“धीरे… सँभलकर!” कहते हुए माँ ने उसका हाथ थाम लिया।
“अरे माँ, छोड़ो भी,” वह हल्का-सा मुस्कराया, “रोज़ जाता हूँ। अपना काम भी करता हूँ।”
माँ ने हाथ छोड़ दिया। वह घर से बाहर निकल गया। बैसाखियों की ठक-ठक गली में दूर तक सुनाई देती रही। दरवाज़े पर खड़ी माँ उसे तब तक देखती रही, जब तक वह मोड़ के पीछे ओझल नहीं हो गया।
शाम ढली, तो गली बच्चों की आवाज़ों से भर गई। माँ आँगन में बैठी थी; पर उसका ध्यान उन आवाज़ों में नहीं था। वह किसी और आहट का इंतज़ार कर रही थी। कुछ देर बाद वही परिचित ठक-ठक सुनाई दी। माँ लगभग दौड़ती हुई बाहर आई।
उसे देखते ही बेटा हँस पड़ा—”आज फिर लेने आ गई?”
माँ ने कोई उत्तर नहीं दिया। बस उसकी बैसाखियाँ पकड़ लीं और उसके कंधे पर हल्के से हाथ रख दिया।
तभी पड़ोसन बोली, “बहन, अब तो इसे आदत हो गई है। तू भी इतनी चिंता मत किया कर।”
माँ ने बेटे की ओर देखा। वह सहारा लेकर चारपाई पर बैठ रहा था। धीरे से बोली, “चलने की आदत इसे पड़ गई है; परन्तु निश्चिंत होना मुझे नहीं आया।”
माँ बैसाखियाँ उठाकर दीवार से टिकाईं और चुपचाप भीतर चली गई।
बेटे ने दीवार से टिकी बैसाखियों को देखा और जाती हुई माँ को देखा। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई।
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सितम्बर 2026
देशदीवार से टिकी बैसाखियाँ Posted: September 1, 2026
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