अक्तुबर 2026

देशकहीं और     Posted: October 1, 2026

पहला पुरस्कार

माँ मेरी बहुत ख़ुशदिल थी, हमेशा चहकते रहती, पिता जी की हर बात और मेरे नख़रों को सर आँखों पे लेती। जैसे पिता के पास घर के साथ-साथ दफ़्तर रहा, मेरे पास सहेलियों के घर, स्कूल और अपना कमरा रहा, माँ के पास अपनी कोई जगह नहीं रही।

माँ का सब कुछ हमारा था, माँ के पास अपना कुछ नहीं था। पर एक जगह थी जहां वो अचानक चली जाती थी, अकेले। वो सिर्फ़ उसकी जगह थी जहां उसे जाने से कोई नहीं रोक पाया। और कभी किसी को इस बात का पता नहीं चला कि वो बीच-बीच में अचानक कहीं चली जाती है।

ठीक ठीक याद है, माँ मेरी फ्रॉक सिलते-सिलते अचानक रुक जाती थी, कुछ देर, वो कमरे के कोने में एक टक देखते बैठे रहती, मैं कुछ देर माँ को देखती फिर उनसे पूछती “क्या हुआ माँ”

माँ कभी एक बार में हाँ या ना जवाब नहीं देती। “माँ!” वो अचानक ठिठकती। “क्या हुआ” मैं पूछती। माँ कहती “कुछ नहीं”। “कहाँ चली गई थी?” माँ कहती “कहाँ जाऊँगी, यहीं तो हूँ”। मुस्कुरा के ऐसे कहती जैसे अपने भीतर कोई जगह छुपा रही हो।

दोपहर में पापा जब लंच पर आते, आख़िरी रोटी सेंकने के बाद माँ प्लेटफार्म पे पड़े आँटे में उँगलियों से कुछ उकेरती, वैसे ही एकटक कहीं देखते हुए, कुछ सोचती सी खड़ी रहती,  उनकी आँखों में कुछ देखती पर फिर भी लगता जैसे कुछ भी नहीं देख रही हैं। माँ वहाँ होती पर उसके देखने को देखो तो लगता कि माँ किसी बीती दुनिया या किसी असंभव जीवन के बीच के पोर्टल में झांक रही हैं। पूछो की “माँ! क्या हुआ? तो कहती “कुछ नहीं”

शाम में दरवाज़े पे खड़ी रहती चुपचाप, घर के सामने गाड़ियों की झिल-मिल होती रोशनी को देखते रहती। मैं खेलकूद कर घर लौटती तो, कहीं देखती हुई माँ को देखकर मैं रुक जाती, वो चंद क्षणों के दरवाज़े पे ऐसे दिखती जैसे वो वहाँ है ही नहीं, जैसे वो कहीं और है, अपनी उस ख़ुफ़िया जगह में, जो गुफा हो सकती है जहां से एक नदी निकलती है, उस ख़ुफ़िया जगह में पहाड़ हो सकते हैं जिनके माथे पर बादल टकराते हैं, या वो जगह बंबई की एक व्यस्त सड़क हो सकती है जिस पर अपना हैंड-बैग लटकाये माँ अपने प्रेमी के साथ सड़क पार कर रही है।

माँ कहीं-कहीं जाकर लौट-लौट कर आती थी। अपनी जगह से हमारी जगह में। पूछो कि “कहाँ चली गई माँ ” तो कहती थी कि “कहीं नहीं”। “बताओ ना क्या सोच रही थी?” तो कहती “कुछ नहीं”

आज सालों बाद, जब मेरी बेटी मुझे चुप-चाप देखते रहती है कि “मैं उसके सामने बैठे-बैठे कहाँ चली गई हूँ”, मुझे ठीक-ठीक पता होता है कि माँ कहाँ जाती थी। मैं भी अक्सर वहाँ जाती हूँ पर माँ मुझे वहाँ नहीं मिलती। मुझे आशा है कि अगर मेरी बेटी मुझे ढूँढे तो मैं उसे वहीं मिलूँ।

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