जुलाई 2026

देशअहं भस्मास्मि!     Posted: July 1, 2026

कुछ दिन पहले मैं अपनी सोसाइटी के कॉरिडोर से गुजर रही थी। मेरे साथ मेरा बच्चा भी था। तभी सामने से एक महिला आती दिखाई दी। उसे देखते ही मेरे कदम जैसे थोड़े धीमे पड़ गए।

सच कहूँ, तो उससे बातचीत करने में मेरा कोई विशेष मन नहीं था। कई बार हम छोटी-छोटी घटनाओं से प्रभावित होकर लोगों के साथ अपने संबंधों को कुपरिभाषित करके अपने संकीर्ण मानसिक दायरे का परिचय दे बैठते हैं।

कुछ दिन पूर्व वह बिना मेरी मर्ज़ी के किसी और के माध्यम से मेरे ही व्हाट्सएप ‘महिला-शक्ति’ समूह में जुड़ गई थी। ऊपर से, समूह की संचालिका होने के बावजूद वह मुझे विशेष तवज्जो भी नहीं देती थी। इसी कारण मुझे लगा कि वह कहीं न कहीं स्वयं को मुझसे ऊपर दिखाने का प्रयास करती है।

मेरे भीतर का यह भाव भी अनायास नहीं था। वह एक साधारण-सी दुकान चलाती थीं… और मैं एक कॉलेज में प्रोफेसर। कहीं न कहीं मेरे भीतर यह वहम घर कर गया था कि शिक्षित होना अर्थात् दूसरों से ऊपर होना। संभवतः मेरा यह घमंड उसी अंतर का परिणाम था।

मैंने अनमने मन से अपने बच्चे से कहा— “अरे यार, ये यहाँ कहाँ से आ गईं… तुम चलो बेटा, मैं जल्दी से इनसे बात निपटा कर आती हूँ।”
मन बिल्कुल नहीं था, पर औपचारिकता निभानी ही थी।
मैं उसके पास पहुँची।
मैंने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा— “इस बार तो आपने बहुत होली खेली है। अभी तक चेहरे से रंग ही नहीं उतरा। होली को तो पंद्रह दिन हो गए। सारा चेहरा आपका गुलाबी हो रहा है, आँखें भी सूजी-सी लग रही हैं… जैसे रंग की वजह से इन्फेक्टेड हो गई हों।”
उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा और बोली— “होली? इस बार तो हमने होली खेली ही नहीं… और अच्छा हुआ कि ग्रुप के लोग भी नहीं आए। आपको पता नहीं है क्या? मैंने तो व्हाट्सएप स्टेटस पर भी डाला था। ग्रुप के सभी लोगों को तो पता है।”
मैंने चौंककर पूछा— “हुआ क्या? ठीक से तो बताओ। मैं समझी नहीं।”
उसने भारी स्वर में कहा— “मेरी बहन… जिसकी गर्भावस्था के आठवें महीने में ही बच्चा खत्म हो गया… वह अत्यधिक रक्तस्राव के कारण अचानक चल बसी… अपने पीछे दो छोटी-छोटी बच्चियाँ छोड़कर। और दीदी… जो आपको मेरा चेहरा लाल और आँखें सूजी हुई लग रही हैं, ये रंग की वजह से नहीं हैं… बहुत रोने की वजह से हैं।”

मेरी स्थिति ऐसी हो गई जैसे काटो तो खून नहीं। मेरे कदम वहाँ से भागने को आतुर हो उठे।
मैं वहाँ से निकल ही रही थी कि तभी वह बोली— “सुनिए दीदी… मुझे अब ध्यान आ रहा है… शायद आपने मेरे उस व्हाट्सएप स्टेटस पर ‘ॐ शांति’ भी लिखा था…”
मेरा समस्त मिथ्या अहंकार मानो टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया।
अचानक विचारों का जलजला उठ पड़ा।
मस्तिष्क में धुंध-सी छा गई थी… और बस एक ही ध्वनि गूँज रही थी—“अहम् भस्मास्मि…, अहम् भस्मास्मि…”

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