दसवाँ पुरस्कार
“हेलो! मैं दिव्यज्योति नेत्र बैंक से बोल रहा हूँ।” फोन सुनते ही मैं तीस दिन पूर्व की स्मृति में पहुंच गई।
उस दिन शायद यह माँ की अंतरात्मा का आह्वान ही था कि मैं अचानक माँ के घर पहुँच गई। थोड़ी देर बाद देखती हूं कि माँ बड़ी कठिनाई से श्वास ले रही हैं और देखते ही देखते दस मिनट में ही हम सबको रोता-बिलखता छोड़कर मां सदा के लिए परलोक सिधार गईं।
चिरनिद्रा में सोई मां की आंखों में सदा प्रेम और स्नेह ही बसता था। मां नेत्रदान के लिए एकदम संकल्पित थीं। उस दिन भी उनके निर्मल, शांत चेहरे पर उनकी सदैव मुस्कुराती आँखों को देखकर लगा, मानो वे कुछ कह रही हैं। मैंने दिव्यज्योति नेत्र बैंक को फोन किया और थोड़ी देर बाद ही एक नेत्र चिकित्सक और प्रशिक्षित कर्मियों की टीम आ गई।
“डॉक्टर साहब, नेत्रदान में कितना समय लगेगा?”
“बमुश्किल पंद्रह मिनट।”
डॉक्टर साहब फिर बताने लगे कि “इस समय हमारे देश में लगभग बारह लाख लोग कॉर्निया अंधत्व से पीड़ित हैं।” वे नेत्र बैंक के लिए मां के दोनों कॉर्निया ले गए। साथ ही, रक्त का नमूना भी।
-बेटा!” किसका फोन था।’’ पिताजी के पूछने पर मैं वर्तमान में लौटी और रुंधे गले से भावुक होकर बोली- ‘’दिव्यज्योति नेत्र बैंक से फोन आया था। माँ के कॉर्निया के सफल प्रत्यारोपण हो गए हैं। दो अनजान व्यक्तियों की दुनिया रोशन हुई है।”
पिछले तीस दिनों से माँ के निधन से व्यथित और उन्हें निरंतर स्मरण करने से पिताजी की आंखें बार-बार आंसुओं से भर जाती थीं। पर यह समाचार सुनते ही उनकी आंसुओं से भीगी आंखों में बहुत दिनों बाद एक चमक दिखी, संतोष भरी चमक!
द्वारा डॉक्टर पदम घाटे, अरिहंत पैथोलॉजी लैब, 15, वेदव्यास कॉलोनी, रतलाम, (म.प्र.)457001 मो E Mail sghate83@gmail.com
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