” यह विज्ञापन कितने में छपता है ? ” कई मिनट की चुप्पी को तोड़ते हुए मंत्री जी ने उनसे मिलने आए शहर के सर्वाधिक प्रसार वाले दैनिक समाचार -पत्र के मालिक से पूछा। विज्ञापन के आकार को आँकते हुए उन्होंने जवाब दिया – “यही कोई एक – सवा लाख रुपये।”
पिछले तीन सप्ताह से अपने दैनिक में बंद सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन को फिर से शुरू कराने मंत्री के पास पैरवी में पहुँचे महोदय को उनकी तल्खी का आभास तो था, किंतु विज्ञापन की दर संबंधी उनके सवाल पर उनका चौंकना स्वाभाविक था।
“क्या आप जानते हैं कि इस साबुन के इस्तेमाल से शरीर में खुजली होने लगती है। विज्ञापन छापने से पूर्व आप इसकी जाँच नहीं करते?”
“सर यह विज्ञापन है और हम विज्ञापन में प्रकाशित तथ्यों की पड़ताल और विश्लेषण नहीं करते।”
” मैं कह रहा हूँ। कहिए तो यह बात आपको लिखकर भिजवा दूँ? ”
” महोदय हम ऐसा नहीं कर सकते। किसी विज्ञापन के विरोध में खबरें नहीं छापी जा सकतीं। ऐसा करना व्यापारिक दृष्टिकोण से अनुचित है।”
“अच्छा! जब आप लाख – सवा लाख के विज्ञापन के लिए गुण- अवगुण, उचित- अनुचित की अनदेखी कर सकते हैं, फिर जो सरकार करोड़ों रुपये का विज्ञापन आपको मुहैया कराती है, उसकी नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं की समीक्षा, विश्लेषण या फिर उसमें मीन-मेख कैसे निकाल सकते हैं आप ?”
वह निरुत्तर हो चुके थे। उन्हें मंत्री जी की नाराजगी और विज्ञापन रोके जाने का कारण समझ में आन लगा था। वातानुकूलित कमरे में अपने माथे पर छलछलाती पसीने की बूँदों को रुमाल से पोंछते हुए उन्होंने कहा- “महोदय आपको भविष्य में शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।”
कई दिनों के प्रयास के बाद बहुत मुश्किल से मंत्री जी से हासिल की गई मुलाकात का वक्त समाप्त हो चुका था।
दफ्तर लौटकर दैनिक के मालिक ने तुरंत स्थानीय संपादक को दूसरे राज्य में भेजा और नए संपादक को प्रत्येक 10- 15 दिनों के अंतराल पर मंत्री जी से मिलते रहने का मौखिक फरमान जारी किया।
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