सितम्बर 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा का उद्भव और विकास     Posted: September 1, 2026

भारतीय साहित्यशास्त्र कोश के अनुसार ‘कथा’ की व्युत्पत्ति कच् + अङ् + टाप् से होती है। कथा का वर्णन भामह, दण्डी, रुद्रट, और विश्वनाथ ने किया है। ‘कथ्’ धातु से व्युत्पन्न कथा शब्द का साधारण अर्थ है- ‘वह जो कहा जाए’। कहने में कहने वाले के अतिरिक्त सुनने वाले की स्थिति अन्तुर्भुक्त है, क्योंकि सुनने वाले के बिना एक क्षण को हम ‘बोलने’ की कल्पना तो कर सकते हैं, ‘सुनने’ की नहीं। परन्तु वह सभी कुछ जो कहा जाय ‘कथा’ नहीं कहलाता । कथा का विशिष्ट अर्थ हो गया है किसी ऐसी घटित घटना का कहना, वर्णन करना जिसका निश्चित परिणाम हो ।

साहित्य कोश ने कथा को दो मुख्य वर्गों में बाँटा है (1) इतिहास-पुराण की कथाएँ (2) कल्पित कथाएँ । इतिहास-पुराण की कथाएँ मुख्यतः पौराणिक, धार्मिक अचरणों, उपदेशों पर आधारित होती हैं, जबकि काल्पनिक कथाएँ स्वतंत्र अनुभूतियों के आधार पर कल्पनापरक रचनाएँ होती हैं। प्रत्येक कथा के लिए कथा का होना आवश्यक है। किन्तु कथा तथा कथानक के अन्तर को स्पष्ट किए बिना कथा की मूल धड़कन की पहचान संभव नहीं । ई. एम. फास्टर ने कथा और कथानक का अन्तर बताते हुए कहा है कि कथा घटनाओं का कालानुक्रम वर्णन है, जबकि कथानक में भी घटनाओं का वर्णन होते हुए भी उसमें कार्य-कारण संबंध पर बल दिया जाता है। टामस हार्डी ने सार्वकालिक और विश्वजनीन के साथ असाधारण सामंजस्य में भी कथा की परिकल्पना की है।

साहित्य कोश में कहानी के संबंध में कहा गया है कि गद्य कथा-साहित्य के अन्यतम भेद के रूप में कहानी सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्य का रूप है। आधुनिक हिन्दी-साहित्य में यह रूप भी बंगला के माध्यम से पाश्चात्य साहित्य से आया है। अंग्रेजी में जिसे शार्ट स्टोरी कहते हैं, वही बंगला में गल्प तथा हिन्दी में कहानी नाम से प्रचलित है। अंग्रेजी में शार्ट स्टोरी का शब्दानुवाद रूप में कभी-कभी इसे छोटी कहानी और लघुकथा भी कहा जाता है, किन्तु अंग्रेजी में लघुकथा के लिए ‘स्टोरियट’ (Storiette) शब्द का ही प्रयोग है। जहाँ तक अंग्रेजी भाषा के प्रभाव से हिन्दी के विकास का प्रश्न है, इस संबंध में यह सुस्पष्ट है कि भारतीय संस्कृत साहित्य में ई० पू० 4000 से 3000 से कथा के विद्यमान होने का अनुमान है। ऋग्वेद में यम-यमी, पुरुरवा-उर्वशी आदि के संबंध में कथाएँ उपलब्ध हैं। अंग्रेजी भाषा साहित्य का उत्स ग्यारहवीं शताब्दी से पर्व नहीं माना जा सकता, जबकि यह शताब्दी ‘ओल्ड इंगलिश’ का जन्म-काल माना जाता है। प्राचीन अंग्रेजी साहित्य की उपलब्ध रचनाओं में ‘विंडसिंथ’, ‘दी वाण्डरर’ आदि उल्लेखनीय हैं। इनसे स्पष्ट है कि इस युग में कवियों की विशेष रुचि यात्रा-वर्णन तथा रोचक कथाएँ कहने में थी। इस आधार पर यह कहना सर्वथा गलत प्रतीत होता है कि अंग्रेजी साहित्य के अनुकरण में ही हिन्दी साहित्य में कथा का सृजन हुआ । साहित्य कोश में लघुकथा के रूप-लाघव पर विशेष बल देते हुए कहा गया है कि लघुकथा इतनी लम्बी हो कि वह एक बैठक में पढ़ी जा सके । छोटी कहानी या लघुकथा की शब्द संख्या 2500 से कम निर्धारित की गयी है। धनञ्जय ने संक्षिप्ति का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है कि शिल्प या कारण से संक्षिप्त वस्तु-रचना को संक्षिप्ति कहते हैं । जैनेन्द्र कुमार ने कथा का रूप, आकार ही उसका कलेवर या शिल्प माना है । मधुदीप ने अपने लेख ‘लघुकथा : एक विहंगम दृष्टि’ (लघुकथा: बहस के चौराहे पर, सं० सतीशराज पुष्करणा) में लिखा है – ‘लघुकथा के कलेवर के संबंध में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि जीवन के एक तथ्य को उसकी सम्पूर्णता के साथ कम-से-कम शब्दों में ढाल देना अनिवार्य है। सुविधा के लिए हम लघुकथा का कलेवर 80-100 शब्दों से 500-600 शब्दों तक मान सकते हैं । ‘लघुकथा: बहस के चौराहे पर’ में ही संकलित निबंध ‘हिन्दी लघुकथा : एक दृष्टि में’ भूपाल उपाध्याय ने विभिन्न मतों की समालोचना करते हुए लिखा है – ‘लघुकथा विशेष क्षण में जिए लघुजीवन को प्रस्तुत करती है, जो किसी इकाई का अंश न होकर स्वयं आंशिकता में एक पूर्ण इकाई है।’तब 1500 शब्दों वाली रचना (रमेश बतरा : समग्र) के रूप में लघुकथा की परिभाषा करना या शब्द-सीमा पच्चीस से एक हजार शब्दों तक (महावीर प्रसाद जैन समग्र) मानना विशेष अर्थ नहीं रखता; क्योंकि क्षण का विस्तार पृष्ठों में नहीं होता, अगर हुआ तो विकृत या विरूप होगा। आत्मा के समान लघुकथा का निर्धारण अनावश्यक और अर्थहीन है। राधेलाल बिजघानवे ने अपने निबंध ‘लघुकथा : गम्भीर लेखन की जरूरत’ में और भी स्पष्ट करते हुए लिखा है ‘सृजनात्मक स्तर पर लघुकथाओं को शाब्दिक लम्बाई के घेरों में बाँटना उनकी परिधि को प्रतिबद्ध करना है।’ सतीशराज पुष्करणा ने आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री से ‘एक भेंटवार्ता’ में शास्त्री जी द्वारा पारिभाषित शब्द-सीमा अंकित की है ‘लघुकथा को कम-से-कम एक पोस्टकार्ड के आकार से लेकर अधिक-से-अधिक तीन पृष्ठों तक ही होना चाहिए।’ मैं शास्त्रीजी के इस मत से असहमत हूँ; क्योंकि एक पोस्टकार्ड के आकार में मुद्रित लघुकथा की हस्तलिपि एक पोस्टकार्ड में ही आ जाए, यह संभव नहीं है। ठीक उसी प्रकार तीन पृष्ठों में मुद्रित लघुकथा की हस्तलिपि छह पृष्ठों तक हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में लघुकथा में क्षण के स्थान पर जीवन की घटनाओं के अंश की कहानी बन जाएगी, जो किसी भी परिस्थिति में लघुकथा न होकर कहानी का रूप ले लेगी। भले ही लघुकथा को शब्द-सीमा में बाँधना उचित न हो, किन्तु कथा में क्षण भर की बिजली की चमक की आभा-सी घटना लघुकथा को सार्थकता प्रदान करती है। इस कसौटी के आधार पर भारतीय लघुकथाओं की जाँच कर निर्णय करेंगे कि जन्मकाल में लघुकथा का स्वरूप क्या था और उसका विकास-क्रम किस प्रकार पल्लवित होता रहा ।

भारतीय साहित्य में कथा के प्राचीनतम रूप ऋग्वेद में ऋचा के रूप में, उपनिषदों में सूक्त-रूप में परिलक्षित होते हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं में जिस कथा-सूत्र का बीजारोपण हुआ वही उपनिषद में स्वतंत्र कथा-रूप में परिलक्षित है। वैदिक काल की कथाएँ मूलतः उपदेशपरक होती थीं, इसलिए उनमें धर्म, नीति तथा ज्ञान के गूढ़ रहस्यों का होना स्वाभविक है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में 15वें सूक्त की ऋचा संख्या 3 एवं 4 में कथा-बीज द्रष्टव्य है “अर्थात् परमेश्वर अग्नि के तत्त्व को भूलोक में सूर्य के रूप में, अन्तरिक्ष में बिजली के रूप में तथा धरती पर पार्थिव भाग के रूप में उपजाता है और फिर ऋत्विक जन या विद्वान् लोग उसका अपने विभिन्न कार्यों के सम्पन्न करने हेतु प्रयोग करते हैं।”

“अर्थात् अग्नि द्यूलोक में सूर्य के रूप में प्रकाशित होती है। अन्तरिक्ष में विद्युत के रूप में अपनी विद्यमानता का परिचय देती है तथा धरती पर काष्ठ व ईंधन आदि के रूप में प्रकाशित होती है। इस प्रकार रूप ही आवापृथिवमीय संसार में विख्यात हुआ दूसरे पदार्थों को प्रकाशित करना है ।”

ऋग्वेद की दोनों ऋचाओं में अग्नि की महिमा बतायी गयी है। किन्तु प्रथम ऋचा (ऋचा संख्या 3) में यह स्पष्ट किया गया है कि परमेश्वर ने अग्नि को उपजाया है। अर्थात् अग्नि परमेश्वर के अधीन है। इसी भाव बीज का पोषण उपनिषद् काल में केनोपनिषद के तृतीय खण्ड के श्लोक संख्या 3 एवं 6 में लघुकथा के रूप में हुआ है। इस अंश में अग्नि का अभिमान दमन परमेश्वर (ब्रह्म) के द्वारा किया जाता है। इसमें मंत्र तथा पद-भाष्य के माध्यम से कथा स्पष्ट होती जाती है। पद-भाष्य द्वारा मूल-मंत्र का विश्लेषण किया जाता प्रतीत होता है। अब इस उदाहरणं से यह सुस्पष्ट होगा कि मंत्र तथा पद-भाष्य में कितना सामञ्जस्य है ।

मंत्रार्थ – उन्होंने अग्नि से कहा “हे अग्नि! इस बात को मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ?” उसने कहा “बहुत अच्छा ।”

पद-भाष्य-कार्य उसे न जानने वाले देवताओं ने भीतर से डरते-डरते उसके जानने की इच्छा से सबसे आगे चलने वाले सर्वत्र कल्प जातवेदा अग्नि से कहा “हे जातवेद ! हमारे नेत्रों के सम्मुख स्थित इस यक्ष को जानो विशेष रूप से मालूम करो कि यह यक्ष कौन है, क्योंकि तुम हम सब में तेजस्वी हो ।”

अग्नि उस यक्ष के पास गया। उसने अग्नि से पूछा, “तू कौन है ?” उसने कहा -मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चय जातवेदा ही हूँ।”

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर अग्नि उस यक्ष की ओर अभिद्रुत हुआ अर्थात् उसके पास गया। इस प्रकार गए हुए और धृष्ठ न होने के कारण अपने समीप चुपचाप खड़े हुए प्रश्न करने की इच्छा वाले इस अग्नि से यक्ष ने कहा, “तू कौन है” यक्ष के इस प्रकार पूछने पर “मैं अग्नि हूँ। मैं अग्नि के नाम से प्रसिद्ध जातवेदा हूँ” – इस प्रकार अग्नि ने दो नाम से प्रसिद्ध होने के कारण अपनी प्रशंसा करते हुए कहा ।

फिर यक्ष ने पूछा, “उस जातवेदा अर्थात् तुममें सामर्थ्य क्या है ?” अग्नि ने कहा, “पृथ्वी में यह जो कुछ है, सभी को जला सकता हूँ।”

इस प्रकार बोलते हुए उस अग्नि से ब्रह्म ने कहा, “ऐसे प्रसिद्ध गुण और नाम वाले तुझमें क्या वीर्य-सामर्थ्य है ?” वह बोला, “पृथ्वी पर यह जो चराचर जगत है सबको जला सकता हूँ, भस्म कर सकता हूँ। पृथ्वी में यह केवल उपलक्षण के लिए है, क्योंकि जो वस्तु आकाश में रहती है, वह भी अग्नि से जल ही जाती है।” (पद-भाष्य)

तब यक्ष ने उस अग्नि के लिए एक तिनका रख दिया और कहा, “इसे जला।” अग्नि उस तृण के पास गया, परन्तु अपने सारे वेग से भी उसे जलाने में समर्थ नहीं हुआ। वह उसके पास से लौट आया और बोला, “यह यक्ष कौन है इस बात को मैं नहीं जान सका ।” (मंत्र)

इस प्रकार अभिमान करने वाले के लिए ब्रह्म ने एक तृण रखा अर्थात् उसके आगे तृण डाल दिया । ब्रह्म के ऐसा कहने पर कि “तू मेरे सामने इस तिनके को जला, यदि तू इसे जलाने में समर्थ नहीं है तो सर्वत्र जलाने वाला होने का अभिमान छोड़ दे।” वह अपने सारे बल अर्थात् उत्साह कृत सम्पूर्ण वेग से उस तृण के पास गया, किन्तु वह वहाँ जाकर भी उसे जलाने में समर्थ न हुआ ।

उस तिनके को जलाने में असमर्थ वह अग्नि हत्प्रतिज्ञ होने के कारण लज्जित होकर उस यक्ष के पास से चुपचाप देवताओं के प्रति निवृत्त हुआ अर्थात् उनके पास लौट आया और बोला, “इस यक्ष को मैं विशेष रूप से ऐसा नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है?”

वैदिक कथा-साहित्य के विकास क्रम में उपनिषदों में ऋग्वेद की जिन ऋचाओं को लघुकथा का रूप दिया है, उसमें यह एक उदाहरणस्वरूप ऊपर अंकित किया जा चुका है। डॉ० प्रताप नारायण टंडन ने ‘हिन्दी उपन्यास के कथा-शिल्प’ के पृष्ठ 102 में यह अंकित किया है कि पुराणों में भी वेद तथा उपनिषद् साहित्य में विद्यमान कथासूत्रों और संकेतों के आधार पर पूर्ण कथाओं की सृष्टि की गयी। अर्थात् उन कथाओं का मूल कथानक उन्हीं लघुकथाओं पर आधारित है। रमेश श्रीवास्तव ने अपने निबंध ‘लघुकथा: एक अवलोकन’ में पुराणों में सन्निहित लघुकथाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अग्नि पुराण में कहानी को पाँच भागों में बाँटा गया है, जिसमें एक भाग खण्ड-कथा है। यह खण्ड-कथा आज की लघुकथा है। आगे डॉ० टण्डन ने लघुकथा विकास के क्रम में जातक कथाओं के महत्त्वपूर्ण योगदान पर बल दिया है। डॉ० टण्डन के अनुसार ‘जातक साहित्य का रचना-काल पाँचवीं शताब्दी ई० पू० से लेकर पहली शताब्दी ई० पू० तक माना जाता है । इसकी समस्त कथाओं में एक पारस्परिक क्रमबद्धता-सी मिलती है तथा इसका स्त्रोत भी ऋग्वेद ही है । जातक-कथा में गौतम बुद्ध के जीवन-चरित्र के साथ उनके पूर्व के 27 बुद्धों का भी जीवन-चरित्र है। चरित्र-विश्लेषण करते हुए बीच-बीच में भाव स्पष्ट करने हेतु लघुकथाओं का सहारा लिया गया है। ये लघुकथाएँ भी ऋग्वेद-उपनिषद् के समान उपदेशात्मक हैं । यहाँ यह भी उल्लेख करना समुचित होगा कि भारतीय साहित्य में अभिटिप्पण का प्रयोग प्राचीनतम है। अभिटिप्पण के रूप में लघुकथाएँ वैदिक काल में भी प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं।

उपदेशात्मक तथा नीतिपरक लोक-कथा साहित्य के अंतर्गत् ‘पंचतंत्र’ तथा ‘हितोपदेश’ की लघुकथाओं ने लघुकथा-साहित्य को एक नया आयाम दिया। यद्यपि इनमें भी संग्रहीत लघुकथाएँ एक-दूसरे को एक सूत्र में बाँधती हैं; किन्तु, प्रत्येक अपने-आप में स्वतंत्र हैं। भारतीय नीतिशास्त्र के सैद्धान्तिक परिचय की दृष्टि से इनका महत्त्व है। कथा तथा शिल्प की दृष्टि से जातक कथाओं का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है । ‘हितोपदेश’ में कथा-शिल्प का विकास’ में पंचतंत्र का उल्लेख करते हुए यह स्वीकार किया है कि चूंकि में भी ‘पंचतंत्र’ की ही भाँति उपदेशात्मक लघुकथाएँ संग्रहित हैं। डॉ॰ टंडन ने ‘हिन्दी-उपन्यास ये कथाएँ एक विशिष्ट उद्देश्य से लिखी गयीं थीं, अतः भारतीय नीतिशास्त्र के सैद्धान्तिक परिचय की दृष्टि से भी इनका महत्त्व है। प्रसिद्ध यूरोपीय विद्वान सर विलियम जोन्स तथा प्रोफेसर मूरले ने इनकी प्रशंसा करते हुए इनके महत्त्व को स्वीकारा है। डॉ॰ प्रताप नारायण टण्डन ने दृढ़तापूर्वक बल दिया है कि विश्व साहित्य में पशु-पक्षियों विषयक कथाओं का प्रारंभ ‘हितोपदेश’ के द्वारा हुआ है। ‘हितोपदेश’ भी ‘पंचतंत्र’ की शैली में लिखा गया है। परन्तु, इसमें पंचतंत्र की भाँति न तो कथात्मक प्रसंग हैं और न क्षेत्रीय व्यापकता । इसके अतिरिक्त इसकी रचनाओं पर ‘पंचतंत्र’ का बहुत अधिक प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है । कुछ रचनाओं में तो बिल्कुल समानता दीख पड़ती है। उदाहरणस्वरूप, ‘पंचतंत्र’ की प्रथम तंत्र की लघुकथा ‘रंगा सियार’ तथा ‘हितोपदेश’ भाग-3 की लघुकथा ‘रंगा गीदड़’ द्रष्टव्य है। दोनों की कथा एक है, मात्र पात्र प्रस्तुतीकरण में अन्तर है ।

लल्लूलाल जी ने सन् 1801 में ‘सिहांसन बत्तीसी’ तथा ‘बेताल पचीसी’ का देवनागरी लिपि में अनुवाद कर लघुकथा को एक विचारोत्तेजक कथ्य प्रस्तुत किया । लघुकथा के कथानक में अब मोड़ आना स्वाभाविक था। लघुकथा का आरम्भ-काल उपदेशात्मक रूप वैदिक काल में प्रगट हुआ। बाद में इसका विकास नीतिपरक उपदेशों के रूप में हुआ । इसी कड़ी के अन्तर्गत् ‘पंचतंत्र’ एवं ‘हितोपदेश’ की कथाएँ आती हैं। ‘हितोपदेश’ में पशु-पक्षियों का मानवीकरण कर मानव-प्रवृत्तियों को उद्घासित करने में जो सफलता पायी है, वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। ‘सिंहासन बत्तीसी’ एवं ‘बेताल पचीसी’ द्वारा कथा की रोचकता की ओर लेखकों का ध्यान गया। जगदीश कश्यप ने अपने निबंध ‘हिन्दी लघुकथा : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में’ यह अंकित किया है कि सन् 1810 में ही ‘न्यू एनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुस्तानी एटसेट्र’ में ‘लताइफ-इ-हिन्दी’ नाम से लगभग 100 रोचक लघुकथाएँ संग्रहित की गयीं । सन् 1820 में श्री जे० बी० गिल क्राइस्ट ने 100 लघुकथाओं का संकलन ‘आरथोपोग्रैफिकल अल्टीमेटम’ अथवा ‘दि हिन्दुस्तानी स्टोरी टेलर’ प्रकाशित कराया । सन् 1832 में नीतिपरक लघुकथाओं का एक संग्रह ‘हिन्दीवी कथाएँ’ प्रकाशित हुईं ।

सन् 1870 में ‘चौरासी वैष्णवों की वार्त्ता’ लघुकथाओं के प्राचीन तथा आधुनिक रूप की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रकाशित हुई । जगदीश कश्यप ने अपने इसी निबंध में आधुनिक प्रथम लघुकथा ‘विमाता’ के प्रकाशन का उल्लेख किया है। उनके अनुसार आधुनिक लघुकथा का जन्म सन् 1915 माना जा सकता है। इसमें लघुकथा होने के गुण हैं। यह 700 शब्दों के आसपास है । इसमें अन्त तक कौतूहल बना रहता है। इनमें कथ्य और शिल्प का निर्वाह पूरी जिम्मेदारी से किया गया है। किन्तु बलराम ने अपने निबंध ‘हिन्दी लघुकथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि’ में माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ को प्रथम लघुकथा माना है। उनके अनुसार यह लघुकथा सन् 1900 के आसपास लिखी गयी थी । इस प्रकार सन् 1900 ही आधुनिक लघुकथा का प्रयाण-काल माना जा सकता है। तत्पश्चात् श्री पद्मलाल पन्नालाल बख्शी की ‘झलमला’ लघुकथा ‘सरस्वती’ में छपी। यह भी लगभग 650 शब्दों के आसपास है। इसके उपरान्त 400 शब्दों की श्री शिवपूजन सहाय की लघुकथा ‘एक अद्भुत कवि’ मारवाड़ी मासिक (कलकत्ता) में छपी । इतने ही शब्दों के आसपास की भारतेन्दु की लघुकथा ‘कुछ आपबीती कुछ जग बीती’ सन् 1933 ई० में ‘वचन सुधा’ भाग-8, अंक 22 में प्रकाशित हुई। किन्तु डॉ० सतीशराज पुष्करणा के अनुसार 1875 ई० में बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की एक तन्वंगी पुस्तिका ‘परिहासिनी’ प्रकाशित हुई, जिसमें छोटी-छोटी व्यंग्यपरक लघुकथाएँ हैं, जिनमें आधुनिक लघुकथा के बीज तत्त्वों की खोज सहज ही की जा सकती है। अतः भारतेन्दु ही प्रथम लघुकथा-लेखक ठहरते हैं। माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली और बुखार’ नामक कोई रचना उनकी ग्रन्थावली में नहीं है। अतः इस रचना को कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?

विक्रम सोनी ने अपने निबंध ‘लघुकथा तब से अब तक’ में लघुकथा को नयी जमीन देने में राम प्रसाद रावी का योगदान सन् 1940 के आसपास ‘मेरे कथागुरु का कहना है…’ वाक्य से माना है। किन्तु बलराम ने उस निबंध में ‘मेरे कथागुरु का कहना है’ का प्रकाशन वर्ष 1958 माना है ,जो खोजबीन पर सही जान पड़ता है। संभव है रावी ने सन् 1940 में पहली बार इस शीर्षक के अन्तर्गत् रचना आरंभ की हो। इसके बाद श्री नारायण उपाध्याय, कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’, आनन्द मोहन अवस्थी, शरद कुमार मिश्र ‘शरद’, अनूप कुमार शुक्ल, बैकुण्ठ निराला, गुलज़ार, ज्योति प्रकाश, कामता प्रसाद सिंह ‘काम’, श्यामनन्दन शास्त्री की लघुकथाओं ने शिल्प को एक नया मोड़ देते हुए विकास-क्रम को बनाए रखा। डॉ० सतीशराज पुष्करणा की आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री से भेंटवार्ता से यह स्पष्ट है कि शास्त्री जी ने सन् 1938 से 1955 के बीच लगभग सत्तर-अस्सी लघुकथाएँ लिखीं ।

आठवें दशक में लघुकथा एक विधा के रूप में मानी जाने लगी तथा सन् 1974 में ही मेरठ विश्वविद्यालय की हिन्दी-परिषद् ने इसे स्वतंत्र मौलिक विधा के रूप में स्वीकारा। डॉ० स्वर्ण किरण ने अपने निबंध ‘लघुकथा एक सिंहावलोकन’ में सन् 1978 से कुछ समय पहले ही लघुकथा का स्वर्ण-काल माना है। इस काल में कृष्ण कमलेश, डॉ० सतीश दुबे, जगदीश कश्यप, मधुदीप, डॉ० शंकर पुणतांबेकर, भगीरथ, रमेश बत्तरा, विक्रम सोनी, कमल चोपड़ा, प्रबोध कुमार गोविल, सतीशराज पुष्करणा आदि हस्ताक्षरों ने अपना योगदान देना शुरू कर दिया था। अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने लघुकथा विशेषांक निकालकर इस दिशा में सहयोग प्रदान किया । उदाहरणस्वरूप, ‘समग्र’, (अम्बाला शहर, सं० महावीर प्रसाद जैन), ‘कैथल दर्पण’ (सं० भगवान प्रियभाषी), ‘नालन्दा दर्पण’ (सं० डॉ० स्वर्ण किरण), ‘लातूर महाराष्ट्र, (सं० नरेन्द्र अंसारी), बाद में ‘शुभ तारिका’ ‘विवेकानन्द बाल संदेश’ (सं०सतीशराज पुष्करणा), ‘तारिका’, ‘लहर’, आदि उल्लेखनीय हैं। पटना (बिहार) से लघुकथा विधा पर चक्रित अनियतकालीन पत्रिकाओं का प्रकाशन, लघुकथा-साहित्य के व्यापक प्रभाव को दर्शाती है। यह बहुचर्चित लघु पत्रिकाएँ हैं ‘लकीरें’ (सं० नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’) एवं ‘काशें’ (सं० डॉ० सतीशराज पुष्करणा)। मुद्रित पत्रिकाओं में ‘काशें’ (सं० डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘मिनीयुग’ (सं० जगदीश कश्यप), ‘पुनः’ (अनियतकालीन सं० कृष्णानंद कृष्ण), ‘परिधि’ अब ‘परिधि से बाहर’ (त्रैमासिक, सं० नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन) । ‘कहानीकार’ (सं० डॉ. कमल गुप्त) ने सहस्राब्दी उपहार (तीसरा) में लघुकथाओं के विशेषांक को ‘लघुकहानी विशेषांक’ के नाम से अभिहित किया है। संभवतः सम्पादक ने लघुकथा और लघुकहानी के सूक्ष्म अन्तर को सही मायने में नहीं पहचाना है। फिर भी, इस अंक को लघुकथा के विकास में महती योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

लघुकथा ने जीवन की मूलभूत समस्याओं को आत्मसात् कर लेने के कारण अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की है। नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’ ने लोकप्रियता का कारण स्पष्ट करते हुए अपने निबंध ‘साहित्य में लघुकथा का योगदान’ में लिखा है-‘‘लघुकथाएँ चूँकि मानव जीवन के किसी गूढ़ अन्तर्वर्ती सत्य, सन्देश, विचार या अनुभूति की ही छोटी कथा है, अतएव ऐसे कथा के माध्यम से उसे अपने आसपास के जीवन का सच्चा दर्शन होता है, उसे उसमें उसकी आत्मा की पुकार सुनाई पड़ती है। इस प्रकार यह मानवीय तनाव को दूर करने में अल्पावधि में ही सफलता प्राप्त कर लेता है।’’

लघुकथा की लोकप्रियता का ही प्रतिफल है कि इस युग में जितने लघुकथा – संग्रह/संकलन प्रकाशित हुए उतने किसी युग में नहीं हुए थे। वर्ष 1978 से अब तक प्रकाशित लघुकथा-संग्रहों/संकलनों में कुछ प्रमुख निम्न हैं गुफओं से मैदान की और (सं० भगीरय) ‘छोटी बड़ी बातें’ (सं जगदीश कश्यप तथा महावीर प्रसाद जैन), ‘काफिला’ (सं० बलराम), ‘युगदाह’ (सं० प्रभाकर आर्य), ‘लघुकथाएँ’ (सं० मधुदीप तथा मधुकान्त), ‘बिखरे संदर्भ’ (सं० सतीशराज पुष्करणा), ‘अक्षरों का विद्रोह’ (सं० सुशील राजेश), ‘बोलते हाशिये’ (सं० राजा नरेन्द्र), ‘कितनी आवाजें’ (सं० विकेश निझावन तथा हीरालाल नागर), ‘हालात’ (सं० कमल चोपड़ा), ‘उपहार’ (सं० रवीन्द्र अकेला तथा अजय सिंह परिहार), ‘लघुकथा : सर्जना और मूल्यांकन’ (सं० कृष्णानंद कृष्ण), ‘हस्ताक्षर’ (सं० शमीम शर्मा), ‘स्वरों का आक्रोश’ (सं० हरदयाल शर्मा), ‘मानचित्र’ (सं० विक्रम सोनी), ‘आतंक’ (सं० नंदल हितैषी), ‘सबूत-दर-सबूत’ (सं० महेन्द्र सिंह महलान तथा मोहन जोशी), ‘मिट्टी की गंध ‘ (सं० चन्द्रभूषण सिंह ‘चन्द्र’), ‘चीखते स्वर’ (सं० नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’), ‘वर्त्तमान’ (सं० डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘समकालीन हिन्दी-लघुकथाएँ (सं० डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘जमीन की तलाश’ (सं० नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’), ‘देह व्यापार की लघुकथाएँ’ (सं० सुकेश साहनी), ‘बीसवीं सदी : प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ (सं० सुकेश साहनी), ‘पतझड़ के बाद’ (सं० राजेन्द्रमोहन त्रिवदी ‘बन्धु’), ‘समय का सच’ (सं० नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’), ‘धार के विरुद्ध’ (सं० नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’), ‘जिन्दगी के आसपास’ (सं० राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’, ‘शताब्दी शिखर की हिन्दी लघुकथाएँ (सं० कृष्णानंद कृष्ण), कथादेश (सं० डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘आदमीनामा’ (सं० सिद्धेश्वर एवं तारिक असलम तसनीम), ‘उत्कर्ष’ (सं० सिद्धेश्वर), ‘राजस्थान का लघुकथा-संसार’ (सं० महेन्द्र सिंह महलान तथाअंजना अनिल), ‘कल के लिए’ (सं० डॉ० मिथिलेशकुमारी मिश्र), ‘आठ कोस की यात्रा’ एवं ‘दिशाएँ’ (सं० डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘ताकी सनद रहे’ (सं० रामनिवास मानव एवं दर्शन दीप), ‘अक्स-दर-अक्स’, ‘मंटो और उसकी लघुकथाएँ’ ‘हिन्दी की चर्चित लघुकथाएँ’, ‘हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ लघुकथाएँ’, ‘बिहार की हिन्दी लघुकथाएँ’, ‘बिहार की प्रतिनिधि लघुकथाएँ’, ‘प्रत्यक्ष’, ‘आज के प्रतिबिंब’, ‘काशें’ (सं० डॉ० सतीशराज पुष्करणा) आदि असंख्य हैं, उन सबकी चर्चा करना संभव नहीं है।

इनके अतिरिक्त एकल लघुकथा संग्रहों की संख्या भी कम नहीं है, यथा- ‘पाषाण और पंछी’ (श्यामनन्दन शास्त्री) ‘एक और अभिमन्यु’ (सनत मिश्र), ‘कालपात्र’ (दुर्गेश), ‘काँटे ही काँटे’ (मोइनुद्दीन अतहर), ‘बोधक लघुकथाएँ’ (डॉ० रामसिया सिंह), ‘मुखौटे’ (कृष्ण कमलेश), ‘अनावरण’ (मनीष राय यादव), ‘नीम चढ़ी गुरबेल’ (श्रीराम मीना), ‘छोटा आदमी’ (प्रो० ईश्वर चन्द्र), ‘वर्तमान के झरोखे में’ (डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘अपना पराया’ (डॉ० स्वर्ण किरण), ‘खोया हुआ वर्त्तमान’ (सुरेन्द्र गोयल), ‘वनफूल’ (चन्द्रभूषण सिंह ‘चन्द्र’), ‘मार्मिक लघुकथाएँ’ (डॉ० रामसिया सिंह), ‘आपकी कृपा है’ (विष्णु प्रभाकर), ‘रावी की परवर्ती लघुकथाएँ’ (रावी), ‘ज़हर के खिलाफ’ (डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘प्रसंगवश’ (डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘बदलती हवा के साथ’ (डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘उजाले की ओर’ (डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘आग की नदी’ (डॉ० सतीशराज पुष्करणा), ‘ठंडी रजाई’ (सुकेश साहनी), ‘इतिहास गवाह है’ (डॉ० रामनिवास मानव), ‘असभ्य नगर’ (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’), ‘प्रेक्षागृह’ (डॉ० सतीश दुबे), ‘डरे हुए लोग’ (सुकेश साहनी), ‘बूँद में समुन्द’ (चाँद मुंगेरी), ‘बूंद-बूंद सागर’ (सिद्धेश्वर), ‘अस्सी लघुकथाएँ’ (सुरेन्द्र प्रसाद सिंह), ‘सिर उठाते तिनके’ (तारिक असलम तस्नीम), ‘कैक्टस’ (मोइनुद्दीन अतहर), ‘अँधेरे के विरुद्ध’ (डॉ० मिथिलेशकुमारी मिश्र), ‘परिवर्तन’ (माला वर्मा), ‘छँटता कोहरा’ (डॉ० मिथिलेशकुमारी मिश्र), एक और नींव’ (ई० कन्हाई पण्डित), ‘अतीत का प्रश्न’ (मालती महावर), ‘यह भी सच है’ एवं ‘ऐसा भी होता है’ (डॉ० शैल रस्तोगी), ‘राजा नंगा हो गया’ (सुनीता सिंह), ‘यथार्थ के साये में’ (आलोक भारती), ‘कागज के रिश्ते’ एवं ‘रेत का सफर’ (राजेन्द्रमोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’), ‘गांधारी की पीड़ा’ एवं ‘औरत होने का दर्द’ (इंदिरा खुराना), ‘भेड़िया जिंदा है’ (ज्ञानदेव मुकेश), ‘उल्लास’ (चैतन्य त्रिवेदी) आदि ।

लघुकथा विधा की स्थापना में जहाँ संकलनों / संग्रहों का योगदान सराहनीय रहा, वहीं पत्र-पत्रिकाओं का योगदान भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं। प्रारंभिक काल में जहाँ ‘सरस्वती’, ‘मारवाड़ी’ (मासिक) आदि पत्रिकाओं में लघुकथा को पोषण किया तो आधुनिक रूप को सँवारने और जन-जन के बीच लोकप्रियता स्थापित करने में ‘दीपशिखा’, ‘तारिका’ (अब ‘शुभ तारिका’), ‘शिक्षक’, ‘संसार’, ‘सारिका’, ‘साहित्य निर्झर’, ‘भागीरथी’, ‘मिनीयुग’, ‘लघुकथा’, ‘दिशा’, ‘ललकार’, ‘साहित्यकार’, ‘व्योम’, ‘विवेकानन्द बाल संदेश’, ‘युद्ध’, ‘विकल्प’, ‘आघात’ (और बाद में ‘लघुआघात’), ‘शब्द’, ‘मिलाप’ (दैनिक), ‘प्रगतिशील समाज’, ‘डिटेक्टर’, ‘अवसर’, ‘कथासागर’, ‘प्रभात’, ‘अन्तर्यात्रा’, ‘समग्र’, ‘युगदाह’, ‘नईधारा’ ‘सर्वोदय विश्ववाणी’, ‘ग्रहण’, ‘प्रतिबिम्ब’, ‘नवतारा’, ‘कुरुशंख’, ‘परिधि से बाहर’, ‘पुनः’ कम महत्त्वपूर्ण नहीं रहीं ।

किसी भी विधा की स्थापना में आलोचकों का बहुत बड़ा हाथ होता रहा है। खेद है, अबतक इस विधा पर किसी आलोचक ने कलम नहीं उठाई है। अब तक जो भी आलोचनाएँ, समालोचनाएँ प्रकाश में आई हैं, वे प्रायः स्वयं लघुकथाकारों द्वारा ही लिखी गयीं; किन्तु ऐसा लगता है कि निकट भविष्य में कुछ आलोचकों द्वारा लघुकथा विधा पर स्वतंत्र आलोचनात्मक पुस्तकें भी आएँगी। इस श्रेणी में प्रथमतः जाने-माने आलोचक निशान्तर, डॉ० रवीन्द्रनाथ ओझा, राधिका रमण अभिलाषी, डॉ० वेद प्रकाश जुनेजा, डॉ० आदित्य प्रचंडिया, नागेन्द्र प्रसाद सिंह का नाम लिया जा सकता है, जिनका लघुकथा के आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह शीघ्र ही प्रकाश में आने की प्रतीक्षा कर रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक जितने भी आलेखों का पाठ ‘अखिल भारतीय लघुकथा मंच’ के सम्मेलनों में किया है, वे सभी लघुकथा लेखकों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हुए हैं।

लघुकथा-विधा पर विभिन्न लेखकों/निबंधकारों की समालोचनात्मक रचनाएँ प्रथमबार ‘लघुकथा : बहस के चौराहे पर’ नामक ग्रंथ के रूप में डॉ० सतीशराज पुष्करणा ने संपादित कर एक साहसिक एवं ऐतिहासिक प्रयास किया है। इन्हीं के संपादकत्व में ‘लघुकथा : सर्जना और समीक्षा’ भी प्रकाशित हुई। इसके अतिरिक्त इनके संपादकत्व में ‘लघुकथा की रचना-प्रक्रिया’ एवं ‘लघुकथा: एक संवाद’ भी प्रकाश में आ चुके हैं। इस विधा की सफल यात्रा का यह प्रथम पड़ाव इस ग्रंथ के प्रकाशन के साथ वर्ष 1983 ई० में मिला। इस विधा पर प्रथम शोध-उपाधि से विभूषित डॉ० शकुन्तला किरण ने प्रकाशित संकलनों / संग्रहों का विद्वतापूर्ण वर्गीकरण किया है। इस विधा में द्वितीय शोध कार्य डॉ० शमीम शर्मा द्वारा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से सम्पन्न किया गया। इनके अतिरिक्त डॉ० सी० रा० प्रसाद, शंकर लाल, रमेश शर्मा ‘अन्जान’, डॉ० मनु पाठक तथा डॉ० ईश्वर चन्द्र द्वारा शोध सम्पन्न किए जा चुके हैं। कृष्णानंद कृष्ण का प्रथम एकल आलेख- संग्रह ‘हिन्दी लघुकथा स्वरूप और दिशा’ भी प्रकाशित हुआ, जो निश्चय ही इस दिशा में मील का पत्थर है ।

विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा लघुकथा पर नित नए-नए शोध कराए जाने एवं एम. फिल. के लिए स्वीकृति के कारण यह स्पष्ट है कि आज लघुकथा को केन्द्रीय विधा के रूप में स्वीकार किया जा चुका है।

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