दूसरा पुरस्कार
बस स्टैंड के बिस्तृत परिसर में आवाज़ाही करतीं बसोंकी गुर्राहट, यात्रियों की चिल्लपों और वेंडरों की चींख पुकार का समवेत गान मोजार्ट की सिंफोनी को भी मात दे रहा था।
दस बजे थे।डेगना बायीं दिवाल के सहारे रेहड़ी लिए खड़ा था। सेव, केला, मौसम्मी और अमरुद। मुख्य द्वार से हवलदार शंभू आते दिखे। हाथ में रुल और आँखों मे लोमड़ सी चमक। डेगना की नसों में भय बिच्छू सा सरसरा गया।
रोज की तरह शंभू मंगरू के ठेले के पास रुके। मुट्ठी भर कर परवल और भिंडी उठायी और झोले मे डाल लिया। पूछने की कोई जरूरत नहीं। खाकी के रौब के सामने मंगरू की तिलमिलाहट खिसियानी हंसी के रूप में फुस्स होकर रह गयी। शंभू आगे बढ़ते झंटू और गोबर्धन की रेहड़ी पर आये। एक एक पैकेट निमकी – चनाचूर तथा आठ दस अनरसा (एक मिठाई ) बैग में भरते हिनहिनाये -‘बचवन लोग को निमकी और मिठईया बहुते पसंद है !’दोनों जन रफू की हुई सूखी मुस्कान के सिवाय क्या दे पाते जवाब में।
हवलदार साहब की सवारी मस्त चाल से चलती डेगना की ओर बढ़ी। डेगना का कलेजा धक धक करने लगा। भय नसों से निकल कर आँखों में भर आया। रोज ही ऐसा हो रहा। हवलदारजी आते और हर तरह के फल दो दो -तीन तीन ठो उठा कर चल पड़ते। डेढ़ सौ की लूट। इधर बाजार भी ठीक नही जा रहा। खर्चा बढ़ गया। पूँजी टूट रही। माई का चश्मा, बबुआ की फीस .! आज तो बोहनी भी नहीं हुई।
‘का रे..मुंह काहें लटका हुआ..!’बेहया हंसी.. मानो गुलीवर खड़ा हो पिद्दी के सामने। फिर हथेली बेखौफ़ आगे बढ़ने लगी।डेगना का दिमाग़ सांय सांय कर उठा। भय आँखों से रिस कर पूरे चेहरे पर लोशन सा पुत गया। हवलदारजी ने दो सेव उठाए, लगा जैसे माई का चश्मा छिन गया हो। दो मौसम्मी बैग में गयी , लगा बबुआ की फीस पर डाका डला हो।
भय दूर रह कर खूब डराता है। लेकिन एक दम से सर पर चढ़ कर तीन ताल बजाने लगे और मन अगर मरने मारने पर उतारु हो जाय तो उसे दुम दबा कर भागते देर नहीं लगती। शम्भू जैसे ही केले और अमरुद उठाने को हुए कि डेगना ने उनकी कलाई पकड़ ली -‘बहुत नुकसान हो रहा सर। अब रहने दें.!’
जैसे अप्रत्याशित कुछ घट गया हो, शम्भू की आँखें फैल कर पकौड़े जितनी हो गयीं। दो कौड़ी का वेंडर !इतनी हिम्मत कि पुलिस को रोके।बाहर मौसम शीतल था पर शम्भू के भीतर वर्दी की गर्मी खदबदाने लगी। बिदक कर जोर का तमाचा डेगना के गाल पर जड़ दिया – चटाख ! आवाज सुनकर झंटू ,मंगरु ,गोवर्धनके संग अन्य वेंडर भी दौड़ आये। डेगना के भीतर का भय दरक चुका था। तमाचे से तिलमिला कर रेहड़ी के पीछे से बाहर आया और दोनों हाथों से हवलदार की धुनाई शुरु कर दी। युवा कसरती बदन। लम्बे समय से जमा विद्रोह उफन कर बाहर आने को आतुर हो उठा। उसे धुनाई करते देख अन्य वेंडरों का भी आतंक कपूर सा उड़ गया। सभी त्रस्त थे। सारे शम्भू पर पिल पड़े। खासा मजमा जुट गया। कुछ उत्साही युवक पूरे दृश्य का वीडियो बनाने लगे। कुछ सोशल मीडिया पर सीधे प्रसारण मे लग गये। शम्भू का झोला छीन कर झंटू ने सामान साथियों को लौटा दिया।
सामूहिक पिटाई से शम्भू बचाव की मुद्रा में आकर पलायन की चेष्टा करने लगे। डेगना ने कॉलर पकड़ लिया और उग्र भीड़ उनको घेरे में लेकर थाने की ओर बढ़ चली -‘तोलाबाजी चोलबे ना..(रंगदारी नहीं चलेगी) ! पुलिस जुलुम हाय हाय !वर्दीधारी शायलॉक.. दूर हटो !’
भीड़ परिसर से निकली किपीछे से एक कुत्ता वहाँ आकर चहलकदमी करने लगा। मानो ‘हल्कू’ ने साथियों के धर्मयुद्ध के समर्थन में रेहड़ियों की पहरेदारी के लिए जबरा को भेज दिया हो !
कुछ समय का अंतराल !
फिर हवा में तेज रासायन की तरह अजूबी खबर घुलने लगी कि डेगना कोआसपास और दूर दूर तक के तमाम बस अड्डों में भी देखा जा रहा है। दुर्र.. सब गप्प है ! नहींरे भैया..एक दम सच्ची खबर है किडेगना सहस्राक्ष होकर सभी बस अड्डों में अवतरित हो गया और जनताकाविशालहुजूम हवा में मुट्ठियां ताने नारे लगाते हुए उसके पीछे चलता राजपथ पर ताण्डव कर रहा है। **
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