तुम बहुत बदल गईं?” माँ नाराज दिखी।
“वो कैसे माँ!” उसे झटका लगा।
“तुम्हें पता था कि शादी में आ रही हो, तो कम से कम चाचा जी परिवार के लिए कुछ ले आतीं। रिवाज़ है बेटा, शादी के घर खाली हाथ कौन जाता है..” माँ ने आह- सी भर कर कहा।
जिस माँ ने अपने लिए आज तक कुछ नहीं माँगा, हमेशा कुछ न लाने की हिदायत और ’यहाँ सब मिलता है’ की दलील दी, वही आज ‘लोगों के कुछ कह देने’ के डर से भयभीत दिखीं।
“माँ, सोचा था कि यहीं से ले कर कुछ दे दूँगी।”
“वो तो ठीक है बेटा, पर आज सुबह बड़की और छोटी अपने बच्चों के साथ कैसी ललक से तेरे पास आईं। तेरे पास कुछ होता, तो हाथ पर रख देती और वो भी खुश हो जातीं कि बड़ी बहन बाहर जाकर उन्हें भूली नहीं।”
“भूली थोड़े ही हूँ माँ…” वह धीरे से बोली। बाहर से आए सामान का क्रेज़ चचेरी बहनों में बुझ गया था और माँ अचानक बहुत भावुक हो चुप हो गईं थीं। वह भी दुखी हुई कि माँ उसे समझ नहीं रहीं!
खैर, उसे जो करना था, उसने किया। अगले कुछ दिन वह बड़े भाई के बेटे और बेटी के साथ बाज़ार जाती रही। अपने लिए भी सारी शापिंग यहीं से करती आई है और अब तो शादी की खरीदारी थी यह।
शाम को अपने बिस्तर पर उसने पूरा पसारा फैला दिया। माँ, चाची, बड़की, छुटकी, भैया-भाभी.. सबको आवाज़ लगाकर बुला लिया। सब इतना सामान देख कर हैरान थे, वह मुस्कुराकर इसको साड़ी, उसको कॉस्मेटिक, बच्चों को खिलौने देने लगी। चाची-चाचाजी के लिए भी कपड़े थे।
माँ ने सबकी हँसी और बातों के कुछ थमने पर, भरे मन से कहा,“यही सब वहाँ से ले आती, तो बच्चे पहले ही खुश हो जाते!”
चाची ने माँ की तरफ़ हैरानी से देखते हुए कहा,“अरे जिज्जी, वैसे तो इतने सब की ज़रूरत ही नहीं थी, फिर जानती तो हैं आप कि एयरलाइंस अब एक ही बैग लाने देती है, कोई क्या लाए? और सब कुछ तो यहीं मिलता है वह भी बेहतर दामों में।”
फिर उसकी तरफ़ मुड़कर बोलीं, “बेटा, दुकानदार से कपड़ा छोटा- बड़ा होने पर साइज़ बदलने को कह दिया था न?”
वह हैरान- सी चाची को देख रही थी, सिर अपने आप सहमति में हिल गया।
वे फिर माँ को देखते हुए हँसकर बोलीं, “देखा जिज्जी, यहाँ से खरीदे कपड़े में नाप का भी झंझट नहीं। तूने अच्छा किया कि सब यहीं से लिया बेटा.. और फिर अधिकतर कपड़े तो यहीं से एक्सपोर्ट होते हैं।”
माँ चाची की बात पर राहत से मुस्कुरा दीं और वह तो इतनी खुश हो गई कि चाची से लिपट ही गई। उसे लगा बदलाव तो आ रहा है , हम ही शायद उसे देख नहीं पा रहे।
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