समकालीन हिन्दी-लघकथा के विकास क्रम में जिन महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों ने अपना योगदान दिया है, उनमें एक ऐसा नाम है, जिसे नकारा नहीं जा सकता । चौथे दशक से लबुकथा लेखन में सक्रिय वो नाम है- विष्णु प्रभाकर । अपनी पुस्तक ‘कौन जीता कौन हारा’ के निवेदन में वे लिखते हैं- ‘प्रस्तुत संग्रह की रचनाएँ सन् 1938 से सन् 1997 के बीच लिखी गयी हैं।’ यानी लघुकथा के विकास में लेखक की भागीदारी उसके शैशवकाल से ही रही है। इसी दृष्टि से से इनकी रचनाओं का मूल्यांकन करना ज्यादा समीचीन होगा। इस संकलन में इससे पूर्व प्रकाशित संग्रह ‘जीवन पराग’ (सन् 1963) और ‘आपकी कृपा है’, (सन् 1982) की रचनाएँ भी संकलित है। इस दृष्टि से भी इन लघुकथाओं की भाषा, शिल्प-गठन और प्रस्तुति को परखना होगा, तभी लघुकथा विकास-क्रम में लेखक के सही योगदान का मूल्यांकन किया जा सकेगा। इसी क्रम में लेखक के इन विचारों का भी ध्यान रखना उचित प्रतीत होता है। विकास की परम्परा को परिभाषित करते हुए लेखक कहता है- ‘विकास की एक सुनिश्चित परम्परा आज की लघुकथा के पीछे देखी जा सकती है।’ इन विचारों के मद्देनजर ही विष्णु प्रभाकर की लघुकथाओं के मूल्यांकन की कोशिश की गई है।
विष्णु प्रभाकर की लघुकथाओं का मूल स्वर मानवीय संवेदना को अभिव्यक्ति देना है। चाहे वह धनात्मक पक्ष हो या ऋणात्मक । यानी वे यह नहीं मानते कि सिर्फ जीवन के अन्तर्विरोध, विसंगतियों और कुरूपताओं को ही लघुकथा का आधार बनाया जाए; बल्कि जीवन के अच्छे, शुभ और सुन्दर को भी जो द्वन्द्व के माध्यम से उभरकर सामने आता है, उसको भी लघुकथा में चित्रित करना चाहिए। इन्हीं विचारों के तहत उनकी सारी लघुकथाएँ सृजित हुई हैं। इनकी लघुकथाओं में अगर जीवन के अन्तर्विरोधों विसंगतियों के यथार्थ का चित्रण है तो उसके सुन्दर पक्ष का भी चित्रण है। बहुत सारी लघुकथाएँ तो दृष्टांत के रूप में ही पाठकों को आकर्षित करती हैं। इनके विस्तृत लेखन काल-खंड में पसरी हुई लघुकथाओं ने समाज के हर तबके के लोगों को अपनी कथा का उपजीव्य बनाया है। जहाँ देश है, समाज है, व्यक्ति है. पाप और पुण्य है, मंदिर-मस्जिद है, प्यार मुहब्बत है. धार्मिक अन्धविश्वास है, जातिगत कट्टरता है, पुलिस-प्रशासन है, यानी जिन्दगी के हर-क्षण, हर पल और हर क्षेत्र को लेखक ने छुआ है और इन क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों और अन्तर्विरोधों पर चोट करते हुए उसके भीतर से शिवत्व को खोज निकालने की कोशिश की है। मरते इन्सानियत और संवेदनहीन मानवीयता की रक्षा करने की दिशा में प्रयास किया है; क्योंकि लेखक का यह मानना कि सब कुछ होने के बाद भी आदमी सिर्फ आदमी है। और उसके भीतर में छिपी हुई इन्सानियत ही शिवत्व है।
‘कौन जीता कौन हारा’, में कुल इकसठ लघुकथाएँ संकलित है। इनमें कुछ दृष्टांत और बोधकथा के नजदीक है, तो कुछ नीति-कथा के नजदीक । इसके बावजूद संग्रह में कुछ ऐसी लघुकथाएँ है, जो लेखक की श्रेष्ठ सर्जनशीलता का परिचय देती है। इस संग्रह की पहली लघुकथा है ‘ईश्वर का चेहरा’ देखने में वस्तुतः सीधी सपाट-सी रचना अपने चरम बिन्दु पर पहुँचकर पूर्णता को प्राप्त करती है और पाठक को गहन धरातल पर सोचने को विवश करती है। कथा प्रभा औरर सबीना के वार्तालाप से शुरू होती है। सबीना प्रभा को महँगी दवा खाने की सलाह देती है, जिससे वह स्वस्थ हो जाएगी; किन्तु प्रभा के यह पूछने पर कि क्या उसने खुद आजमाकर देखा है, तो वह निरुत्तर हो जाती है, उसका चेहरा उसका मुरझा जाता है। अपने प्रति सबीना का सद्भाव और मुरझाया चेहरा देखकर प्रभा को यह अहसास होता है कि अगर का कोई चेहरा होगा, तो ईश्वर सबीना के जैसा ही होगा। लघुकथा इसी चरम बिन्दु पर आकर खत्म हो जाती है। जीवन के इन्हीं पलों को पकड़कर लिखी गई एक लघुकथा है ‘फर्क’ । इस लघुकथा में लेखक ने आदमी के जानवर होते जाने की हद को पार करते हुए दिखाया है और जानवरों के माध्यम से ही इस फर्क को समझाया है। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर तैनात सैनिक एक दूसरे को शक, ईर्ष्या, घृणा और नफरत की नजरों से देखते हैं। वे एक दूसरे को इधर से उधर नहीं आने देते; किन्तु बकरियों का एक झुण्ड बिना किसी झिझक के इस पार से उस पार चला जाता है। लघुकथा का अन्तिम वाक्य तीर की तरह बेधता है- ‘‘जी हाँ जनाब, हमारी हैं। जानवर हैं, फर्क करना नहीं जानते।’’ यह लघुकथा आदमी के पाशविक व्यवहारों पर तीखा व्यंग्य करती है।
आज हमारे समाज में जातिवाद का प्रसार भयंकर कोढ़ की तरह हुआ है। इसने हमारे स्वस्थ समाज को कैंसर की तरह ग्रस लिया है। जिधर देखिए जातिवाद का ही बोल-बाला है। इस जातिवादी और धर्मवादी कट्टरता ने हमारे देश-समाज को बार-बार छिन्न-भिन्न किया है और आज भी कर रहा है। ‘पानी की जाति’ और ‘जाति या जान’ लघुकथाओं में इसी जातिवादी धार्मिक कट्टरता पर प्रहार किया गया है। ‘जातिवादी व्यक्ति’ में एक युवक प्यासा तड़प रहा है; किन्तु दूसरा व्यक्ति उपे पानी नहीं पिला रहा है; क्योंकि वह मुसलमान है। उसकी जात नहीं लेना चाहता; किन्तु उस आदमी की लाचारी के आगे वह झुकता है। उसकी इन्सानियत जागती है और वह उसके प्राणों की रक्षा करता है। इन दोनों लघुकथाओं के माध्यम से लेखक ने इन सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया है। ‘पानी की जाति’ में भी इसी सामाजिक कोढ़ का पर्दाफाश किया गया है। वहीं ‘भगवान और पुजारी’ में धार्मिक अन्धविश्वास और ढकोसलों पर व्यंग्य किया गया है। एक आदमी वर्षों तपस्या करता है। भगवान उसे दर्शन देते हैं और उससे उसकी इच्छा के बारे में पूछते हैं। वह मन्दिर में उनके दर्शन की इच्छा व्यक्त करता है, तो वो हँसकर कहते हैं- तुम वहाँ जाकर क्या करोगे ? हजारों वर्ष बीत गए हैं, मैं भी वहाँ नहीं गया हूँ।” यह उक्ति एक करारा ब्यंग्य है उन लोगों पर, जो आज भी बेजान पत्थर की मूर्तियों के सामने बैठे रहते हैं।
आज का जीवन इतना जटिल और यांत्रिक हो गया है कि हमारे भीतर संवेदना की एक अजस्र धारा जो निरंतर बहती रहती थी, सूखने लगी है। इस यांत्रिकता ने आदमी को आदमी से दूर किया है। आपसी रिश्ते कमजोर हुए हैं। आदमी संवेदन शून्य और अमानवीय हुआ है। इन त्रासद स्थितियों का वर्णन ‘अपना जन’ और ‘आचरण की सभ्यता’ में हुआ है।
आर्थिक तंगी और आदमी की अनन्त अभिलाषा उसे गलत कार्यों की प्रेरणा देती है। आदमी चाहे घर में हो, चाहे दफ्तर में; इन्हीं आर्थिक दबावों और गलत प्रवृत्तियों के कारण वह गलत कार्यों में लिप्त रहा है। पुलिस प्रशासनिक स्तर पर फैले भ्रष्टाचार, इसके प्रमाण है। समाज में आए दिन घटती घटनाएँ और उसमें लिप्त पुलिस पदाधिकारियों के चरित्र उनकी कर्त्तव्यहीनता की कथा कहते हैं। पुलिस के गिरते चरित्र पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है लघुकथा ‘दोस्ती’ । पुलिस द्वारा गरीबों पर होते अत्याचार को ‘संवेदन’ में अभिव्यक्ति मिली है। ‘दोस्ती’ लघुकथा की घटना एक बस डकैती से शुरू होती है। डकैत सारे यात्रियों का सामान लूटते हैं। उस बस में एक विधायक है। उनका भी सामान लूटा जाता है; किन्तु आश्चर्य तब होता है, जब डाकू उनका सामान लौटाते हैं। लोगों के पूछने पर वे बताते है ‘उनका लीडर मेरा सहपाठी रहा है और….. इस इलाके का उप पुलिस अधीक्षक है वह।’ यह सुनकर सारे लोग सन्न हो जाते हैं। किसी के यह कहने पर कि आप विधायक हैं, इसकी रिर्पोट मुख्यमंत्री से करेंगे, तो वे कहते हैं- मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा; क्योंकि उसने मुझसे दोस्ती निभाई है, मैं उसे निभाऊँगा। विधायक का यह वाक्य पूरे संसदीय ढाँचे और पुलिस चरित्र को हास्यास्पद बनाता है। यहाँ के गिरते चरित्र और विधायिका के चरित्र पर अँगुली उठाता है।
भ्रष्टाचार आज हमारे समाज का अभिन्न अंग बन चुका है। कहीं-कहीं तो इसे लोकाचार के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है। इससे हमारा जीवन हर स्तर पर प्रभावित हुआ है। कार्यालय से लेकर दैनिक जीवन तक भी अछूता नहीं रह पाया है। यह हमारे जीवन में लवण की तरह घुल-मिल गया है। खासकर सरकारी विभागों में यह संक्रामक रोग का रूप धारण कर चुका है। सरकारी निर्माण विभागों में ठेकेदारी प्रथा के माध्यम से घुस आई गन्दगी को अगर ‘अतिरिक्त लाभ और उदारता’ में दर्शाया गया है, तो रेलवे विभाग में घुस आए भ्रष्टाचार का पर्दाफाश ‘पाप की कमाई’ में किया गया है। शिक्षा- जगत् में आए भ्रष्टाचार ने हमारे जीवन की पूरी दिशा बदल दी है। गलत और दोषपूर्ण शिक्षा नीतियों ने बेरोजगारों की लम्बी फौज खड़ी की है, जो आज हमारे स्वस्थ समाज के लिए कैंसर बन रहा है। इन्हीं दोषपूर्ण स्थितियों की प्रस्तुति ‘ब्रह्मानन्द सहोदर एक अनुभूति’ में हुआ है।
हमारे समाज में साहित्यकारों को काफी इज्जत की दृष्टि से देखा जाता है। वह हमारे समाज का पथ-प्रदर्शक होता है; किन्तु उपभोक्तावादी संस्कृति के दवाव में आर्थिक लोभ के चलते उनके चरित्र में गिरावट आई है। आर्थिक दबावों के बीच डगमगाते लेखकीय अस्मिता और स्वाभिमान पर चोट करती है- ‘तो अच्छा’ लघुकथा । अर्थ के लिए झूठे सम्मान के लिए साहित्यकारों के चरित्र में आई गिरावट को लघुकथा ‘धातु और रुपया’ तथा ‘आधा किलो सम्मान’ में रेखांकित किया गया है।
विष्णु प्रभाकर की लघुकथाओं से गुजरने पर यह अहसास होता है कि आदमी अपने समकालीन जीवन के चारों तरफ उग आए सवालों के जंगल से गुजर रहा है। इनमें कहीं अगर सुन्दर फूल हैं, तो कहीं दल-दल भरे रास्ते भी हैं और काँटो से भरे रास्ते भी। कहने का मतलब प्रभाकर जी की लघुकथाएँ जिन्दगी के आस-पास बिखरी घटनाओं पर केन्द्रित है; इसलिए उनकी लघुकथाओं का कैनवास बड़ा ही विस्तृत है। इसमें अगर पुलिस-प्रशासन, विधायक, शिक्षक, दुकानदार, साहित्यकार हैं, तो दूसरी ओर धार्मिक विश्वास और अन्धविश्वासों पर भी चोट की गई है, यानी प्रभाकर जी की लघुकथाएँ आदमी की जिन्दगी के यथार्थं की सफल प्रस्तुति हैं। इनकी लघुकथाओं को पढ़ने से एक बात उभरकर सामने आती है और वह यह कि शिल्प के स्तर पर इनकी लघुकथाएँ खलील जिब्रान से ज्यादा प्रभावित हैं। इनके संवाद चुस्त-दुरुस्त और तीर की तरह चोखे होते हैं, जो सीधे पाठक के मर्म को बेधते हैं। भाषा के स्तर पर अगर इनकी लघुकथाओं को देखा जाए, तो ये अपने युग की भाषा ही लिखते हैं। इस कारण कहीं-कहीं इनकी लघुकथाएँ अत्याधुनिक विचारों को भाषा के स्तर पर संप्रेषित नहीं कर पाई हैं । इन सबके बावजूद प्रभाकर जी लघुकथाओं का मूल स्वर जीवन में शिवत्व की स्थापना का रहा है। आदमी के बेहतर जीवन का रहा है। बेहतर समाज निर्माण का रहा है; इसलिए अपनी लघुकथाओं में सर्वत्र इन्होने मानवीय संवेदना और प्रेम जैसे शाश्वत मूल्यों की रक्षा पर बल दिया है, नैतिकता और चरित्र को ऊँचा उठाने की वकालत की है। हिन्दी लघुकथा लेखन में चौथे दशक से सक्रिय प्रभाकर जी की लघुकथाएँ मानवीय जीवन- संघर्ष के यथार्थ की सहज प्रस्तुति हैं, जो पाठकों के मन मिजाज में सहज ही रच-बस जाती है। यही इनकी सहजता भी है और सफलता भी।
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