
लघुकथा को लेकर मेरे मन में सबसे पहली बात यही आती है कि कथ्य छोटा एवं सारगर्भित हो, सीधे -सपाट ढंग से न कहकर बात इस ढंग से कही जाए कि पाठक सोचने पर मज़बूर हो जाए। इसी चिन्तन को ध्यान में रखकर मैंने दो लघुकथाओं का चयन किया है। मेरी पसन्द की मेरी पहली लघुकथा है – डॉ. शंकर पुणतांबेकर की ‘आम आदमी’। ‘आम आदमी’ लघुकथा समाज का आईना है। इस लघुकथा में लेखक ने हमारे पूरे तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। एक नाव मझधार में है। नाविक कहता है -बोझ ज्यादा है, एक आदमी को कम होना पड़ेगा। नाव में डॉक्टर, वकील, अफसर, व्यापारी, नेता और ‘आम आदमी’ सब सवार हैं। सभी चाहते हैं कि ‘आम आदमी’ कूद जाए; क्योंकि वह तैर लेगा। जब वह मना करता है, तो नेता भाषण देता है – ‘‘हम मर मिटेंगे, लेकिन नैया नहीं डूबने देंगे।’’ जोश में आकर ‘आम आदमी’ ही नदी में कूद पड़ता है।
इस लघुकथा में व्यंग्य की धार बहुत तीखी है। लेखक ने एक भी कटु शब्द नहीं कहा, एक भी नाम नहीं लिया। फिर भी डॉक्टर, वकील, अफसर, नेता सबकी सच्चाई सामने रख दी। ‘हम नहीं तैर सकते’ कहकर अपना स्वार्थ छिपा लेना – यही आज की सच्चाई है। भाषण का जाल आज के नेताओं का सुलभ साधन है- ‘राष्ट्र, देश, इतिहास, परम्परा’ – ये शब्द आज भी हमें इमोशनल करके कुर्बानी देने के लिए उकसाते हैं। अंत में कुर्बानी देने वाला हमेशा ‘आम आदमी’ ही होता है।
प्रतीकात्मकता रूप में कहें, तो ‘नाव’ देश है। ‘मझधार’ संकट है। और ‘आम आदमी’ वह है, जो हमेशा बोझ उठाता है और सबसे पहले डूबता भी है।
लेखक की भाषा और शैली बहुत सरल, संवादात्मक और चुटीली है। आम आदमी ‘इतना जोश में आया कि कूद पड़ा’ – यह एक पंक्ति पूरी व्यवस्था पर तमाचा है। यह लघु कथा हमसे पूछती है – क्या हम भी हर बार जोश में आकर ‘नाव से कूद’ जाते हैं? क्या हम सवाल करना भूल गए हैं कि ‘जब मैं डूबता हूँ, तो कौन मदद को आता है?’
‘आम आदमी’ सिर्फ लघुकथा नहीं, एक चेतावनी है। डॉ. पुणतांबेकर ने बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी। ऐसी लघुकथा पढ़कर पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है। आज के दौर में हर युवा, हर नागरिक को यह लघुकथा पढ़नी चाहिए।
मेरी पसन्द की दूसरी लघुकथा है- श्याम सुन्दर अग्रवाल की ‘संतू’। ‘संतू’ समाज के उस वर्ग की लघुकथा है, जिसे हम रोज देखते हैं पर कभी नोटिस नहीं करते। प्रौढ़ उम्र का संतू रोज 10 बाल्टियाँ पानी चढ़ाता है। इसके बदले उसे 2 रुपये प्रति बाल्टी और चाय मिलती है। वह खुश है; क्योंकि ‘रोज बीस रुपये बन जाते हैं’। उसी दिन नहर में पानी आ जाता है और नल ठीक हो जाता है। अगले दिन जब वह काम माँगने आता है , तो मना कर दिया जाता है। लौटते समय वह सीढ़ियों से गिर पड़ता है और कहता है – ‘‘कल बाल्टी उठाए तो गिरा नहीं, आज खाली हाथ गिर पड़ा।’’
यह लघुकथा व्यंग्य और संवेदना का संगम है। लेखक ने एक भी उपदेश नहीं दिया। सिर्फ एक घटना से दिखा दिया कि गरीब के लिए ‘काम’ सिर्फ पैसा नहीं, सहारा होता है, जीवन का सन्तुलन होता है। काम गया, तो संतुलन भी गया।
एक पंक्ति में पूरी लघुकथा- ‘‘कल बाल्टी उठाए, तो गिरा नहीं, आज खाली हाथ गिर पड़ा।’’ यह पंक्ति पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाती है। जब तक जरूरत थी, तब तक संतू ठीक था, जरूरत खत्म, तो संतू भी खत्म।
अग्रवाल जी की सरल, सटीक भाषा, गहरा असर छोड़ जाती है। भाषा बिल्कुल आम बोलचाल की है। कोई अलंकार नहीं, फिर भी आखिरी पंक्ति पढ़कर पाठक देर तक सोचता रहता है। मेरे विचार से ‘बाल्टी’ यहाँ रोजगार का प्रतीक है। ‘सीढ़ी’ जीवन की कठिनाइयों का। और ‘गिरना’ बेरोजगारी का दर्द है। इस लघुकथा का संदेश है कि सुविधा मिलते ही हमें उन हाथों को नहीं भूलना चाहिए, जो हमारे लिए मेहनत करते हैं। एक कप चाय और 20 रुपये से किसी का दिन बन जाता है। ‘संतू’ सिर्फ एक मजदूर की लघुकथा है, पर इसमें पूरा समाज समाया हुआ है। श्याम सुन्दर अग्रवाल जी ने कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी। ऐसी लघुकथाएँ ही साहित्य की असली ताकत हैं।
1-आम आदमी/ डॉ. शंकर पुणतांबेकर
नाव चली जा रही थी।
मझधार में नाविक ने कहा, ‘नाव में बोझ ज्यादा है, कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छा, नहीं तो नाव डूब जाएगी।’
अब कम हो जाए तो कौन कम हो जाए? कई लोग तो तैरना नहीं जानते थे: जो जानते थे उनके लिए भी परले पार जाना खेल नहीं था।
नाव में सभी प्रकार के लोग थे-डॉक्टर, अफसर, वकील, व्यापारी, उद्योगपति, पुजारी, नेता के अलावा आम आदमी भी। डॉक्टर, वकील, व्यापारी ये सभी चाहते थे कि आम आदमी पानी में कूद जाए। वह तैरकर पार जा सकता है, हम नहीं।
उन्होंने आम आदमी से कूद जाने को कहा, तो उसने मना कर दिया। बोला, ‘‘मैं जब डूबने को हो जाता हूँ, तो आप में से कौन मेरी मदद को दौड़ता है, जो मैं आपकी बात मानूँ?’’
जब आम आदमी काफी मनाने के बाद भी नहीं माना, तो ये लोग नेता के पास गए, जो इन सबसे अलग एक तरफ बैठा हुआ था। इन्होंने सब-कुछ नेता को सुनाने के बाद कहा, ‘‘आम आदमी हमारी बात नहीं मानेगा, तो हम उसे पकड़कर नदी में फेंक देंगे।’’
नेता ने कहा, ‘‘नहीं-नहीं ऐसा करना भूल होगी। आम आदमी के साथ अन्याय होगा। मैं देखता हूँ उसे। मैं भाषण देता हूँ। तुम लोग भी उसके साथ सुनो।’’
नेता ने जोशीला भाषण आरम्भ किया जिसमें राष्ट्र, देश, इतिहास, परम्परा की गाथा गाते हुए, देश के लिए बलि चढ़ जाने के आह्वान में हाथ ऊँचा कर कहा, ‘‘हम मर मिटेंगे, लेकिन अपनी नैया नहीं डूबने देंगे…नहीं डूबने देंगे…नहीं डूबने देंगे’…!’’
सुनकर आम आदमी इतना जोश में आया कि वह नदी में कूद पड़ा।
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2-संतू /श्याम सुन्दर अग्रवाल
प्रौढ़ उम्र का सीधा-सा संतू बेनाप बूट डाले पानी की बाल्टी उठा जब सीढ़ियाँ चढ़ने लगा तो मैंने उसे सचेत किया, ‘‘ध्यान से चढ़ना। सीढ़ियों में कई जगह से ईंटें निकली हुई हैं। गिर न पड़ना।’’
‘‘चिंता न करो, जी! मैं तो पचास किलो आटे की बोरी उठाकर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भी नहीं गिरता।’’
और सचमुच बड़ी-बड़ी दस बाल्टियाँ पानी ढोते हुए संतू का पैर एक बार भी नहीं फिसला।
बीस रुपये का नोट और चाय का कप संतू को थमाते हुए पत्नी ने कहा, ‘‘तू रोज आकर पानी भर दिया कर।’’
चाय की चुस्कियाँ लेते हुए संतू ने खुश होकर सोचा- ‘‘रोज बीस रुपये बन जाते हैं पानी के। कहते हैं अभी नहर में महीना और पानी नहीं आनेवाला। मौज हो गई अपनी तो!’’
उसी दिन नहर में पानी आ गया और नल में भी।
अगले दिन सीढ़ियाँ चढ़कर जब संतू ने बाल्टी माँगी तो पत्नी ने कहा, ‘‘अब तो जरूरत नहीं। रात को ऊपर की टूँटी में भी पानी आ गया था।’’
‘‘नहर में पानी आ गया!’’‘ संतू ने आह भरी और लौटने के लिए सीढ़ियों पर कदम घसीटने लगा। कुछ क्षण बाद ही किसी के सीढ़ियों में गिरने की आवाज हुई। मैंने दौड़कर देखा, संतू आँगन में औंधे मुँह पड़ा था। मैंने उसे उठाया। उसके माथे पर चोट लगी थी।
अपना माथा पकड़ते हुए संतू बोला, ‘‘कल बाल्टी उठाए, तो गिरा नहीं, आज खाली हाथ गिर पड़ा।’’
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