान्य प्रशासनिक माहौल बनता है। “सर”, “हम्म्म”, “समझी नहीं सर!”, “फिर हम क्या करें?” जैसे छोटे संवाद किरदारों की मनःस्थिति को साफ दिखाते हैं।
विशेष रूप से, कथा में संवाद ही कथानक को आगे बढ़ाते हैं। खास बात यह है कि लघुकथा में संवाद ही कथानक को आगे बढ़ाते हैं। लघुकथा की भाषा के लिए यह जरूरी है कि जितनी संश्लिष्ट और सीधी भाषा हो, उतना ही अर्थ साफ होता है। इसमें कथानक-संयम है। इसमें कोई अनावश्यक उपकथा नहीं है। पूरी रचना एक फोन-कॉल के इर्द-गिर्द घूमती है।
लघुकथा की शुरुआत अधिकारी के फोन से होती है। बीच में स्कूल की उपलब्धियाँ और शिकायतें आती हैं। चरम पर नौकरी जाने की धमकी मिलती है। अंत में मिड-डे मील और परचून की दुकान का जिक्र आता है। इस पूरी रचना में शुरुआत से अंत तक तनाव बढ़ता जाता है। पाठक को नतीजे का थोड़ा अंदाजा हो सकता है ; लेकिन ‘परचून की दुकान’ वाला अंत फिर भी तगड़ा व्यंग्य है।
आलोचनात्मक नज़रिए से देखें तो लघुकथा में यथार्थ और अतिशयोक्ति का सवाल उठ सकता है। क्या कोई सरकारी अधिकारी इतनी साफ भाषा में निजी स्कूल के पक्ष में सरकारी स्कूल की प्रधानाध्यापिका को चुप बैठने का आदेश सच में दे सकता है? लघुकथा का जवाब उसके असली दस्तावेजी रूप में नहीं, बल्कि उसके व्यंग्यात्मक यथार्थ में छिपा है।
यह किसी एक अधिकारी की घटना कायह किसी एक अधिकारी की असली घटना नहीं है, बल्कि उस सोच का प्रतीक है, जिसमें ताकतवर हितों के सामने सरकारी संस्थाओं की सफलता परेशानी बन जाती है। इसलिए इसे पत्रकारिता की रिपोर्ट की तरह नहीं, बल्कि साहित्यिक व्यंग्य की तरह पढ़ना चाहिए। समकालीन प्रासंगिकता की बात करें तो ‘प्राइमरी स्कूल’ आज भी इसलिए अहम है; क्योंकि शिक्षा पर लगातार बाजार, राजनीति, प्रशासन और सामाजिक प्रतिष्ठा का दबाव रहता है।आज भी अनेक चुनौतियाँ हैं—संसाधन, शिक्षक-उपलब्धता, अभिभावकों की बदलती प्राथमिकताएँ, अंग्रेजी माध्यम की सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी विद्यालयों का आकर्षण। ऐसे वातावरण में यदि कोई सरकारी विद्यालय गुणवत्ता के बल पर बच्चों और अभिभावकों को आकर्षित करता है, तो वह केवल एक विद्यालय की सफलता नहीं; बल्कि सार्वजनिक शिक्षा की क्षमता का प्रमाण है।
यही कारण है कि कथा का मूल प्रश्न आज भी जीवित है। क्या व्यवस्था उन संस्थाओं को सचमुच मजबूत करना चाहती है, जिन्हें जनता के लिए बनाया गया है?
हिंदी लघुकथा की विकास-यात्रा भारतीय कथा-परंपरा की लघु कथात्मक अभिव्यक्ति से आधुनिक सामाजिक यथार्थ की तीक्ष्ण और स्वतंत्र साहित्यिक विधा तक पहुँचने की यात्रा है। आधुनिक समय में लघुकथा ने जीवन की उन विसंगतियों को स्वर दिया है , जिन्हें विस्तार से लिखने की अपेक्षा एक छोटे-से दृश्य, संवाद या घटना में अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया जा सकता है।
मीनू खरे की ‘प्राइमरी स्कूल’ इसी लघुकथा-परंपरा की एक सार्थक रचना है। यह सरकारी शिक्षा-व्यवस्था की विडंबना को केवल शिक्षा के प्रश्न के रूप में नहीं; बल्कि सत्ता, बाजार, प्रशासन और ईमानदार कर्म के अंतः सम्बन्ध के रूप में प्रस्तुत करती है।
प्रिंसिपल का सपना, यानी सरकारी स्कूल को निजी स्कूल से बेहतर बनाना, असल में सार्वजनिक शिक्षा पर भरोसे का सपना है; लेकिन सिस्टम उसे बढ़ावा देने के बजाय उसे निष्क्रिय बना देता है। ‘मिड-डे मील’ तक सीमित कर देना शिक्षा के मकसद के छोटे हो जाने का प्रतीक है और ‘परचून की दुकान’ खोलना उस सिस्टम पर आखिरी तंज है, जिसने एक मेहनती शिक्षिका की ऊर्जा को बेकार कर दिया।
इस लघुकथा की सबसे बड़ी उपलब्धि सबसे बड़ी खासियत यह है कि लघुकथा छोटी है; लेकिन इसका सामाजिक मतलब बहुत बड़ा है। पाठक इसे पढ़कर सिर्फ शिक्षा-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि उस सोच पर भी सोचने को मजबूर होता है, जिसमें कभी-कभी सफलता, ईमानदारी और गुणवत्ता ताकतवर स्वार्थों के लिए खतरा बन जाती हैं। एक विद्यालय की लघुकथा नहीं है; यह उस व्यवस्था की लघुकथा है, जिसमें पढ़ाने वाले को पढ़ाने से, मेहनत करने वाले को मेहनत से और सार्वजनिक संस्था को उत्कृष्ट बनने से रोका जा सकता है।
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लघुकथा हिंदी साहित्य की एक सशक्त और प्रभावशाली गद्य विधा है, जिसमें सीमित शब्दों में गहन संवेदना, तीक्ष्ण प्रभाव और जीवन के किसी सत्य या विसंगति को संप्रेषित किया जाता है। इसमें विस्तार या वर्णन की बजाय संकेत, संक्षिप्तता और गूढ़ता को महत्व दिया जाता है। पात्रों का चरित्र उनके व्यवहार, संवाद और क्रियाओं के माध्यम से उभरता है, न कि विस्तारपूर्ण विवरणों से। लघुकथा अनावश्यक पृष्ठभूमि या प्रसंग के बिना तात्कालिक विषयवस्तु की ओर बढ़ती है, और उसका अंत अकसर पाठक को चौंकाता है या सोचने के लिए विवश करता है।
इन्हीं कसौटियों पर छवि निगम की ‘फाँक लघुकथा’ एक प्रभावशाली और संवेदनशील लघुकथा है। यदि यथार्थवाद (Realism) के दृष्टिकोण से इसका विश्लेषण किया जाए, तो यह लघुकथा समकालीन सामाजिक यथार्थ, बुजुर्गों की उपेक्षा और पारिवारिक संबंधों के बदलते स्वरूप को अत्यंत सहजता और बिना किसी अलंकरण के प्रस्तुत करती है। पात्र, संवाद और घटनाएँ पाठक के अपने अनुभवों से सीधे जुड़ते प्रतीत होते हैं।
इस लघुकथा की बाह्य घटना अत्यंत साधारण है—बेटा घर लौटता है, आम की खुशबू फैलती है। वृद्ध माँ मासूमियत से पूछती हैं, “दशहरी ले आए क्या?”
बहू का तटस्थ उत्तर, “नहीं तो अम्मा!” और कमला जी का बहू को आम का झोला लेकर अंदर जाते हुए देखना—यह दृश्य कथा में एक गहरा मोड़ लाता है। लेखिका ने नाटकीयता या बड़े संघर्ष के स्थान पर छोटी घरेलू घटना के माध्यम से पारिवारिक संबंधों की विडंबना और संवेदनहीनता को सशक्त स्वर दिया है। इसी साधारण-सी घटना में बुजुर्गों की उपेक्षा, पारिवारिक असमानता, संवेदनहीनता और माँ के अकेलेपन की गहन व्यथा छिपी है। कमला जी को आम की एक फाँक चाहिए—उनकी पीड़ा केवल आम न मिलने की नहीं, बल्कि अपने ही घर में अपनेपन और स्नेह से वंचित रहने की है।
‘फाँक’ शीर्षक बहुपरत वाला और सार्थक है। आरंभ में यह आम की एक फाँक के रूप में सामने आता है, जिसे कमला जी पाना चाहती हैं; किंतु कथा के क्रम में इसका अर्थ और भी गहराता और व्यापक होता जाता है।
“उनका दिल जैसे दो फाँक हो गया।” यहाँ ‘फाँक’ केवल फल का टुकड़ा नहीं, बल्कि माँ और परिवार के मध्य बढ़ती भावनात्मक दूरी का भी प्रतीक है। एक छत के नीचे रहते हुए भी परिवार भावनात्मक रूप से विभाजित है। अंत में अतीत से आती पुकार “बस एक फाँक…” इस शीर्षक की गहराई और मार्मिकता को चरम पर पहुँचा देती है।
लघुकथा में पात्रों की संख्या सीमित है; परंतु कमला जी का चरित्र जीवंत और अत्यंत प्रभावशाली है। वे ऐसी बुजुर्ग माँ हैं, जो स्वयं को परिवार पर बोझ नहीं बनने देना चाहतीं—सक्रिय रहती हैं, छोटे-छोटे कार्यों में लगी रहती हैं, और बहू-बेटे की बातों का निर्विवाद पालन करती हैं। इसके बावजूद न उन्हें स्वाद मिलता है, न ही स्नेह, न ही अपनापन।
“अम्माजी ज़रा साग साफ कर दीजिए… मुन्ने की मालिश तो और कोई कर ही नहीं सकता…” इन संवादों से बहू का चरित्र प्रत्यक्ष रूप में न आकर उसके व्यवहार के माध्यम से सामने आता है। वह कमला जी की उपयोगिता को तो स्वीकारती है; किंतु उनकी भावनाओं और इच्छाओं के प्रति असंवेदनशील बनी रहती है। यही सामाजिक विडंबना इस कथा का केंद्रीय संदेश है।
इस लघुकथा का शिल्प अत्यंत सधा हुआ, संयमित और स्वाभाविक है। कथा में कहीं भी विषयांतर नहीं आता, बल्कि आम की खुशबू से शुरू होकर आरामकुर्सी और अंतिम स्मृति तक एक ही भावधारा में प्रवाहित होती है। संवाद, आत्मालाप, स्मृति और प्रतीक—इन सभी शिल्प-उपकरणों का अत्यंत प्रभावशाली और संतुलित उपयोग किया गया है। विशेष रूप से कमला जी के मन में उठने वाले प्रश्न—“ठीक है, माना कि उनकी शुगर ज्यादा है…”
यहाँ उनके मन की छिपी हुई शिकायत को सशक्त अभिव्यक्ति मिली है। आत्मालाप से कथा को गहराई और मनोवैज्ञानिक आयाम प्राप्त होते हैं। भाषा अत्यंत सरल, घरेलू और संवादात्मक है। “अं… आँ…”, “नहीं तो अम्मा!”, “बस एक फाँक…” जैसे स्वाभाविक संवाद कथा को यथार्थता से जोड़ते हैं और भावनाओं को पाठक तक सीधे संप्रेषित करते हैं।
लघुकथा का सबसे प्रभावी प्रतीक बेंत की आरामकुर्सी है, जो कबाड़ में पड़ी हुई कमला जी के अतीत, माँ होने के गौरव और वर्तमान उपेक्षा का प्रतीक बन जाती है। एक ओर आम की सुगंध और दूसरी ओर बेस्वाद भोजन—ये दोनों बिंब मिलकर कथा की संवेदना को गहराई से रेखांकित करते हैं। आम स्वाद, इच्छा और स्नेह का प्रतीक है, जबकि लौकी-तरोई और पतली दाल कमला जी के शेष जीवन की नीरसता और उपेक्षा का संकेत बन जाते हैं।
इस लघुकथा की सबसे बड़ी विशेषता उसका मौन और मार्मिक अंत है। कमला जी भीतर जाकर न तो शिकायत करती हैं, न ही कोई विवाद खड़ा करती हैं। वे चुपचाप आरामकुर्सी देखकर लौट आती हैं और उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। उसी क्षण अतीत की पुकार उन्हें भीतर तक झकझोर देती है।
“ज़रा-सा दे दो बहूरानी… बस एक फाँक…”—यह संवाद अंत में पाठक को अचानक अतीत की स्मृति में ले जाता है और कथा के अर्थ को अत्यंत व्यापक बना देता है। यहाँ पाठक समझता है कि कमला जी जिस ‘फाँक’ के लिए व्याकुल हैं, वह केवल आम का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस स्नेह और अपनत्व की प्रतीक है, जिसे उन्होंने कभी अपने हाथों से किसी और को दिया था, और जिसकी वे आज स्वयं आकांक्षी हैं। यहीं कथा अपनी चरम भावुकता और जीवन-सत्य को छू जाती है।
वृद्ध माँ की उपेक्षा को लेखिका ने उपदेश या नैतिकता के स्थान पर आम की एक फाँक के प्रतीक से अत्यंत संप्रेषणीय बना दिया है। शीर्षक, कथा, प्रतीक, संवाद, मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति और समापन—ये सभी तत्त्व आपस में गहराई से जुड़े हैं एवं कथा की प्रभावशीलता को चार-चाँद लगाते हैं।
उल्लेखनीय है कि ‘आम की फाँक’ से ‘दिल की फाँक’ और आगे ‘रिश्तों की फाँक’ तक अर्थ का विस्तार छवि निगम की इस लघुकथा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह कथा पाठक से यह गहन प्रश्न करती है—क्या वृद्ध माता-पिता के लिए केवल दवाइयाँ, भोजन और घर में स्थान पर्याप्त है या उनके लिए थोड़ी-सी इच्छा, स्वाद और अपनापन भी उतना ही आवश्यक है? यही प्रश्न पाठक के मन में देर तक गूंजता है—और यही एक सफल लघुकथा की पहचान है।
समकालीन समाज में जहाँ संयुक्त परिवारों का विघटन और व्यस्त जीवनशैली ने मानवीय रिश्तों को प्रभावित किया है, वहाँ ‘फाँक’ जैसी लघुकथाएँ हमारे समय की सच्चाइयों को उजागर करती हैं। बुजुर्ग माता-पिता प्रायः अपने ही घर में अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार होते हैं, भले ही उनकी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी की जा रही हों। ‘फाँक‘ उन तमाम लघुकथाओं का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ भावनात्मक जुड़ाव और आत्मीयता की जगह केवल औपचारिक जिम्मेदारी शेष रह जाती है। इस दृष्टि से छवि निगम की यह लघुकथा आज के सामाजिक परिवेश में अत्यंत प्रासंगिक है और हमें अपने संबंधों की आत्मिक गुणवत्ता पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है।
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1-प्राइमरी स्कूल / मीनू खरे
अपने मोबाइल पर एकाएक बेसिक शिक्षा अधिकारी का नम्बर देख प्राइमरी विद्यालय की प्रिंसिपल हड़बड़ा गईं। खड़े होकर फ़ोन रिसीव किया, “प्रणाम सर!”
बी.एस.ए. महोदय बोले, ‘‘कैसा चल रहा है विद्यालय?”
“सर हमारा रिजल्ट सौ प्रतिशत रहा। अटेंडेंस भी टॉप रही। सर दाखिले भी पिछले साल से दोगुने हुए।”
“हम्म्म!”
“सर हम पब्लिक स्कूल से सिर्फ़ अंग्रेज़ी में पिछड़ते थे; पर हमने बच्चों के अंग्रेजी बोलने पर भी मेहनत की, जिससे हमारे बच्चे भी अब अंग्रेज़ी बोल रहे हैं। लोग अपने बच्चों को हमारे स्कूल में ख़ूब डाल रहे हैं।”
“हम्म्म”
“सर हम खेल और भाषण- प्रतियोगिता में ज़िला स्तर पर टॉप हुए हैं। कुछ बच्चे तो पब्लिक स्कूल छोड़कर हमारे यहाँ आए हैं सर। यही मेरा सपना था कि सरकारी विद्यालय पब्लिक स्कूल से बेहतर हों सर!”
“तो अब आप सपने से बाहर आ जाएँ।”
“समझी नहीं सर!”
“आपकी शिकायत मिली है कि आप क्षेत्र में वैमनस्य फैला रही हैं। पब्लिक स्कूल छोड़ने के लिए अभिभावकों पर दबाव बना रही हैं। कुछ लोगों पर हमले भी करवाए है आपने।”
“नहीं तो सर! सब बिलकुल झूठ है! हम कम पैसों में उत्कृष्ट शिक्षा दे रहे… पब्लिक स्कूल में फीस ऊँची है और पढ़ाई हमसे खराब इसलिए लोग बच्चों को यहाँ भेज रहे।”
“पब्लिक स्कूल किसका है पता है? नहीं न? इतने बड़े लोगों का स्कूल ठप्प करके नौकरी कर पाएँगी आप?”
“फिर हम क्या करें?”
“आप सिर्फ़ मिड-डे मील पर ध्यान दीजिए …बाकी आराम कीजिए!”
इसके बाद विद्यालय सिर्फ़ मिड-डे मील पर केन्द्रित हुआ।
प्रिंसिपल ने खाली समय में परचून की दुकान खोल ली।
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2-फाँक/ छवि निगम
शाम को बेटा जैसे ही लौटा, घर आम की खुशबू से महक उठा। कमला जी ने झट पूछा- ‘‘दशहरी ले आए क्या ?” तो बेटे की ‘‘ अं… आँ…” को काटकर बहू तपाक से बोली- ‘‘ नहीं तो अम्मा !”
पर उन्होंने बहू को झट-से झोला लेकर अंदर जाते देख लिया था। उनका दिल जैसे दो फाँक हो गया। देर तक वे अपने सामने रखे बेस्वाद खाने को देखती रहीं। फिर धीरे-धीरे लाचारी में बुझा उनका मन.. गुस्से से सुलगने लगा।
क्या वो जानती नहीं थी परसों खीर बनी थी और उससे 2 दिनों पहले हलुआ ? पर उन्हें मिला क्या ? वही लौकी-तरोई और पतली-सी दाल ! ठीक है, माना कि शुगर ज्यादा है उनकी, पर सारी दवाएँ तो ले ही रही हैं न ! चलती-फ़िरती हैं, घर के छोटे-मोटे काम भी कर देती हैं। और- ‘‘अम्माजी ज़रा साग साफ़ कर दीजिए…मुन्ने की मालिश तो और कोई कर ही नहीं सकता…आपके हाथ वाला मिर्च का अचार खाने का मन है” ये सब फरमाइशें करते, न ध्यान आता किसी को उनकी सेहत का ! फ़िर ज़रा-जा मीठा देते क्यों जान निकली जाती है?
सुलगता हुआ मन जब भभकने लगा, तो वो उठीं, और अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ने लगीं। बरामदा पार करते हुए अचानक उनकी नज़र कोने में पड़ी कबाड़ से ढकी…बेंत की आरामकुर्सी पर पड़ी, तो वे ठिठक गईं। सुन्न होते शरीर से…बस उसे देखती ही रह गईं।
फिर घिसटते कदमों से वे लौट पड़ीं। अब उनकी आँखों मे नमी तैर रही थी, और यादों में एक धीमी घिघियाती आवाज़- ‘‘ज़रा-सा दे दो बहूरानी…बस एक फाँक..”
-0-डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल, 7838090732