हिसाब टकुए की तरह सीधा था। तीन कट्ठा जमीन और तीन भाई। बड़े भाई की उम्र पक चुकी थी,कभी टपक कर मिट जाते। उनकी अब कोई अंतिम इच्छा थी,तो सिर्फ यह कि उनके जीते जी घर का बंटवारा न हो। लेकिन यह ख्वाहिश पूरी न हो सकी।
पुराने घर को तोड़कर ईंट – खपड़े भीबाँट लेना आसान ही था।मंझले भाई ने दीवारें ऊंची कर लीं और महीने भर में एक आँगन के तीन सहोदर भाई एक – दूसरे के पड़ोसी बनने लगे। लेकिन बड़े भाई का मन और भी विदीर्ण हो गया,जब मँझले भाई ने अपने पक्के घर की दीवारों में खिड़की तक नहीं छोड़ी। बड़े और छोटे भाई की औक़ात ऐसी न थी कि वे मँझले भाई की तरह तुरंत पक्की दीवारें उठा लेते, वे बाप – दादा के बनाये हुए घर के बँटवारे के बाद झोपड़ियाँ भर खड़ी कर सके थे।
बड़े भाई को मँझले भाई के उठ रहे घर की दीवारों ने विदीर्ण कर दिया। उनकी निस्तेज आँखें दीवारों में खिड़कियाँ ख़ोज – खोज़ कर उदास हो रही थीं।
बड़े भाई ने अपनी पत्नी को सुबह – सुबह उठाया, मँझले भाई की ऊँची होतीं सीढ़ियों पर चढ़कर बैठ गए। उन्होंने मँझले भाई को अपने क़रीब ज़मीन पर बिठा लिया :
“रामनाथ! इन दीवारों में खिड़कियाँ नहीं छोड़ीं ?”
मँझले भाई ने तुरंत उत्तर दे दिया : “बगल में आपकी जमीन है,भैया! मेरी जमीन होती,तो खिड़कियाँ बंद न होतीं।’’
बड़े भाई चुप रहे; लेकिन अधिक देर नहीं : “भाई! अब कितने दिन जिऊँगा! तुम्हारी खिड़कियों से जो हवाएँ गुजरेंगी,वे मेरे घर के संवाद भी तो तुम तक ले जाएँगी। सुनो,हम जमीन बाँट चुके, हवाएँ कैसे बाँटेंगे!”
मँझला भाई किसी अनिर्वचनीय आवेग से भर उठा। उसकी भौजाई ने स्नेहपूर्वक उसका हाथ थाम लिया : “रामनाथ! दीवारों की खिड़कियाँ न खुलेंगी, तो हम गोतनियों का सुख- दुःख दबा ही रह जाएगा।’’
बड़े भाई ने फिर समझाया : ” हम ज़मीन के ऊपर का हिस्सा नहीं बाँट सकते,भाई! दीवारों के भीतर की हवाओं को बाँधना किसी चिड़िया को क़ैद करने के बराबर है। “
पता नहीं, मँझला भाई अपनी दीवारों में खिड़कियाँ कब खोलता, लेकिन बड़े भाई – भौजाई को छूकर जो हवाएँ उसके करीब आईं, वे देर तक ठहरी रहीं। कह नहीं सकते कि हवाओं में केवड़ा फुलाया था कि केसर उपजा था। हवाएँ उठीं , तो मँझले भाई के कानों में उतरने लगीं : ” बड़ा भाई वास्तव में बड़ा होता है, रामनाथ!”
हवाएँ तेजी से बह चलीं, वे मँझले भाई की दीवारों में खिड़कियों के लिए सिर पटक रही थीं।
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