प्रथम पंक्ति की साहित्यिक पत्रिकाओं में कथादेश एकमात्र ऐसी पत्रिका है, जिसने लघुकथा को मंच प्रदान करते हुए पुरस्कृत लघुकथाओं के 18 ‘लघुकथांक’ प्रकाशित किए हैं। प्रतियोगिता-18 की पुरस्कृत लघुकथाओं का अंक पाठकों के हाथ में है और प्रतियोगिता-19 की घोषणा होने वाली है। लघुकथा की विकास-यात्रा में हरिनारायण जी का यह योगदान अविस्मरणीय रहेगा। प्रतियोगिता- 18 के पुरस्कारों की घोषणा करते हुए वे लिखते हैं- ‘अखिल भारतीय कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता–18’ के सभी विजेताओं को ‘कथादेश’ परिवार की ओर से हार्दिक बधाई और आत्मीय शुभकामनाएँ। निर्णायक मंडल- संतोष दीक्षित, विनोद तिवारी और सुकेश साहनी- के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, साथ ही प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी रचनाकारों का आभार, जिनकी सहभागिता ने इस आयोजन को सार्थक बनाया। ‘कथादेश’ की शुभकामना है कि आप सभी की सृजन-यात्रा निरंतर उज्ज्वल हो।
लघुकथा प्रतियोगिता-18 के लिए लगभग ग्यारह सौ लघुकथाएँ ई-मेल से प्राप्त हुईं। कुछ लेखकों ने डाक से भी रचनाएँ भेजीं। सदैव की भाँति बहुत ही कम लघुकथाओं को निर्णायकों के पास भेजने के लिए उपयुक्त पाया गया। बड़ी संख्या में प्राप्त लघुकथाओं में से केवल 18 का अंतिम चक्र तक पहुँचना, इस विधा में हो रहे लेखन के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न खड़े करता है।
पिछले तीन-चार वर्षों में गुणवत्ता की दृष्टि से लघुकथा के स्तर में बहुत गिरावट आई है, जबकि लघुकथा लेखकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, प्रतियोगिता में प्रतिभाग करने वाले लेखकों की संख्या से भी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इस दौर में लिखी जा रही रचनाओं के अध्ययन के आधार पर इसे विधा का ‘संक्रमणकाल’ कहा जा सकता है। सोशल मीडिया के विभिन्न समूहों पर चल रहे विमर्श को देखकर यही लगता है कि कई लेखक अभी भी कालदोष, शब्द सीमा, विस्फोटक अंत, पंच-लाइन, अनकहा, भूमिका विहीन और नेपथ्य जैसे बिंदुओं पर माथापच्ची कर आदर्श लघुकथा ‘तैयार’ करने में लगे हैं, ऐसे में लघुकथा का कथानक उनके लिए गौण हो जाता है, फलस्वरूप साँचे में ढली एक जैसी लघुकथाएँ सामने आती हैं।
जब लघुकथा के स्थापित लेखक, रचनाकारों से 50 / 100/ 300 शब्दों वाली लघुकथा की माँग करते हैं, तो हैरानी होती है। इस तरह के संकलन लघुकथा में सक्रिय रचनाकारों को भ्रमित ही करते हैं। लघुकथा में जिन बिंदुओं पर सभी नए-पुराने रचनाकार एकमत हैं, उनपर अज्ञानतावश पुनः विमर्श का क्या औचित्य है? यहाँ अप्रैल 1989 में पटना सम्मलेन के अवसर पर आचार्य निशांतकेतु द्वारा ‘लघुकथा की शास्त्रीयता’ पर पढ़े गए आलेख की कुछ पंक्तियाँ याद याद आ रही हैं-
‘लघुकथा भोजन–निर्माण के पूर्व की विस्तृत आयोजन–प्रक्रिया नहीं है, जैसी कहानी में होती है। जैसे चूल्हे के पास जलावन का रखना, चूल्हे पर पतीली रखना, पतीली में पानी डालकर उसे खौलाना, फिर उसमें चावल धोकर डालना, पकने पर उसे उतार लेना है। इसी प्रकार दाल और सब्जियों का पकना–पकाना है। यह सब कुछ लघुकथा में नहीं होता। यह तो कुकर में दाल, भात सब्जी इत्यादि सभी खाद्य–पदार्थों का सजाकर रखना और दो–चार सीटियों पर दो–चार मिनटों में उतार लेना है। खाना तैयार। संपूर्ण दृष्टि भोजन के आस्वाद पर है। भूख भी लगी है। हम ज्यादा देर तक इंतजार भी नहीं कर सकते। इस तरह लघुकथा एक प्रकार से कुक्डफूड, प्रिपेयर्ड फूड, पैकेट फूड या टिंड फूड है अथवा हद–से–हद सीटी मारता कुकर–फूड है।’
सम्मलेन में लघुकथा को लेकर उनके द्वारा की गई टिप्पणी को नकार दिया गया था, उनकी यह टिप्पणी लघुकथा लेखकों को भ्रमित ही करती थी, इसके अनुसार लघुकथा लेखन चुटकियों का खेल है। विचारपत्र के इस बिंदु पर हमारे परामर्श /संशोधन को निशांतकेतु द्वारा स्वीकार किया गया था। कभी- कभी लगता है कि लघुकथा अपनी विकास-यात्रा में आगे बढ़ने की जगह, विपरीत दिशा में चल पड़ी है। ऐसे लेखकों की कमी नहीं जो लघुकथा का ‘उत्पादन’ कर रहे हैं, हर साल उनका लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो जाता है- ‘सीटी मारते कुकर-फ़ूड की तर्ज़ पर।’
इस दौर में भी ऐसे कथाकारों की कमी नहीं है, जो अपनी सृजन-यात्रा के प्रति गंभीर हैं, समाज की नब्ज पर उनका हाथ है, लेखकीय दायित्व के प्रति सजग हैं। इन प्रतिभावान लेखकों की सशक्त लघुकथाओं ने कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता-18 में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। यह रचनाएँ लघुकथा के इस ‘संक्रमणकाल’ के बावजूद विधा के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती हैं, विधा को समृद्ध करती हैं। निर्णायकों द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर दस लघुकथाओं का पुरस्कृत करने हेतु चयन किया गया –
1.कहीं और (अक्षत पाठक ), 2. ‘जेन-जी’ पंच(महावीर राजी), 3.तीसरा दरवाज़ा (रचना श्रीवास्तव ), 4.क्षण अधिकोष (पूजा अग्निहोत्री ), 5.किराए का परिवार (संदीप तोमर ), 6.शहर में अफवाह (विज्ञान भूषण ), 7.बेड मैनर्स ( अनूप मणि त्रिपाठी ), 8.दाँव (कविता मुकेश), 9.आईने के पीछे (योगिता जोशी), 20.अश्रु चमक (श्रद्धा जलज घाटे)।
अंतिम चक्र तक पहुँची अन्य लघुकथाओं का विवरण निम्नवत् है –
स्थायी समाधान ( पूनम मनु ), तुरपाई (सारिका भूषण ), कॉलगर्ल सस्ती है (ट्विंकल तोमर सिंह ), पाखंड (राम करन), जीवन चक्र (छवि निगम ), स्मार्ट घड़ी( चन्दन कुमार ), स्पर्श ( चाँदनी समर ), समाधान (पूजा अग्निहोत्री )
अक्षत पाठक की ‘कहीं और’ प्रथम स्थान के लिए चयनित हुई। इस लघुकथा ने बहुत प्रभावित किया। मानव मन की गहराइयों में उतरकर जीवन की अबूझ पहेलियों पर लेखन कार्य बहुत कठिन होता है, वह भी लघुकथा के दायरे में रहकर। इससे पहले अक्षत पाठक की कोई लघुकथा नहीं पढ़ी है, हो सकता है यह उनकी पहली लघुकथा हो। इस लघुकथा को पढ़ते हुए मुझे रघुनन्दन त्रिवेदी की ‘स्मृतियों में पिता’ और सत्यनारायण की ‘आईना’ याद आ गईं। ये दोनों मेरी पसंदीदा लघुकथाएँ रही हैं । दोनों ‘पिता’ पर केंद्रित हैं। अक्षय पाठक की अर्थगर्भी लघुकथा ‘कहीं और’ की माँ हमें अपने घर परिवार की माँ जैसी ही लगती है
और उसका बीच-बीच में अचानक कहीं चले जाना, हम सबका देखा- भाला है। कहानी में कथा और कथ्य साफ–साफ दिखते हैं, शब्द और अर्थ की एकात्मकता की तरह अक्षत पाठक की इस लघुकथा में संपूर्ण कथा ही कथ्य बन जाती है।
लघुकथा के लिए कहा जाता है कि इसमें पात्र का चरित्र- चित्रण सम्भव नहीं होता। अक्षत पाठक की बड़े काल खंड को लेकर लिखी गई रचना इस मिथ को तोड़ती है-
-माँ मेरी बहुत ख़ुशदिल थी, हमेशा चहकते रहती, पिता जी की हर बात और मेरे नख़रों को सर आँखों पे लेती।
-माँ के पास अपना कुछ नहीं था। पर एक जगह थी, जहाँ वो अचानक चली जाती थी, अकेले। वो सिर्फ़ उसकी जगह थी, जहाँ उसे जाने से कोई नहीं रोक पाया। और कभी किसी को इस बात का पता नहीं चला कि वो बीच-बीच में अचानक कहीं चली जाती हैं।
-दोपहर में पापा जब लंच पर आते, आख़िरी रोटी सेंकने के बाद माँ प्लेटफार्म पे पड़े आटे में उँगलियों से कुछ उकेरती, वैसे ही एकटक कहीं देखते हुए, कुछ सोचती- सी खड़ी रहती। उनकी आँखों में कुछ देखती; पर फिर भी लगता जैसे कुछ भी नहीं देख रही हैं। माँ वहाँ होती; पर उसके देखने को देखो, तो लगता कि माँ किसी बीती दुनिया या किसी असंभव जीवन के बीच के पोर्टल में झाँक रही हैं।
-“क्या हुआ,” मैं पूछती।
माँ कहती- “कुछ नहीं।’’
“कहाँ चली गई थी?”
माँ कहती, “कहाँ जाऊँगी, यहीं तो हूँ।” मुस्कुराके ऐसे कहती, जैसे अपने भीतर कोई जगह छुपा रही हो।
-आज सालों बाद, जब मेरी बेटी मुझे चुपचाप देखते रहती है कि “मैं उसके सामने बैठे-बैठे कहाँ चली गई हूँ”, मुझे ठीक-ठीक पता होता है कि माँ कहाँ जाती थी। मैं भी अक्सर वहाँ जाती हूँ ; पर माँ मुझे वहाँ नहीं मिलती। मुझे आशा है की अगर मेरी बेटी मुझे ढूँढे तो मैं उसे वहीं मिलूँ।
लघुकथा में ‘अनकहा’ को लेकर अनेक समूहों पर काफी विमर्श होता रहता है , गढ़ी गई रचनाओं में सायास अनकहा छोड़ दिया जाता है। अक्षत पाठक की ‘कहीं और’ में इस अनकहे को और अच्छे से समझा जा सकता है। माँ कहीं-कहीं जाकर लौट-लौटकर आती है, उसके जाने और लौटके आने की बीच की अवधि में जो भी हुआ, सब अनकहा रह जाता है, पाठक के सामने यह विकल्प खुला रहता है कि वह अपनी कल्पना से किसी भी नतीजे तक पहुँचे। कथा में एक जगह लेखक कुछ संकेत (अनुमान)देता है-
जैसे वो कहीं और है, अपनी उस ख़ुफ़िया जगह में, जो गुफा हो सकती है, जहाँ से एक नदी निकलती है, उस ख़ुफ़िया जगह में पहाड़ हो सकते हैं, जिनके माथे पर बादल टकराते हैं, या वो जगह बंबई की एक व्यस्त सड़क हो सकती है, जिस पर अपना हैंड-बैग लटकाए माँ अपने प्रेमी के साथ सड़क पार कर रही है।
लघुकथा के समापन तक आते-आते यह लगता है-
–एक लघुकथा के कई पाठ हो सकते हैं। एक, जो रचनाकार के जेहन में है, दूसरा, जो समीक्षक प्रस्तुत कर रहा है और तीसरा, जो पाठक समझ रहा है।
लघुकथा के अंतिम वाक्य को लेकर ‘लेखक का अभिमत’ जानने की उत्सुकता बनी रहती है।
कुल मिलकर ‘कहीं और’ जैसी नई जमीन तोड़ती उत्कृष्ट लघुकथा के सृजन के लिए अक्षत पाठक बधाई के पात्र हैं।
महावीर राजी की लघुकथा ‘जेन-जी’ पंच दूसरे पुरस्कार के लिए चुनी गई। राजी वर्षों से लघुकथाएँ भी लिख रहे हैं , पर उनकी लघुकथाओं की संख्या बहुत अधिक नहीं है। गुणवत्ता की दृष्टि से उनकी रचनाओं को अलग से रेखांकित किया जा सकता है। कथादेश प्रतियोगिता में उनका भाग लेना भी इस आयोजन के लिए सम्मान की बात है।
‘जेन-जी’ पंच में लेखक का रचना कौशल देखते ही बनता है, पहली पंक्ति के साथ कथा की विषय वस्तु और लेखक की भाषा पाठक को पलक झपकते ही कथा के समापन तक बहा ले जाती है। मनोनुकूल समापन पाकर पाठक तृप्त हो जाता है।
सतही तौर पर देखें तो लघुकथा किसी मार-धाड़ वाली बॉक्स ऑफिस हिट फ़िल्म जैसी दिखती है, जिसमें डेगना लेखक के हाथ की कठपुतली जैसा दिखाई देता है; पर हकीकत इससे अलग है , लघुकथा में शीर्षक महत्त्वूर्ण होता है, लघुकथा के समापन पर पहुँचते ही कथा को मायने देता है। ‘जेन-जी’ पंच में शीर्षक से लघुकथा पाठक के समक्ष शुरू में खुल जाती है; लेकिन यह इस रचना के लिए जरूरी भी था, इससे पाठक के चिंतन को दिशा मिलती है। इस तरह की लघुकथाएँ तभी लिखी जा सकती हैं, जब लेखक की नज़र समाज में हो रहे बदलाव पर हो।
महावीर राजी ने इस बारीक बदलाव को महसूस किया है, तभी उन्हें यह रचना लिखने की जरूरत महसूस हुई। ‘जेन-जी’ का जो उजला पक्ष है, उसे रचना में पिरोकर प्रभावी प्रस्तुति हुई है। किसी घटनास्थल पर पुलिस की गतिविधियों को लाइव रिकॉर्ड करते युवाओं की भीड़ का दिखना आम बात हो गई है। ऐसे युवाओं पर हाथ छोड़ते हुए पुलिस भी डरने लगी है। इसी बिंदु को केंद्र में रखकर लघुकथा की रचना की गई है। लघुकथा से कुछ पंक्तियाँ-
हवलदार साहब की सवारी मस्त चाल से चलती डेगना की ओर बढ़ी। डेगना का कलेजा धक-धक करने लगा। भय नसों से निकल कर आँखों में भर आया। रोज ही ऐसा हो रहा। हवलदारजी आते और हर तरह के फल दो दो-तीन तीन ठो उठाकर चल पड़ते। डेढ़ सौ की लूट। इधर बाजार भी ठीक नही जा रहा। खर्चा बढ़ गया। पूँजी टूट रही। माई का चश्मा, बबुआ की फीस .! आज तो बोहनी भी नहीं हुई।
“का रे.. मुँह काहें लटका हुआ.. !!” बेहया हँसी..मानो गुलिवर खड़ा हो पिद्दी के सामने। फिर हथेली बेखौफ़ आगे बढ़ने लगी। डेगना का दिमाग़ साँय- साँय कर उठा। भय आँखों से रिसकर पूरे चेहरे पर लोशन- सा पुत गया। हवलदारजी ने दो सेव उठाए, लगा जैसे माई का चश्मा छिन गया हो। दो मौसम्मी बैग में गईं , लगा बबुआ की फीस पर डाका डला हो।
भय दूर रहकर खूब डराता है; लेकिन एक दम से सर पर चढ़कर तीन ताल बजाने लगे और मन अगर मरने मारने पर उतारु हो जाए, तो उसे दुम दबाकर भागते देर नहीं लगती। शम्भू जैसे ही केले और अमरुद उठाने को हुए कि डेगना ने उनकी कलाई पकड़ ली-‘‘बहुत नुकसान हो रहा सर। अब रहने दें!’’
लघुकथा का समापन-
फिर हवा में तेज रासायन की तरह अजूबी खबर घुलने लगी कि डेगना को आसपास और दूर दूर तक के तमाम बस अड्डों में भी देखा जा रहा है। दुर्र.. सब गप्प है! नहीं रे भैया..एक दम सच्ची खबर है कि डेगना सहस्राक्ष होकर सभी बस अड्डों में अवतरित हो गया और जनता का विशाल हुजूम हवा में मुट्ठियाँ ताने, नारे लगाते हुए उसके पीछे चलता राजपथ पर ताण्डव कर रहा है।
रचना श्रीवास्तव की ‘तीसरा दरवाजा’ तीसरे स्थान के लिए पुरस्कृत हुई। विदेश में रह रहे बच्चों की स्वदेश में रह रहे माता-पिता की घोर उपेक्षा की विचलित करने वाली ख़बरें देखने-सुनने को मिलती रहती हैं, इस विषय पर अनेक कथा- कहानियाँ भी लिखी जाती रही हैं, यानी कह सकते हैं कि विषय पुराना है। ‘तीसरा दरवाजा’ का पहला अवतरण पढ़कर यही लगता है कि हम घिसे-पिटे विषय पर कोई लघुकथा पढ़ने जा रहे हैं; लेकिन रचनाकार सजग है, बदलते समय की नब्ज पर उसका हाथ है, आने वाले संकट को महसूस कर सकता है। लघुकथा में ‘ए आई’ के प्रवेश से रचना बहुत मार्मिक हो जाती है-
हर महीने मिश्रा जी को सुनहरे बॉर्डर वाला एक सुंदर पोस्टकार्ड मिलता है। जब भी मिश्रा जी वह पोस्टकार्ड पत्नी सुरभि के हाथ में देते हैं, सुरभि खिल-सी जाती हैं। सुरभि उसे धीरे से पढ़ती हैं- “बाबा, मैं इस महीने भी नहीं आ सका… अगली बार ज़रूर आऊँगा। माँ कैसी हैं? मैं रोज़ आपकी तस्वीर को देखता हूँ। आपका बेटा — सोनू”
पोस्टकार्ड पढ़ने के बाद सुरभि चुप हो जातीं। कभी आँखों में नमी, कभी मुस्कान और कभी सिर्फ़ लंबी साँस।
अपने बेटे का इंतज़ार करती सुरभि एक दिन बीमारी से हार जाती हैं।
माँ की मृत्यु के बाद पाठक के सामने ए आई जेनरेटेड पोस्टकार्ड का रहस्य खुलता है, लघुकथा चरमोत्कर्ष पर समाप्त होती है, ‘ए आई’ का संवेदनहीन (यांत्रिक) संवाद इस लघुकथा को ऊँचाई प्रदान करता है। मिश्रा जी की तरह पाठक की ऑंखें भी भर आती हैं।
मिश्रा जी ने टैबलेट उठाया, कुर्सी पर बैठे,और धीरे से बोले — “सोनू, माँ अब नहीं रही। अब ये कार्ड बंद कर दो…”
कुछ देर टैबलेट चुप रहा, फिर स्क्रीन पर एक उत्तर उभरा: ‘‘I’m sorry to hear that. Would you like to send a sympathy message to yourself?’’ संवेदनाओं का यांत्रिक होकर इस तरह मर जाना,आतंकित करता है।
पूजा अग्निहोत्री की लघुकथा ‘क्षण-अधिकोष’ विषय की नवीनता और प्रभावी प्रस्तुति के कारण चौथे स्थान के लिए पुरस्कृत हुई। आकारगत लघुता के कारण लघुकथा में कथानक का चयन अतिरिक्त सजगता की माँग करता है, अन्यथा पूरी कथा अविश्वसनीय लगती । यहाँ लेखिका ने कथ्य के अनुरूप कथा बुनी है, जो पाठक तक अपना मंतव्य सम्प्रेषित करने में सफल रही है।
शुभा बैंक में अपने फुर्सत के घंटे जमा करती जाती है, ताकि बुढ़ापे में उन्हें निकालकर आराम से खर्च कर सके।
बुढ़ापे में वह पहली बार जमा करने नहीं; बल्कि समय निकालने के लिए बैंक पहुँचती है।
रिकॉर्ड देखते हुए क्लर्क बताता है, “माता जी, आपके खाते में जमा घंटे बहुत हैं; लेकिन… आपके नाम पर एक भी स्वयं के लिए चिह्नित नहीं है।”
शुभा चौंक जाती है, “मतलब?”
हैड क्लर्क ने शांत स्वर में कहा, “मतलब यह कि, आपने जितनी फुर्सत के पल जमा किए हैं, वो हमेशा किसी न किसी के साथ बिताने के लिए जमा किए हैं। आपके अपने लिए तो एक सेकेंड भी जमा नहीं है।’’
“पर मुझे अभी समय की बहुत जरूरत है।”
क्लर्क कहता है, “आपने जिनके लिए अपना समय जमा किया, अगर वो लोग अपना समय आपको दे दें ……”
वह एक-एक करके उन सबको कॉल करती है, जिनके लिए अपने जीवन का सारा समय खर्च किया था। पर कुछ ने बहाने बनाए और कुछ ने दो टूक जवाब दे दिया।
शुभा बैंक से बाहर निकलती है।
वह मुट्ठी में जमा घंटों की रसीदें कसकर भींच लेती और खुद से कह उठती है, “जब हम जिंदगी के मूल को नहीं जीते, तो उसका ब्याज भी नहीं मिलता।”
संदीप तोमर की लघुकथा ‘किराये का परिवार’ पाँचवें स्थान के लिए चयनित हुई है। वर्त्तमान भारतीय परिवेश में किराये के परिवार की अवधारणा अविश्वसनीय-सी लगती है, कुछ फिल्मों में हास्य-मनोरंजन के तौर पर ऐसे प्रयोग देखने को मिलते हैं।
जब किसी लेखक के भीतर कोई रचना दस्तक देती है, तो कथ्य के सफल सम्प्रेषण के लिए कुछ कल्पना का सहारा भी लेना पड़ता है। यहाँ जरूरी यह है कि पात्र और उनके संवाद अविश्वसनीय न लगे। संदीप तोमर ने इस दृष्टि से सजगता बरती है। लघुकथा, एजेंसी से ली गई किराये की माँ नूपुर और और आठ साल की आर्या पर केंद्रित है। कथा में एक ओर आर्या का नूपुर के प्रति निश्छल प्रेम है; दूसरी ओर एजेंसी के नियमों से बँधी नूपुर की विवशताएँ हैं। धीरे-धीरे आर्या के प्यार के आगे नूपुर का मातृत्व जाग जाता है। लेखक ने आर्या और नूपुर के बीच ह्रदयस्पर्शी संवादों के द्वारा कथ्य-विकास किया है, जो काबिले- तारीफ है।
नूपुर को हर बार एजेंसी के नियम याद करने पड़ते— भावनात्मक दूरी बनाए रखें।
मदर डे आया। स्टेज पर आर्या ने माइक पकड़ा और पूरे विश्वास से कहा— “मेरी मम्मा दुनिया की बेस्ट मम्मा हैं…।”
तालियाँ बजीं; पर नूपुर की आँखों के भीतर कुछ पिघल रहा था।
अगले दिन एजेंसी का मैसेज— “यह कॉन्ट्रैक्ट अब समाप्त हुआ।”
नूपुर को जाना था।
आर्या ने अपना सबसे कीमती खिलौना उसके हाथ में रख दिया— “यह रख लीजिए…, ताकि आप मुझे भूल न जाए।”
नूपुर लौटी तो उसके हाथ काँप रहे थे। एजेंसी के दफ़्तर में खिलौना वापस करना था—“व्यक्तिगत उपहार रखना नियम-विरुद्ध है।”
उसने बमुश्किल खिलौना काउंटर पर रखा… और पहली बार महसूस किया— किराए का परिवार देते समय, एजेंसी यह नहीं बताती कि दिल किसका किराए पर चला जाएगा।
विज्ञान भूषण की लघुकथा ‘शहर में अफवाह’ छठे स्थान के लिए पुरस्कृत हुई है। लघुकथा में दोनों समुदाय के धर्मांध और संवेदनहीन लोगों को बेनकाब किया गया है। बहुत ही सार्थक और उद्देश्यपूर्ण रचना के लिए लेखक का प्रयास प्रशंसनीय है। कैसी विडंबना है कि दोनों समुदाय की भीड़ यह मान लेती है कि उसके धर्म में पवित्र माने जाने वाले पशु के ही कटे अंग उन पैकेट्स में हैं। उन पशुओं के लिए दोनों समुदायों के लोग एक दूसरे का खून बहाने के लिए नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं।
तभी एक पैकेट से किसी बच्चे की कटी हुई हथेली गिर पड़ती है, तो दूसरे से बच्चे के पैर का टखना। धर्मांध, हृदयहीन, उग्र भीड़ का आक्रोश शांत होने लगता है। किसी मासूम को भले ही निर्ममता से मारा गया था, लेकिन दोनों धर्म अब सुरक्षित थे।
अनूपमणि त्रिपाठी की लघुकथा ‘बेड मैनर्स’ में घूसखोर अधिकारी के कार्य-व्यवहार की अच्छी खबर ली गई है। लघुकथा का समापन पूरी कथा को मायने देता है-
वेटर जल्द ही आइस्क्रीम लेकर लौटा। अभी आइस्क्रीम रखा ही था कि बच्चा आइस्क्रीम पर टूट पड़ा। खाते वक्त आइस्क्रीम टेबल पर गिर गई। बच्चा टेबल से उठाकर खाने को हुआ, तो वे गुस्से से फट पड़े, “कितनी बार समझाऊँ तुम्हें कि गिरा हुआ नहीं खाते! बेड मेनर्स!!!”
कविता मुकेश की लघुकथा ‘दाँव’ में उन मेम साहिबों को करारा जवाब दिया गया है, जो त्योहारों पर अपनी क़ीमती उतरन कामवालियों को देकर अहसान जताती हैं, इस लघुकथा में उनका ‘दाँव’ उल्टा पड़ जाता है-
“अरे! मना मत कर, जानती है, इसकी कीमत पाँच हजार से भी ज्यादा है। रख ले।”
“मेम साब, तो आप ऐसा करो, मुझे इस दीपावली पर पाँच हजार का राशन ही दिलवा दो, कम से कम मेरी एक महीने की टेंशन तो खत्म हो जाएगी।”
योगिता जोशी की‘आईने के पीछे’ नौवें पुरस्कार के लिए चुनी गई। लघुकथा का विषय अतिसाधारण है, प्रस्तुतीकरण बेहतर होने के कारण लघुकथा निर्णायकों का ध्यान खींचने में सफल रही है। रचना यह सम्प्रेषित करने में सफल रही है कि विभिन्न अवसरों पर मुखौटे लगाए आदमी की हकीकत बहुत जल्दी सामने आ जाती है।
श्रद्धा जलज घाटे की ‘अश्रु चमक’ दसवें स्थान पर रही। यह लघुकथा हमें नेत्र दान के लिए प्रेरित करती है।
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