सतीश राठी जी से मेरी पहली मुलाकात तब हुई, जब वे सपत्नीक गुना से इंदौर आने वाले थे। उससे पहले तक मेरी उनसे फोन पर ही बात होती थी। जब मेरी उनसे बात हुई तो

मैंने उन्हें आग्रह किया कि वे भोजन मेरे घर पर ही करें और उन्होंने स्वीकृति भी दे दी; लेकिन करीब 2 घंटे बाद उन्होंने कुछ झिझकते हुए कहा कि आज ग्यारस है, तो हमारा तो व्रत रहेगा; इसलिए भोजन नहीं करेंगे। तो मैंने कहा कि मैं पूरा फलाहार बनाऊँगी। आप घर पर ही आइए। वे घर पर आए और यह मेरी उनसे पहली मुलाकात थी।
अब तक उनके लेखन व उनके अन्य कार्यों के बारे में जाना था; लेकिन जब उनसे मिली तो एक अलग ही व्यक्तित्व पाया। वह व्यक्तित्व जो लघुकथा के प्रति समर्पित था। लघुकथा शायद उनके लिए साधन थी बिल्कुल एक योगी की तरह। तब से लेकर आज तक उनकी सक्रियता की ,उनकी ऊर्जा की और उनके लघुकथा के प्रति समर्पण भाव की कायल हूँ।लघुकथा के क्षेत्र में सतीश राठी जी का नाम अत्यंत सम्मान और आत्मीयता के साथ लिया जाता है। वे केवल लघुकथाकार नहीं थे, बल्कि लघुकथा को एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए निरंतर सक्रिय रहने वाले समर्पित साहित्यकर्मी थे। उनके निधन का समाचार साहित्य-जगत के लिए एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं।
सतीश राठी जी का व्यक्तित्व जितना सरल और सहज था, उतना ही कर्मठ और प्रभावशाली भी। वे नेक दिल इंसान थे और साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके जीवन के हर पड़ाव पर दिखाई देती थी। उन्होंने लघुकथा को केवल लिखने की विधा नहीं माना, बल्कि उसे समाज और समय की सच्चाइयों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम बनाया।
लघुकथा के लिए कार्य करने वाली संस्था ‘क्षितिज’ उन्हीं का बोया बीज था इसलिए उनका गहरा जुड़ाव रहा । ‘क्षितिज’ के माध्यम से उन्होंने अनेक रचनाकारों को एक मंच दिया।लघुकथा पर संवाद और विमर्श की परंपरा को आगे बढ़ाया तथा इस विधा को साहित्यिक गंभीरता प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस दौर में, जब लघुकथा को साहित्य की मुख्यधारा में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था, सतीश राठी जी जैसे रचनाकारों और साहित्यकर्मियों का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।
उनकी लघुकथाओं का संसार व्यापक था। सामाजिक विसंगतियाँ, मानवीय संवेदनाओं के विविध पक्ष, बदलते सामाजिक मूल्य, रिश्तों में आती दरारें और समसामयिक जीवन की विडंबनाएँ उनकी रचनाओं के प्रमुख सरोकार रहे। वे छोटी-सी घटना या सामान्य-सी लगने वाली परिस्थिति में छिपे बड़े अर्थ को पहचान लेते थे।उनकी लघुकथाएँ पाठक को केवल कहानी नहीं सुनातीं,बल्कि उसे भीतर तक सोचने के लिए विवश करती हैं।
सतीश राठी जी की रचनात्मकता की विशेषता यह थी कि उनके यहाँ संवेदना और सामाजिक सरोकार साथ-साथ चलते हैं। वे विसंगतियों को देखते थे, उन पर लिखते थे, लेकिन उनकी दृष्टि में मनुष्य हमेशा केंद्र में रहता था। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में व्यवस्था पर सवाल उठाने के साथ-साथ मनुष्य के भीतर की करुणा, विवशता, संघर्ष और उम्मीद भी दिखाई देती है।
एक साहित्यकार के रूप में उनकी सक्रियता उल्लेखनीय थी।वे उन लोगों में थे जो साहित्य को केवल अपने लेखन तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसके लिए वातावरण तैयार करते हैं, लोगों को जोड़ते हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए रास्ते बनाते हैं। लघुकथा के प्रति उनका समर्पण इसी अर्थ में उन्हें विशिष्ट बनाता है।उनका व्यक्तित्व भी उनकी रचनाओं की तरह ही आत्मीय था। मिलनसार, सहज, सक्रिय और दूसरों के लिए सदैव उपलब्ध रहने वाले सतीश राठी जी ने अपने व्यवहार से भी अनेक लोगों के मन में स्थायी जगह बनाई। साहित्य में संबंध उनके लिए केवल औपचारिक परिचय नहीं थे, वे उन्हें आत्मीयता में बदलना जानते थे। शायद यही कारण है कि उनके जाने के बाद उनकी कमी केवल साहित्यिक संसार में ही नहीं, बल्कि उन असंख्य लोगों के बीच भी महसूस की जाएगी, जिन्होंने उनके स्नेह और सहयोग को अनुभव किया।
समय किसी व्यक्ति को हमसे दूर कर सकता है, लेकिन उसके कर्म और उसकी रचनाएँ उसे स्मृतियों में जीवित रखते हैं।सतीश राठी जी ने लघुकथा के क्षेत्र में जो कार्य किया,वह उनकी उपस्थिति का स्थायी प्रमाण है। ‘क्षितिज’ जैसी संस्था के माध्यम से उन्होंने जो साहित्यिक जमीन तैयार की, उस पर आने वाली पीढ़ियाँ भी आगे बढ़ती रहेंगी।
आज जब हम उन्हें स्मृति-शेष के रूप में याद कर रहे हैं, तो मन स्वाभाविक रूप से उदास है, लेकिन साथ ही गर्व से भी भरा है कि हमारे साहित्य ने एक ऐसे समर्पित रचनाकार को अपने बीच पाया,जिसने अपने हिस्से का काम पूरी निष्ठा से किया।
सतीश राठी जी अब हमारे बीच प्रत्यक्ष रूप से नहीं हैं, लेकिन उनकी लघुकथाओं के पात्रों में, उनके साहित्यिक सरोकारों में, ‘क्षितिज’ ” की स्मृतियों में और उनसे जुड़े लोगों की आत्मीय यादों में वे सदैव उपस्थित रहेंगे।
वे चले गए हैं,पर लघुकथा के आकाश में उनके द्वारा बनाया गया ‘क्षितिज’ अभी बहुत दूर तक दिखाई देता रहेगा। हम चलते रहेंगे, वह दिखाई देता रहेगा। भले ही हाथ नहीं आएगा, लेकिन सामने तो रहेगा।
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