आज अपनी पसंद की लघुकथा के बारे में बात करते समय मुझे ,कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण और सार्थक लघुकथा याद आती हैं। मेरा मानना है कि लघुकथा लिखना, कोई स्वतः ही लिख जाने वाली प्रक्रिया नहीं है। बूँद बूँद से सागर को भर देने जैसा ही कुछ उपक्रम है, जो किसी छलनी से छन कर कुछ अच्छा समेट लेने और बाक़ी का सारा कुछ वापस, जस का तस रख देने जैसा ही है।
मुझे जो लघुकथाएँ याद रहीं, उनमें से जिनको आप तक पहुँचाना चाहता हूँ। उनमें पहली है , भाई रमेश आज़ाद की लिखी हुई एक बड़ी ही ख़ूबसूरत लघुकथा-
1-छाता
भूतपूर्व जमींदार सरजुग सिंह अपने दालान में बैठे पड़े दुपहरी बिताया करते थे और रास्ते चलते लोगों के प्रणाम के उत्तर में उसका हाल चाल पूछ लिया करते थे।
जेठ की दोपहरी थी, एक सूटेड -बूटेड मुसाफ़िर छाता लगाए चला आ रहा था । सरगुज़ बाबू को उसने प्रणाम किया, तो उन्हे पहचान हुई कि यह तो धारी महतो का बेटा है , सरगुज़ बाबू ने उसे पास बुलाया, हाल- चाल पूछा और फिर छाते की क़ीमत।
‘‘चालीस रुपये’’
और सरगुज़ बाबू ने चालीस रुपये देकर छाता अपने क़ब्ज़े में कर लिया ।
( कथादेश , फ़रवरी 2007 )
दूसरी लघुकथा है -भाई दिनेश पालीवाल जी की –
डर
अजीब उलझन में पड गया हूँ भाई । एक आदमी ने मुझे अपना बकरा देते हुए कहा कि बकरे को रोज पाँच किलो चने खिलाओ , परंतु उसने कहा है कि बकरे का वज़न पाँच महीने बाद भी ना बढ़ पाए, तो वह मुझे बीस हज़ार रुपये इनाम देगा और बकरे पर हुआ ख़र्च भी अलग से !
तो इसमें उलझन क्या है , उसने पूछा ।
उलझन है कि पाँच महीने तक रोज़ पाँच किलो चने खिलाएँ तो बकरे का वज़न बढ़ेगा ही। वह मोटा तगड़ा होगा ही ।
मैं शर्त हार जाऊँगा , हार गया तो हर्जाने में बीस हज़ार रुपये मुझे देने होंगे और बकरे पर हुआ खर्च भी नहीं मिलेगा ।
मेरे पास एक तरकीब है ,अगर आज़मा पाओ तो ।
फौरन बताओ । वह अधीर हो उठी ।
किसी बंजारे की सहायता से एक भेड़िया पकड़ लाओ। उसे बकरे के साथ बाँध दो , फिर बकरे को कितना भी खिलाना पिलाना , उसका वज़न दस ग्राम भी नहीं बढ़ेगा ।
( हंस अक्तूबर, 2007)
इन दोनों लघुकथाओं में पहली लघुकथा में जहाँ समाज में बराबरी पा जाने का मूल्य चुकाना पड़ता है , वो जमींदार सरगुज़ सिंह , धारी महतो के बेटे के उस प्रतीक को उससे ख़रीदकर छीन लेता है जो उसको सरगुज़ सिंह से थोड़ा ऊपर , थोड़ा अलग बना देता है।
समाज में एक वर्ग को अपने बराबर ला पाने की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
वहीं दूसरी लघुकथा आपस की ईर्षा में बकरे के सामने भेड़िया खड़ा कर देने की बात भी , समाज की विरूपताओं को दर्शाता है, एक डर जो भेड़िए के रूप में बकरे के सामने रहेगा तो बकरा क्या खा पायेगा, एक उत्कृष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है, किसी बड़े डर के कारण दूसरा व्यक्ति जीवन ही नहीं जी पाता ।
लघुकथा लिखने से पहले की किंचित् -सी भी तैयारी , लघुकथा को छोटा और कालजयी बना देता है।
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राजेन्द्र कुमार कनौजिया, मोहाली , पंजाब
7888341896