छोटी कहानी और अब लघुकथा। लगता है कि किसी दिन कहानी इतनी छोटी हो जाएगी कि शुरू ही नहीं होगी। लेकिन जैसे उपन्यास और छोटी कहानी में मर्यादा-भेद है, उसी तरह लघुकथा की अपनी पृथक् स्वरूप-विशेषता है।
लघुकथा की लघुता से संक्षेप या लाघव व्यंजित नहीं होता । गल्प-विधान में लघुकथा गुरुता की साधना है। मितव्ययिता इसकी मंत्रशक्ति तथा व्यंग्य इसके मर्मप्रकाश के चलते है।
जीव, जगत् और जीवन के विशिष्ट दृष्टिकोण के अधीन समग्र विन्यास वाली गल्पकृक्ति को उपन्यास कहते हैं। भेद यही है कि अब उपन्यास से रूप का रस जाता रहा है और जहाँ माँसलता थी, काया थी, पार्थिवता थी, वहाँ अब चेतना की बिन्दुसरणि चलने लगी है; तरलता आ गई है, जहाँ भाव का स्नेहन नहीं; बल्कि मानसिक उपादानों और आयामों का न्याय-साम्राज्य है। छोटी कहानी में लाघव की साधना है, अर्थात् एक इकाई की अपने में पूर्ण महिमा, जो न पीछे की ओर, न आगे की ओर निर्भर करे। पूर्वापर याचना से स्वतंत्र चरित्र के किसी एक पक्ष में वातावरण के एक भाव-सौरभ में, परिस्थिति की एक मुद्रा में भी वही रम रहा है जो उपन्यास की दीर्घ लीला-योजना में। और यही छोटी कहानी का दर्शन और जीवन है। यह सब होते हुए भी इकाई देश की चेतना है।
लघुकथा की इकाई से अधिक क्षण की कारयित्री प्रतिभा है और यह काल की चेतना से अनुप्राणित होती है। लघुकथाकार व्यापक तत्त्व से अधिक सत्य की एक विद्युच्छटा का कायल है यह काल के अनन्त प्रवाह में बहती जानेवाली जीवनधारा के एक जलबिन्दु को विद्युत-सक्रिय, ज्योतित और नवमूल्यमंडित दिखा देता है। उसका प्रिय प्रतीक चक्र है और किसी नैमित्तिक माध्यम से वह नित्य सत्य की एक चिनगारी भेंट करता है, वह चिनगारी जो आवरण को जला देती है। वह पहले द्रष्टा है, इसलिए स्रष्टा है। इसलिए उच्चकोटि की लघुकथाओं में हार्दिक साक्षात्कार का द्वन्द्व और परिहार रहता है, न कि रसमग्नता और शान्ति की स्थिति। जीवन की विस्तृत-व्यापक भूमि घनीभूत होकर छोटी कहानी की संतप्त इकाई में आ जाती है, जीवन का नित्य सनातन विभु लघुकथा के एक क्षण में गुरुभाव से व्यंजित हो जाता है ।
लघुकथा की गुरुता इस बात में भी है कि इसके भाव में मात्र रस की सिद्धि नहीं होती, इसकी मार्मिकता में ज्ञान-प्रकाश जैसा होता है। यह भी पात्र और घटना को सगुण-साकार रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन उनके भीतर के निहित निर्गुण सत्य को प्रकाशित कर देना ही इसके स्वभाव की असल विभूति है। प्रकाशित करना, कहीं स्वपद उच्चरित करना नहीं, ऐसे लघुकथाकार को भी, उपन्यासकार या छोटी कहानी के स्रष्टा की तरह याद रखना चाहिए । इसका यह भी अर्थ नहीं कि लघुकथा निरी बौद्धिक होती है; बल्कि उसकी मार्मिकता बिन्दुधारणा (Pinpointed Construction) के चलते हृदय को और भी अधिक बेध सकती है। लघुकथा की कुल असल विशेषता अनुभव के उस व्यंग्य की है, जिसमें एक छोटा-सा सनातन या शाश्वत से लगनेवाले चरित्र या प्रारब्ध, भाव या विचार के सत्य को अनायास ज्योतित कर चला जाता है।
जिस क्षण की बात कही जा रही है वह, घड़ीवाला नहीं, न ही किसी ऐसे सापेक्ष मानसिक आयाम का है जिसमें एक ही क्षण का अणुवीक्षण एक पूरा महाकाव्य बन जाता है। लघुकथा का क्षण काल्पनिक नहीं, वास्तविक होता है अर्थात् उस वस्तु (प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति) की एक सौदामिनी-संधि (Lightning-juncture)। उस क्षण के पहले वह वस्तु जीवन के उपेक्षित अति सामान्यों में थी, उस क्षण के बाद वह जीवन के अति सामान्य में मिल जाएगी लेकिन उस क्षण उसकी महिमा की कौंध वह रही जो लघुकथा में व्यंजित है। इस क्षण को सर्वथा अलग नहीं रखा जा सकता। इसकी पूर्वपीठिका या परिचय के लिए भी कुछ कहा जाता है और क्षण के अंत का सौरभ भी स्वर के अनुरणन, विसर्जन कंपन की तरह ध्वनित रखता है, लेकिन उपकरण में संयम बरतना पड़ता है ।
और अनुभव के जिस व्यंग्य की बात कही गयी है उसमें केवल कलेवर या अवधि की महिमा नहीं है, व्यंग्य तो जैसे इसकी गुरुता की सहज दार्शनिक आत्मा है। लघुकथाओं में मोह-भंग की प्रथा ही नहीं, प्रणाली ही नहीं। सत्य की यह पूर्णता जो पूर्वग्रह, संस्कार या आसक्ति को दिखाकर उसके विपरीत तथ्य को दिखा देने से निर्मित होती है, जैसे लघुकथा के लीलाधर्म का प्राण है। प्रेमी दो बार प्रेयसी के दरवाज़े से वापस जाता है; क्योंकि पता पूछने पर ‘मैं’ कहता है। निराशा के इस चरम की अन्तर्वेदना से सहसा प्रकाशित हो जाती है उदाकृति या तादात्म्य की वह पूर्णभावना जब तीसरी बार प्रेमी पूछने पर कहता है ‘तुम’ । सर्वनामों के इस सहज विपरीत परिवर्तन पर ही दरवाज़ा खुल जाता है और कथा शान्ति पा लेती है। तमाशा देखने के लिए एक बाप- बेटे को पीटता है। उस दिन जिस दिन बेटा महसूस कर चुका होता है कि किसी चित्रपट में भगवान एक ही गीत पर मिल जाते हैं, किसी में जीवन भर की अच्छाई का अंत दुखद होता है, किसी में समाज बनाता-बिगाड़ता है, किसी में व्यक्ति समाज को बिगाड़ता-बनाता है; इसलिए सब तमाशा है, कोई तुक नहीं । उसी दिन बाप भी एक नेता का भाषण सुनने जाते हैं और विरोधियों के चलते घुड़सवार पुलिस आती है; भीड़ में कुचल जाते हैं। श्राद्ध की तैयारी होती है खूब धूमधाम से । बेटा महसूस करता है – धीरज बँधाने वाले या प्रबंध करने वाले सब शोक से अलग हैं। जो है, सो अलग है, जो हो रहा है – तमाशा । इस तरह लघुकथाओं की व्यंग्य-साधना या ‘विषम पटाक्षेप’ कोई रूढ़ विधि या बंध नहीं; बल्कि काल-प्रारब्ध का यह सहजस्वरूप न्याय है, जो सत्य को दो ध्रुवों पर रखकर उसे अखंड मंडलाकार बनाता है। एक ‘इकाई’ में ‘व्यापक’ की साधना छोटी कहानी की हो जाती है और एक ‘क्षण’ में ‘अनन्त’ की साधना लघुकथा की हो जाती है। व्यापक अनेक भिन्नों से बनता है और अनन्त विपरीत को पचाकर। इसलिए लघुकथा में रम रहा है वही नहीं बल्कि जो रम रहा है वह भी जिसके अधीन है, वह रहता है राम नहीं, राम जैसे नाम के वश में देश जैसे काल के वश में रहता है सत्य का ध्रुवान्त विकास, जिसे परिवर्तन कहें, विपरीत कहें, पर वही सत्य पूर्ण दिखता है।
कला में जिसे Didacticism (शिवोद्देश्यता, मंगलभावना) पर तथाकथित शुद्ध साहित्यकार या स्वयंतुष्ट आलोचक नाक-भौं सिकोड़ते हैं, उसे लघुकथा अपना स्वभाव मानती है। लेकिन व्यास और गुरु का भेद होता है। व्यास उपदेश देता है, गुरु दर्शन करा देता है। व्यास जी छह महीने कथा कहते रहे, फिर भी श्रोता के मन में कोई परिर्वतन नहीं हुआ। स्वयं व्यास इस गुत्थी को सुलझा न सके । महात्मा ने दर्शन करा दिया। श्रोता और व्यास दोनों को दो हाथ के फासले पर हाथ-पैर बँधवाकर उलटा टँगवा दिया और तब व्यास से कहा – “अपने शिष्य श्रोता को मुक्त कर दो।” जवाब मिला- “मैं खुद बँधा हूँ, तो कैसे मुक्त करूँ?” और उसी क्षण मर्म प्रकाशित हो गया। उसी तरह लघुकथाकार सत्य के प्रकाश या मोह-भंग के द्वारा कल्याण तो करता है: लेकिन स्वयं मुक्त रहकर । वह पक्षपाती नहीं होता, दर्शन करा देता है। वह मात्र रस में निमग्न कर देने के लिए नहीं लिखता: बल्कि जगा देता है। उसने कुछ महसूस किया है मात्र इसीलिए उसे प्रेरणा नहीं मिली। उसने जीवन और जगत् में कुछ देख लिया है और उसे दर्शन कराये बिना नहीं रहा जाता। इसी से बहुत-सी लघुकथाएँ रूपकोक्ति (Allegory), व्याजकथित (Fable), मर्मी गल्प (Parable) और संचारी कथा का उपाख्यान (Anecdote) का धर्म ग्रहण करती दिख पड़ती हैं।
रूपकोक्ति (Allegory) रूपकोक्ति में प्रायः प्रत्ययों (Concepts) या भाववाचक व्यक्तियों या लक्षणागर्भित पात्रों और घटनाओं के द्वारा किसी सिद्धान्त या संदेश की अविकल अन्तःसरणि चलाई जाती है; जैसे प्रबोध चन्द्रोदय, कामायनी, The Spider and the Bee, The other Kingdom; Pilgrim’s Progress.
व्याजकथित (Fable) – इसमें अतिभौतिक या पशु-तिर्यक योनि के पात्रों के द्वारा उपदेशकथन होता है। प्रधान चीज़ होती है इसमें लोकज्ञान (Wisdom) और शिशुस्तर की शैली । स्वामिभक्त बन्दर ने मक्खी पर तलवार चलाई कि मालिक की नींद हराम न हो। मक्खी उड़ गई और मालिक सदा के लिए सो गया। इन व्याजकथितों या शिशुरूपकों में हास्य का अविरल स्रोत रहता है, छकने-छकाने की बहुत गुंजाइश रहती है और पशुपतियों या देवी के साथ घटित घटनाओं की मनुष्यों के लिए अमोघ बन जाती हैं। इतनी अक्ल तो जानवरों को भी है और हम मनुष्य! या देवता को! तो हमारा क्या कहना! या अच्छा हुआ लाज बची, यह तो जानवरों के लिए बात मढ़ी गई है, नहीं तो हमारी भी तो यही हालत है – एक ही साथ संतोष, गूढ़ लज्जा, श्रेष्ठता का रस, वे खूब छके और हम भला बच गए या बच जाएँगे सारे भावों का कल्प आ जाता है।
कूट कथा, या मर्मी गल्प (Parable) – पैगम्बरी, तत्त्वप्राप्तों, योगियों तथा रहस्यानुभूति-द्रष्टाओं ने प्रेरणा के क्षणों में या गूढ़ विवेच्यों को बोधगम्य बनाने के लिए रूप-कंकाल के बहाने आलोक दिया है: जैसे बाइबिल के (Prodigal Son) या योग वाशिष्ठ के सिंहशावक की कथाएँ । स्पष्टतः दृष्टांत कथा के रूप में हैं और गुत्थियों सुलझाना इनका काम है। शंका समाधान के लिए प्रयुक्त ये कथाएँ उपमान या (Analogy) के द्वारा तर्क करतल हैं तथा अध्यात्म का सुगम विवेचन करती हैं।
संचारी कथा का अन्तर आख्यान या तंत्र कथा (Anecdote) इसका प्रधान गुण है विलगाव। बीरबल विनोद से लेकर साप्ताहिकों एवं दैनिकों में प्रकाशित होने वाले चुटकुलों तक इनका प्रसार है। ये अपने स्वतंत्रतः रमणीय होते हैं। विषय-प्रतिपादन के क्रम में विषयान्तर पद्धति से ये जोड भी दिए जाते हैं और तब एक पंचतंत्र बन जाता है ।
लघुकथा इनमें से सब का सार तो ग्रहण करती है; लेकिन यह है गल्प-प्रबंध का एक भेद और इस तरह तो एक कलात्मक कृति। यह सीमा अंग्रेजी के सॉनेट की तरह ग्रहण करती है लेकिन लघुकथा होने पर प्रबन्ध के सभी तत्त्व नाम (शीर्षक), पात्र, घटना, कथोपकथन, नियताप्ति (Climax) और उपराम इसमें रहते हैं। छोटी कहानी भले ही उपन्यास न बन सके और उपन्यास का संक्षेप छोटी कहानी नहीं होती: लेकिन लघुकथा हो सकती है जिसके ज्योतित क्षण की पूर्वपीठिका और उत्तर सौरभ से कुल मिलकर एक प्रबन्ध बन सकता है ।
विधि कौशल की दृष्टि से लघुकथा के विचारणीय पक्ष निम्नांकित हैं-
1. शीर्षक का नाम की सार-प्रज्ञा ।
2. पात्र और विधान की प्ररब्धोन्मुखता अथवा गुरुता के अधीन लाघव ।
3. कथोपकथन की संतप्तता या स्फोटसंक्षिप्तता ।
4. ज्वार-प्रतिज्वार की त्वरा ।
5. स्थापत्य की गहराई ।
6. नियताप्ति और उपराम दोनों में व्यंग्य की स्थिति ।
7. शैली ।
1. शीर्षक :
लघुकथा का शीर्षक छोटी कहानी या उपन्यास के शीर्षक से भिन्न नहीं। उसमें भी मुकुट, घूँघट, स्वस्तिक और किन्नर का गुण रहता ही है, जिसका उल्लेख इन पंक्तियों के लेखक ने क्रमशः तथ्यप्रधान, अर्थगोपक, प्रतीकात्मक और समस्यामूलक या द्विधापरक शीर्षकों के अर्थ में अन्यत्र किया है। लघुकथा के शीर्षक में छोटी कहानी और उपन्यास से भी अधिक सारप्रज्ञा चाहिए । प्रसंग में एक तैरते वाक्य, लघुकथा में कहीं भी नहीं प्रयुक्त हुआ ऐसा शब्द जो कथा के मर्म का व्यंजक है अथवा ऐसा पद या शब्द जो अनेक सरणियों में लघुकथा में ध्वनित हुआ हो, शीर्षक बन जाता है। लघुकथा के लिए तीखे, व्यंग्यधर्मी, नाटकीय, प्रतीकात्मक तथा विषमस्वरूप शीर्षक ही अधिक प्रभावोत्पादक होते हैं । विषमस्वरूप शीर्षक वहाँ होते हैं जहाँ लघुकथा एक ही वस्तु या परिस्थिति के भिन्न स्वरूप दिखा देती है जिससे सत्य को विविधता की अनुभूति और कोटिक्रम से निम्न श्रेष्ठ, हेय-श्रेय की भी अनुभूति हो जाती है। शीर्षक को वचन। प्लेटफॉर्म पर तीन मिलते हैं। उसने कहा था इसी ट्रेन से आने को । एक आदमी उदास हो जा रहा हो कि चिरप्रतीक्षित अतिथि नहीं आया। दूसरा देवदास की तरह मरणासन्न अन्यत्र विवाहित प्रेयसी से मरने के पहले एक बार मिल लेने के वचन के पालन के लिए जा रहा है । तीसरे को दो दल वालों ने पकड़ा है कि रुपये दोनों से लिये ओर मतदान तीसरे दल को दे दिया। जीवन से वचन के इन तीन स्वरूपों को देखकर जो विविधता हाथ लगती है, उससे एक और जीवन की विविधता, दूसरी ओर चारित्रिक तारतम्य दोनों का सत्य हाथ लगता है।
2. पात्र और विधान की प्रारब्धोन्मुखता :
लघुकथा के मनोवैज्ञानिक व्यूहजाल या अन्तर्शल्य के रेखों और बारीकियों के लिए फुरसत नहीं: अधीत विज्ञापित, प्रचारित ग्रंथियों के लिए भी फुरसत नहीं: न ही फुरसत है पात्र को उन विरल विचित्रताओं या अद्वितीय विशेषताओं के लिए जो छोटी कहानी की अभीष्ट हो सकती हैं। कोई कहता है, हमारा लड़का इजीनियर होगा, कोई कहता है आई ए एस कोई व्यापारी और अंत में सभी के आग्रह पर एक सज्जन मंद-गंभीर स्वर में बोलते हैं- हम तो चाहेंगे कि वह जेन्टलमैन हो। यहाँ पूरे समाज पर व्यंग्य के साथ-साथ उस मूल्यश्रीसम्पन्न सदाशय सज्जन के चरित्र की अद्वितीयता भी व्यंजित हो जाती है; लेकिन अत्यन्त संक्षेप में भी लिखी जाने पर यह छोटी कहानी होगी, लघुकथा नहीं।
लघुकथा में दर्शन (अन्तर्दृष्टि) और विधान (क्षण में हो जाने वाली अप्रत्याशित घटना या अर्थ-परिवर्तन का भाव विप्लव) दोनों को साहित्य आत्मसात् तो कर लेता हो है। उन्हीं से प्रेरणा की दिशा और स्वभाव भी पाता है। महाकाव्योचित महिमा और मुक्तक की सज्जा मार्मिकता लिए एक लघुकथा किसी गल्पकार को अमर करने के लिए काफी होनी चाहिए और यह सब इसलिए कि एक क्षण में हो जाने वाली घटना, क्रिया, अर्थ व भावभंगिमा प्रारब्ध जैसी लगती है। प्रारब्ध से यहाँ तात्पर्य यह कि लगे जीव के चलते ऐसा नहीं हुआ बल्कि जीवन के चलते । रामेश्वर नाथ तिवारी की लघुकथा ‘मरा हुआ पत्ता’ में पंखे ने पवन का कान ऐंठा, इसीलिए नहीं कि पंखे की बलिहारी, बल्कि जीवन अन्त संभावनाओं से भरा है और पवन को बड़े का अभिमान नहीं होना चाहिए, न बरगद, पीपल, पाकड़ और प्रपात को ही। पंखा तो पवन का स्थान नित्य ही लेता है (केवल हमें सूझता नहीं), किसी के हाथ में अपने को सौंपकर नहीं तो उड़ जाता । पूरी कथा जीवन के विधान जैसी लगती है और महाकाव्योचित हो जाती है। इसमें उपदेश भी नहीं… जीवन अपनी समग्रता और महिमा के वितरण-विस्तार में कुछ ऐसा ही है कि उसमें पवन, बरगद और ताड़ के पंखे-सब के लिए जगह है… कोई केवल नहीं और किसी के बिना खाली नहीं… जिसे मरा हुआ समझते हो वही… जीवन भी दे रहा है।
प्रारब्ध का अर्थ संचित या प्राक्तन नहीं … उसका अर्थ जीवन के विधानसमग्र के अंग जैसी लगने वाली अभिव्यक्ति चाहे वह क्रिया की हो, कर्म की हो, भाव की हो या हो जाने वाली इति का वृत्त हो । यही है ‘गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवं उठवं धनु लीन्हा ।’ अर्थात् गुरुता के अधीन लाघव । उस घटना या शील की अभिव्यक्ति की इकाई का मूल्य पूर्ण है अथवा पूर्ण उसमें भी रम रहा है, ऐसी ही बात नहीं; बल्कि वह जिसके अधीन है। झटके से भले ही लघुकथा का अन्त हो; लेकिन घटना का स्तर अखिल जीवन और जगत् के पैमाने से मर्म से उन्नत आलोकित हो जाता है।
3. कथोपकथन:
लघुकथा के कथोपकथन में जिस संतप्तता और स्फोटसंक्षिप्तता की बात कही गई है वह न तो अलंकृत उदारता से आती है, न नखकुश प्रत्ययबोधकता से; बल्कि किरण की तरह तीक्ष्ण मौन जैसे मर्मिक वचनों से लगे कि आवरण हटा, मोह भंग हुआ, निद्रा टूटी, हम चौंके और फिर डूब गए तब निद्रा में थे, अब फूटी पौ के हँसते प्रकाश में हैं। कथोपकथन में व्यंग्य की वह सीमान्त सार्थकता है, जिसमें एक ही साथ आँखें फूटीं और पौ फूटी – दोनों का अनुभव हो । लघुकथा में वाग्विलास नहीं होता, बातें नहीं की जाती। उसमें की गई बात भी प्रारब्ध की एक अभिव्यक्ति जीवन के तत्त्व और रस की प्राणोज्जीवित कृति होती है । लघुकथा के कथोपकथन की आर्द्रता, शुष्कता, तार्किकता, आघात, आकस्मिकता, मन्द्रता, थकान, विरोधाभास सगर्भता, चरमसूत्रता में एक तरह का मनस्ताप, बिन्दुधारणा (Concentration) होती है। उसमें न्याय का बल नहीं होता, अचानक प्रेत देख लेने की कंठावरुद्धता होती है। कथोपकथन में अवाक् होने का गुण रहता है, बोध से अभिभूत होने वाली (Spontancity) स्वाभाविकता होती है, वह स्वाभाविकता नहीं, जो प्रबल भावावेगों से निःसृत होती है। एक शब्द में इसे Critical Pressurisation या Pressurised Criticality संतप्त प्रज्ञा या प्रज्ञासंताप कह लीजिए जो निर्वेद-संबंधी विबोध से भिन्न है, क्योंकि पहले में भावोन्नयन है, दूसरे में मनन है।
4. ज्वार-प्रतिज्वार की त्वरा :
लघुकथा की त्वरा, मानसिक चंचलता…. अधीरता या दुर्बलता की नहीं । प्रकाश की पुष्टि के लिए, मोह की पराजय के लिए, पूर्वग्रह के सत्यापन के लिए, आसक्ति के अद्वितीय उपचार के लिए कालचक्र की गति तनिक द्रुत कर दी जाती है< जिससे व्यंग्य के ज्वार के बाद ज्वार आते हैं और जड़ता को निःशक्त कर अपना अधिकार कर लेते हैं। दृष्टि का धरातल उठ जाता है, दृश्य का उद्धार हो जाता है।
कस्तूरी शीर्षक हो । नायक की नकली कस्तूरी असली बताकर कोई चला गया। खो जाने पर वह नौकर को पीटता है। अनायास आया पथिक चाकू से चीर कर दिखा देता है – हिरण की नाभि में कोयले के टुकड़े हैं, कस्तूरी नहीं। व्यंग्य का प्रथम ज्वार ।
फिर वह गरीब-सा लगने वाला अतिथि क्रोध करने वाले कुबेर को अपने पास से असली कस्तूरी देता है। असली कस्तूरी उसे किसी ने मुफ्त दी थी, प्रेम में। अयाचित असली ! व्यंग्य का दूसरा ज्वार !
इस असली कस्तूरी के बदले में अतिथि वह रद्दी कागज माँगता है< जिसमें नकली कस्तूरी लिपटी थी और जिसकी खुशबू से ही धनी ठगा गया था। अतिथि सूँघता है और कहता है – “यह तो सुवासित होगा ही।” असली कस्तूरी और रद्दी काग़ज़ के टुकड़े का विनिमय विचित्र व्यंग्य है। तीसरा ज्वार ।
धनी कनखियों से देखता है- उस रद्दी कागज में राम राम राम-राम लिखा हुआ था: लेकिन उधर या नाम की महिमा की ओर उसकी नजर कभी नहीं गई थी। व्यंग्य का चौथा ज्वार !
अतिथि के चले जाने पर भी खुशबू है। असली कस्तूरी की ? अतिथि की साधुता की?
नौकर को पीटते-पीटते घर से बाहर निकालने वाले अब खुद चौखट पर खड़े हैं। घर में (गृहस्थाश्रम को वापस जाएँ या बाहर ही राम नाम को लेकर निकल जाएँ। गोस्वामी जी के नाममणि के देहली दीप वाले दोहे की स्मृति भी इसको पुष्ट-प्रकाशित और व्यंग्य-तीक्ष्ण करती है।
5. स्थापत्य की गहराई :
लघुकथा के स्थापत्य में सघनता से अधिक गहराई के गुण होने चाहिए। सघनता आती है सजावट के लिए खराद कम करने से, पूर्वपीठिका और विसर्जन के उपकरणों में बरती जाने वाली मितव्ययिता से. अर्थ की एक ही केन्द्रीय स्थापना से, भाव या चित्त की उपरश्मियों के गुम्फन से, वाक्यविन्यास के ऊबड़-खाबड़, व्यंजनप्रधान रुक्ष पौरुष से। गहराई आती है कप की तरह मंडलाकार सत्य की आकृति बनाकर भीतर के देश को खोखला कर देने से ।
रामेश्वर की लघुकथाओं में जो कादम्बरी-गद्यांश कभी प्रारंभ में (कुएँ के मुँडेरे की तरह) या कभी बीच में (नीचे उतरते) शैली के आग्रह के रूप में देखा जाता है, वह शैली स्वकीय आडम्बर नहीं, न साँस बाँधने का प्राणायाम-कौतुक है, न ही ऊब या वितृष्णा को साहित्य की नई विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास । ऐसे अंशों को पाठक को दुहराना पड़ता है… जिससे मंत्र के स्फोट के पहले की संतप्त गर्भदशा का निर्माण होता है।
लघुकथा के जीवन के जिस क्षण की महिमा दिखानी है, उसके अंगीभूत जीवन -विस्तृत, मंथर, सामान्य, अनन्त, शृंखलित, चिरप्राचीन, अतिरिक्त आकांक्षी – का यह गद्यांश स्थापत्य बन जाता है और साथ ही उसे खोखला कर देता है कि गहराई बन जाए – वह गहराई जो महिमावान् क्षण के व्यंग्य का दर्शन करा दे।
6. नियताप्ति और उपराम में व्यंग्य की स्थिति :
लघुकथा में व्यंग्य की स्थिति नियताप्ति और उपराम दोनों में रहती है। नियताप्ति किसी गल्प-प्रबंध के रूपक की रुचि और धारणा, चित्त के वितान भाव के उत्कर्ष की सर्वोच्च स्थिति है। यहाँ तो व्यंग्य इसलिए रहता ही है कि क्षण ने क्या से क्या कर दिया लेकिन लघुकथा को यदि मार्मिक होना है और प्रकाश का स्फुट या दैवात् जैसा नहीं बल्कि सनातन सत्य स्वरूप जैसा लगना है तो उपराम में भी इसकी, एक ही वाक्य से नहीं, पुष्टि लघुकथाकार को करनी पड़ती है। जैसे- स्वागत के लिए मंच, मंडप की सज्जा, अतिथि के लिए अधीर होकर खिन्न पड़ी थी। अतिथि आए तो स्टेशन की ओर भीड़ का ज्वार और उधर आँधी और प्रलय के बादल … पानी से सभी लथपथ । स्वागत भाषण में अनायास ही शीतकंपन था । यहाँ तक तो व्यंग्य का चरम है ही । सभा का विसर्जन गान (इतनी पूरी तैयारी थी !) था ….
अतिथि हमारे प्राणों के
स्वागत का फिर सौभाग्य मिले !
7. शैली :
लघुकथा में सूतवाली सरलता या किस्सागोई की सहज धारा का कोई आग्रह नहीं । इसलिए इसमें कभी-कभी एक ही व्यापक, अतल, मर्यादित प्रतीक की महिमा रहती है / अस्पष्ट संकेतों, बिम्बों, अर्थसार्थकताओं की मार्मिकता रहती है। लघुकथा, साहित्य की अन्य विधाओं की तरह, जमकर लिखी जाने वाली चीज़ है। सफल लघुकथाओं में पात्र और संभूति के परस्पर के रूप में व्यावहारिकता शब्दों के द्वारा व्यक्त होती है, जो उसका बुद्धि-तत्त्व है। उसी तरह उसकी एक स्वप्निल मादकता होती है जो मन को संतुष्ट करती है। शब्दों के स्वर, भावों की मुद्रा और प्रणयन, जीवन और जगत् के तराशे चित्र, व्यंग्य और रम्य के संश्लेष प्रस्तुत करते हुए भी कथाकार विशेषतः कहीं नहीं और सारतः सर्वत्र रहता है। यही लघुकथा की निद्रा है जो उसका अहं-तत्त्व है। पूरी कथा में विविध उपकरणों, स्वादों, वर्जना, रंजना और विरोध से उत्पन्न जो स्थापत्य अन्विति, परिव्याप्त प्रभाव या समरसता आती है, वही अनेक भावों का एक भाव में मिलन है, समाधि है, जो लघुकथा का चित्त-तत्त्व है । इसलिए महाकाव्य या प्रबंधकाव्य ही नहीं बल्कि छोटे आयतन की लघुकथा भी अन्तःकरण-चतुष्टय (मन, बुद्धि, अहं, चित्त) का पोषण करती है ।
संक्षेप में, लघुकथा के स्वरूप-सम्बन्धी चिन्तन की कुछ ऐसी ही मर्यादाएँ हैं । कथाकारों के चलते, योग और प्रयोग के चलते, भेद अवश्य ही आ जाते हैं जो व्यावहारिक अध्ययन के विषय हैं।
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