“सुनो! मेरा चश्मा कहाँ है? कब से ढूँढ़ रहा हूँ।”घबराए-से नितिन जी इधर-उधर घूम रहे थे।
पत्नी नीरा सुबह से ही किचन में व्यस्त थी। दो बरस बाद अमेरिका से बेटी-दामाद आने वाले थे। आज रात ही उनकी फ्लाइट थी। उनका कमरा ठीक करना, घर की साफ़-सफाई और फिर दोनों की पसंद का खाना बनाना—सब कुछ नीरा बड़े उत्साह से कर रही थी।
नितिन जी को केवल एयरपोर्ट जाकर उन्हें लाना था; लेकिन लगता था जैसे सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर हो।
“कितने बजे घर से निकलना ठीक रहेगा?”
सुबह से वह यह सवाल दस बार पूछ चुके थे। अगर फ्लाइट समय पर न आई, तो वहाँ समय कैसे बिताएँगे—यह चिंता भी उन्हें खाए जा रही थी। और अब यह नई परेशानी।
“यह चश्मा भी मुझे इन दिनों बहुत तंग करने लगा है।” किचन के दरवाज़े पर आकर उन्होंने दयनीय स्वर में कहा,“ज़रा ढूँढ़ दो तो बड़ी मेहरबानी होगी।”
नीरा के हाथ कलछी में उलझे थे और गैस पर गाजर का हलवा अपने अंतिम पड़ाव पर था। कलछी छोड़ देती, तो नीचे लगने का डर था।
“यहीं कहीं होगा। शायद साफ़ करने के बाद आप उसे ठीक जगह रखना भूल गए होंगे।”नीरा ने बिना देखे ही कहा।
“अरे हाँ! साफ़ तो किया था… पता नहीं कहाँ रख दिया।” नितिन जी बड़बड़ाते हुए कमरे में चक्कर लगाने लगे।
गैस बंद करके, नैपकिन से हाथ पोंछते हुए जैसे ही नीरा ने उनकी ओर देखा, वह हँस पड़ी—“अरे! चश्मा तो आपके सिर पर चढ़ा हुआ है जनाब! और कब से तौलिया लपेटे उसे ढूँढ रहे हैं। पहले ढंग के कपड़े पहन लीजिए।”
कुछ देर बाद नीरा कमरे में आई।
“आप आराम से एयरपोर्ट तक चले जाएँगे न? कोई दिक्कत तो नहीं होगी?”
“अरे! क्या समझती हो अपने पतिदेव को?” नितिन जी गर्व से बोले, “वर्षों जहाज़ उड़ाए हैं, कितनी सेफ लैंडिंग की हैं… और अब यह बित्ती-सी कार चलाते रास्ता भूल जाऊँगा?”
कपड़े बदलकर जैसे ही वह मुख्य दरवाज़े तक पहुँचे, अचानक ठिठक गए, “अरे! कार की चाबी कहाँ गई? अभी तो हाथ में थी…”
वह फिर से ड्रॉअर टटोलने लगे।
बेटी के कमरे से ही नीरा ने आवाज़ लगाई—“ज़रा अपनी जेब तो देखिए। रूमाल रखते समय वहीं रख दी होगी।”
“मिल गई! जेब में ही थी।”
फिर मुस्कराकर बोले,“तुम तो कोई जादूगरनी हो। हर चीज़ का ठिकाना पता रहता है तुम्हें।”
फिर धीरे से नीरा की कलाई छूकर लगभग फुसफुसाए—“सुनो… कभी मैं खो जाऊँ तो मुझे ढूँढ लेना।”
नीरा का दिल एक पल को काँप उठा। वह जानती थी कि नितिन जी धीरे-धीरे डिमेंशिया की गिरफ़्त में आते जा रहे हैं। डॉक्टर की रिपोर्ट उसके मन में किसी पत्थर की तरह रखी थी, लेकिन वह उसका बोझ नितिन जी पर नहीं डालना चाहती थी।
उसने मुस्कराकर उन्हें धूप का चश्मा थमाया और बहुत प्यार से कहा—“आपकी जादूगरनी आपको खोने ही नहीं देगी… बस मुझे पुकार लेना।”
तभी नितिन जी फिर बोले— “सुनो! … ”
इस बार नीरा बिना कुछ कहे अपना पर्स उठाकर बाहर आ गई।
“सुनिए, मैं भी साथ चलती हूँ। बिटिया को सरप्राइज़ देंगे।” कहते हुए वह कार में बैठ गई।
अनिश्चितताओं के धुँधलाते आसमान में धीरे-धीरे खोते जा रहे अपने जीवनसाथी के लिए वह ध्रुव तारा बन जाना चाहती थी।
-0-वर्जीनिया, यू एस ए