आठवाँ पुरस्कार
“मेम साब, आज फिर से सात बज गए, अंधेरा होने को है। मैं जा रही हूं”, दरवाजे से बाहर
निकलते हुए मीना बोली।
“कल थोड़ा जल्दी आने की कोशिश करना, अभी भी बहुत सारा काम पड़ा है।” मालूम नहीं
सुषमा के शब्द उसके कानों में पड़े या नहीं। पल भर में ही वह बड़े-बड़े डग भरते हुए गली
के मोड़ तक पहुँच चुकी थी।
“दीपावली के दिनों में तो मेरी आफत ही आ जाती है।” रास्ते में मीना जैसे खुद से ही बातें
करती जा रही थी, “कहां तो पहले सारा काम निपटाकर चार बजे तक घर पहुँच जाती थी।
बच्चे भी भूख से हलकान हुए जा रहे होंगे और ढेर सारे कपड़े अलग धोने को पड़े हैं।”
“राम रे! मेम साब, आज आप इतना अटारा कहां से निकाल लायीं?” अगले दिन मीना के
आते ही सुषमा ने उसके सामने कुछ मेकअप किट्स, कई तरह के सजावटी सामान, हर
साइज के हैन्ड बैग और पर्स धोने-पोछने के लिए रख दिए।
“यह अटारा नहीं है मीना, यह सब कीमती ब्रांडेड सामान है। इनके लिए तो मैने न जाने
कितनी दुकानों की खाक छान मारी थी।“ सुषमा शान से बोली।
“पर इन पर तो कितनी धूल चढ़ी हुई है, शायद आपने अभी तक इन्हें काम में नहीं लिया
है।”
“हाँ मीना, मुझे बाजार में जब भी कोई अच्छी चीज दिखती है, खरीद लेती हूँ, वह कभी तो
काम आ ही जाती है।“ मीना तक के सामने सुषमा शेखी बघारने से नहीं चूकी, “अच्छा यूं
कर, यह पर्स तू रख ले। इस बार तूने मेरा कितना काम किया है। वैसे भी तुझे त्योहार का
कोई गिफ्ट तो देना ही है।”
”नहीं मेम साब, यह पर्स मेरे काम का नहीं है। मैं कहीं सज-संवर कर तो आती-जाती नहीं
हूं।” मीना ने उन्हें मना करते हुए कहा।
“अरे! मना मत कर, जानती है, इसकी कीमत पांच हजार से भी ज्यादा है। रख ले।”
“मेम साब, तो आप ऐसा करो, मुझे इस दीपावली पर पांच हजार का राशन ही दिलवा दो,कम से कम मेरी एक महीने की टेंशन तो खत्म हो जाएगी।”
दांव न चल पाने का अफसोस सुषमा के चेहरे पर साफ झलक रहा था।
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