अगस्त 2026

देशस्मृति शेषः स्नेह गोस्वामी की लघुकथाएँ     Posted: August 1, 2026

1-तीन तलाक़

पहला तलाक़

तुमसे पहला तलाक़ तो उसी दिन हो गया था, जिस दिन डोली तुम्हारे आँगन में उतरी थी। मायके से आया उपहार के नाम पर घरभर का सारा सामान बेदर्दी से यहाँ-वहाँ बिखरा पड़ा था।

“इतनी पतली अँगूठी, पतरा ही थमा दिया कँगलों ने।” यह सास थी।

“और आजकल ये मोपेड कौन देता है! कार न सही, कम-से-कम एक ढंग का मोटरसाइकिल तो दे देते।” देवर अपना राग गा रहे थे।

“और ये चादर कितनी सस्ती! ढंग की एक-दो ही दे देते।”

एक-एक चीज़ का बख़िया उधड़ रहा था और तुम सबके बीच मौन धरे बैठे थे, जैसे सब तुम्हारे मन का ही कहा जा रहा हो। एक तो घर से बिछुड़कर नए माहौल में आने की घबराहट, ऊपर से ये सब बातें… रो पड़ी थी मैं। मन में बँधी रिश्ते की गाँठ का एक धागा टूट गया था। लगा, आज इस घर से दाना-पानी ख़त्म, पर तुम्हारी छुअन से पिघला मन और मुट्ठी में टूटा धागा ले मैं फिर से तुम्हारे साथ चल पड़ी थी।

दूसरा तलाक़

सोचा था, अपनी सेवा और व्यवहार से धीरे-धीरे सबका मन जीत लूँगी। इसलिए बिना कोई शिकायत किए सारे घर का काम सँभाल लिया था। देह की चिंता न करके दिन-रात सबको ख़ुश करने में लगी रहती, पर सिवाय तानों के कभी कुछ नहीं मिला। कल बुख़ार था, उठने की बिल्कुल हिम्मत नहीं हो रही थी। ऊपर से गालियाँ और ताने। ख़ैर, यह तो अब आदत हो गई थी, पर जब माँ-पापा को भी गालियाँ शुरू हो गईं तो रहा नहीं गया।

“अम्मा, मुझे गरियाकर मन नहीं भरा क्या, जो अब उनको भी गाली देना शुरू हो गई हो। मुझे चार फ़ालतू कह लिया करो, पर उन्हें तो बख़्श दो।”

तुम शायद भीतर कहीं थे। लपकते हुए आए और एक ज़ोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर जड़ दिया।

“अब बोलना भी सीख गई हो! हिम्मत कैसे हुई अम्मा से ज़ुबान लड़ाने की!”

कोई सफ़ाई नहीं, कोई वकील नहीं। सीधे अपराधी घोषित। कहीं दो धागे ज़ोर से टूट गए थे। तुम अपनी ग़लती के बावजूद पूरे दस दिन रूठे रहे थे।

तीसरा तलाक़

आज मेरी बेटी ने जन्म लिया है और एक बार फिर मैं बिना किसी अपराध के अपराधी घोषित कर दी गई हूँ। नाराज़गी के मारे सभी लोग हम माँ-बेटी को यहीं छोड़ घर जा चुके हैं। रिश्तों की गाँठ पूरी टूट चुकी है। जानती हूँ बिटिया, सुबह होते ही वे हमें लेने आएँगे। मुफ़्त में काम करनेवाली ऐसी नौकरानी कहाँ मिलेगी जो दिन-रात सबका हुक्म बजाती रहे। लेकिन अब और नहीं। सम्मान के लिए लड़ना पड़ा तो लडूँगी। ज़रूरत पड़ी तो इस बार तलाक़ मैं दूँगी और वह भी फ़ाइनल वाला।

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2-फुर्सत

               वक्त ने कभी इतनी फुर्सत ही नहीं दी थी कि एक साथ बैठकर दो प्यार की बातें कर लें। कभी मिली भी, तो पहले माँ बाप ,तो फिर बच्चों का संकोच आड़े आ जाता रहा। अन्तरंग क्षणों में भी बहनों की शादी, बच्चों की यूनिफार्म, उनकी टयूशन नही चर्चा का विषय रहे।

               अब जब बच्चे अपने अपने काम धंधे में सेट हो गए हैं। अपनी रिटायरमेंट के बाद के अगले दिन गुनगुनी धूप में चाय पीते हुए उन्होंने प्यार से पत्नी को देखा, ‘‘आज शाम झील किनारे गोलगप्पे खाने चलोगी।’’

               पत्नी ने भी मुस्कुराकर कहा, ‘‘फुर्सत है ,तो डाक्टर के पास चले जाओ। कई दिनों से खाँस रहे हो। अदरक की चाय से तो कोई फर्क नहीं पड़ रहा।’’

               ‘‘तुम भी चलो, तुम भी तो घुटनों के दर्द से हाय हाय कर रही थी।’’

               ‘‘मैंने मूव लगा ली है। अब ठीक है। तुम चले जाओ।’’

               ‘‘और तुम?’’

               ‘‘मैंने गैस पर गाजर का हलवा चढ़ा रखा है। वो सुमंत का दोस्त है न रंजन ,वो कल जा रहा है पुणे।उसके हाथ भेज दूँगी। सुमंत को बहुत पसंद है न। बेचारी बहू को तो नौकरी में कुछ बनाने खिलाने की फुर्सत ही नहीं मिलती।’’

उनका मन किया आवाज देकर कहें, तुम्हें कहाँ फुर्सत मिलती है। पर चुप ही रह गए। सारी जिन्दगी उन्हें ही कहाँ फुर्सत मिली कुछ कहने सुनने की।

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3- घनी छाँव

 महानगर की रेलमपेल । चारों ओर कंक्रीट का जंगल , कहीं कोई जान पहचान नहीं। जो जानते हैं , वे भी अपने आप में इतने अस्तव्यस्त कि शायद ही कभी दुआ सलाम होती हो ।

नवीन को इस शहर में आए दस साल होने को हैं । यहाँ पढ़ने आया था , नौकरी भी यहीं ढूँढ ली और हमेशा हमेशा के लिए यहीं का हो गया ।

इस बीच शादी हो गयी , दो प्यारे से बच्चे हो गये , नीता भी एक दफ्तर में काम करने लगी । सब कुछ ठीक चल रहा था कि शहर में बच्चा चोरी और बलात्कार की घटनाएँ अचानक बढ गयीं । नवीन और नीता को अब दिन में ऑफिस में चैन न आता , न रात में नींद , हरपल एक अदृश्य भय घेरे रहता । नौकरानी पुरानी थी फिर भी संशय नागफनी की तरह जब तब सिर उठा लेता ।

सीसीटीवी की फुटेज कई कई बार खँगाली जाती पर डर पीछा ही नहीं छोड़ रहा था ।

आज भी इन्हीं संशयों से जूझते हुए वह घर पहुँचा तो भीतर से किलकारियों और कहकहों की आवाजें आ रही थी । ऐसा तो कभी नहीं होता । जब वे घर लौटते हैं ,बच्चे या तो कम्प्यूटर पर कार्टून देख रहे होते हैं या कोई गेम खेल रहे होते हैं । एकदम शमशान जैसी शांति पसरी होती है, अजीब सी मनहूसियत वाली शांति । आया बच्चों को टीवी या कम्प्यूटर में व्यस्त कर खुद कहीं और व्यस्त होती है ,पर आज तो उलटी गंगा बह रही थी। उसने अंदर प्रवेश किया । बच्चे दादा से मस्ती में लीन उनके कंधों पर सवार थे ।

“प्रणाम पापा, आप कब आए?”

“दोपहर में।”

“तू तो आता नहीं , मैंने सोचा मैं ही दस पंद्रह दिन तेरे पास लगा आऊँ।”

उसे लगा , तेज धूप में चलते- चलते अचानक एक घने बरगद की छाँव तले आ गया है। आज रात वह निश्चिंत होकर सो सकेगा ।

“पापा, जब तक आपका मन करे, आप रहिए।”

बेटा ,मैं सोमवार चला जाऊँगा ।

दोनों बच्चे टाँगों से लिपट गए -“हम आपको जाने नहीं देंगे।”

“मैं तो दरवाजा बंद कर लूँगा” यह आहिल था ।

पापा मंद- मंद मुस्कुरा रहे थे ।

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4-झड़ते गुलमोहर का मौसम   

करीब दो घंटे से मैं यहाँ छत पर रेलिंग के सहारे खङा हूँ । इस बीच एक बार पत्नी चाय का कप पकड़ा गई है जो हाथ में पकड़े पकड़े ही ठंडा गयी है । छत से धूप लगभग जा चुकी है । यहाँ मुँडेर पर कतरा भर धूप बची है, जो मेरे कंधों और सिर को गरमाए हुए है ,वरना पूरी छत इस समय ठंड के आगोश में हैं । नीचे सड़क पर किनारे किनारे उगे गुलमोहर का पत्ता पत्ता गिर चुका है । पत्र विहीन टहनियों वाले पेड़ बेहद उदास लग रहे हैं । जनवरी में अमूमन ऐसा ही होता है । हर साल पतझड़ इन पेङों का सब कुछ छीनकर इन्हें कंगाल बना देता है । कोहरे में लिपटे ये इसी तरह चुपचाप खड़े अपनी बेबसी पर आँसू बहाते दिखाई देते हैं । मानो नए कपङों का इंतजार करते करते बच्चे उदास होकर कोने में बैठ गए  हो और वह कोने में उगी नीम  मुझे  अधफटे कपड़े पहने ठंड में ठिठुरती  हर मंगल को मंदिर के सामने भीख माँगने के लिए खड़ी भिखारिन जैसी लगती  है जिसकी मुट्ठी खाली है । सड़क इस समय सुनसान हो चली है ।

मैं चोर दृष्टि से सामने वाले घर की खिड़की पर नजर डालता हूँ । वहाँ अभी रोशनी की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही । न ही कोई हलचल हो रही है । यह मेरी दसवीं कोशिश है । करीब एक घंटा पहले सुहासिनी अपने बच्चों के साथ आटो से उतरी थी । मात्र पीठ ही दिखाई दी थी । सब एकदम चुप । पहले यह घर सुबह से शाम तक कहकहों से गुलजार रहता था । खिड़कियाँ खुली और रोशनचिराग । सुहासिनी के माथे पर बड़ी- सी रुपया साइज बिंदिया , होठों पर गहरे मैरुन रंग की लिपिस्टिक , दिपदिप करती सीमांतरेखा और एक से एक दामी साड़ियाँ । चेहरा चमकता रहता । अचानक दफ्तर से लौटते उमेश की कार जा टकराई थी पेड़ से और मिनटों में सब खत्म । सुहासिनी न रोई न चिल्लाई । बस चुप हो गयी । बिंदी सेंदुर सब पीछे छूट गए  । कर्मकाण्ड निभाकर सब रिश्तेदार विदा हुए तो भाई जिद करके उसे और बच्चों को अपने साथ ले गया था । तब से बंद था यह घर । पूरे दस दिन बाद लौटी है सुहासिनी । पर कहाँ है  , कैसी है , बस एक झलक देखना चाहता हूँ । न जी न , कोई उल्टी सीधी बात मन में न लाइए । मैं तो महज़ एक पड़ोसी के नाते उसे देख भर लेना चाहता हूँ । कोई वासना छोड़ , कोई लालसा भी मन में नहीं । हमेशा इस समय उमेश के इंतजार में दरवाजे पर खड़ी मिलती थी, तो देख लेता था । उसी तरह देखना चाहता हूँ ।   बीवी इस बीच कई बार चाय के लिए पुकार चुकी है ।  पर  जा ही नहीं पा रहा । पैरों से सरदी चढ़नी शुरू हो चुकी है । जाना ही होगा । मैं बेमन से नीचे जाने के लिए मुड़ने से पहले एक बार फिर बंद खिड़की को देखता हूँ । खिड़की अभी भी बंद है ।

अचानक नीचे पत्नी की किसी से बातें करने की आवाजें सुनाई दे रही हैं । मन में एक किलक-सी उठी – अरे जिसे मैं यहाँ खोज रहा था , वह मेरे किचन में । लपकते हुए नीचे उतरता हूँ । तब तक वह जा चुकी है । पत्नी चाय का कप थमाती हुई सूचना देती है – सुहासिनी लौट आई है । दूधवाले के लिए पूछने आई थी । सुबह उसे दूध भिजवाना है । अचानक उसकी नज़र मेरे चेहरे पर पङी –आप भी न ,कुछ ज़्यादा ही सैंटी हो जाते हो । पतझड़ में गुलमोहर के पत्ते झड़ ही जाते हैं । देखना महीने भर में पहले जैसे हो जाएँगे ।

“पर पहले वाले पत्ते तो गए   …।”

“कुछ कहा आपने?”

“मैंने ! नहीं।” मैं अपनी स्टडी की ओर मुड़ गया ,क्योंकि कुछ बातों का कोई मतलब नहीं होता 

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5-वह जो नहीं कहा

     सुबह 6 बजे

सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है, आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है, मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँ, वर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं– ‘सुनती हो चाय बनाओ, जल्दी से खाना लाओ, चादर नहीं झाड़ी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोई रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात को दोगी।’ पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है ! आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होगे, फिर भी बाय!

सुबह 10 बजे

सुनो जानू, मीटिंग शुरू हो गई क्या? पक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया। बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनाया, चटखारे लेकर खाया। रोज-रोज आलू के पराँठे खाके उब गई थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं परोंठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूँगी। जब तुम घर होते हो ,तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं, या फिर कोई मैच; वह भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे, वरना टी.वी. बंद। अरे कोई अच्छा-सा सीरियल शुरू हो गया है, इसलिए बाय!

दोपहर 3 बजे

जानू, आज मैंने कई दिनों बाद फ़िल्म देखी। लगा था, जिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं, दिल अभी धड़क रहा है। पुरानी फिल्म थी, साहब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी है; गरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली से और शराब से फुर्सत नहीं। बीवी बेचारी सारी जिन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियाँ क्यों अच्छी लगती हैं? बेशक कोई बाहर वाली घास भी न डाले, पर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रर्क्खेगें। अरे, आज सफाई तो की ही नहीं। चलो, अब थोड़ी सफाई कर ली जाय, फिर खाने के बारे में सोचूँगी। बाय!

शाम 7 बजे

जानू,  शाम को सफाई में ही तीन घण्टे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजा, रोशनदान झाड़कर चमकाए। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलीं, सोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी, जो रात तुम्हारे लिए बनाई थी, उसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ,  ठीक! बाय !

रात 11 बजे

सुनो जानू, शाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ीं। खाया ही आठ बजे था, पर कॉफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था ,सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थें, पर लगा नहीं कि एक साल बाद देखे। वही कहानी, वही करेक्टर, वही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाइट!

रात बजे

सुनो जानू,  तुम तो सो चुके होगे, पर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें  सुबह से अब तक नहीं सुनीं। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटो के बिना सोने की आदत नहीं रही ,इसलिए। कारण जो भी हो, पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत होकर सोना चाहिए न,  फिर भी नहीं सोई। तुमसे पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी;क्योंकि जब तुम घर में रहोगे ,तो यह घर तुम्हारा ही होगा।  तुम ही बोलोगे, तुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ़– ‘जी, आई जी, जी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है।

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