जुलाई 2026

मेरी पसन्दसमसामयिक विषयों को वरीयता     Posted: July 1, 2026

     लघुकथा विधा तेजी से भागते वर्तमान जीवन का अहम हिस्सा होती जा रही है, और खूब लिखी जा रही है। कभी -कभी कुछ लघुकथाएँ ठहरकर कुछ सोचने को मजबूर कर देती हैं। इक्कीसवीं सदी के चौथाई मुहाने पर खड़े होकर जब हम समकालीन लघुकथा पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते है कि इस चौथाई सदी तक जितने लघुकथाकरों की पदचाप सुनाई दी है, उन्होंने समसामयिक विषयों को वरीयता दी है। जहाँ तक भाषा और शिल्प का सवाल है तो हरिशंकर परसाई की ‘बात ‘से लेकर सुकेश साहनी की ‘बॉलीवुड डेज ‘की डायरी शैली तक सैंकड़ो लघुकथाकारों  के बेहतर प्रयोग से लघुकथा ने अनेकों बार अपना आवरण बदला है।

   मेरी पसंद के लिए पहली लघुकथा सुकेश साहनी की ‘मोये ‘और दूसरी भीकम सिंह की ‘अगोचर’।

  सुकेश साहनी आज हिंदी लघुकथा में बहुपठित, बहुचर्चित नाम है, वे मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं, उनकी लघुकथाओं में संवेदनाओं की जैसे नदी बहती है। वे अपनी बात (मानव मूल्यों की लघुकथाएँ )में मानते है कि चरित्र और मूल्यों का क्षरण भारतीय समाज की निरंतर घटने वाली बड़ी दुर्घटना बन गई है। उनकी लघुकथा ‘मोये ‘सामाजिक यथार्थ को बहुत पैने और मार्मिक ढंग से दिखाती है। ट्रैन में सफर करने वाले बहुत से लोग हैं, पर उन उदंड और दबंग लड़कों के सामने पड़ने की हिम्मत कोई नहीं करता, उनके हौसले इतने बुलंद हैं की वे लड़की को उसकी माँ और अन्य यात्रियों के साथ छेड़ रहे हैं, अश्लील हरकते कर रहे हैं।

रामसाहय जी सब कुछ देख रहे हैं, पर वे जानते हैं कि उनको भी कितनी बार इन लड़को ने जलील किया है। जब लड़की की माँ कहती है कि सभी मोये हैं, तो रामसहाय जी की आँख डबडबा आई थी; क्योंकि वे स्वयं भी अपने आप को मोये ही मान बैठे थे।

बाबू रामसाहय के पास बैठे सहयात्री ने जब फुसफुसाकार उनसे पूछा,”मोये!…इसका क्या मतलब हुआ? “

“मरे हुए।”

“कौन?”

“हम -सब, और कौन!!!” डबडबाई आँखों को अख़बार में छुपाए रामसहाय फट पड़े।

‘मोये ‘लघुकथा अपने छोटे -से कलेवर में सब कुछ समेटे हुए है।

      दूसरे लघुकथाकार भीकम सिंह भी, बेहद संजीदा लघुकथाकर हैं, प्रकृति से जुड़ाव के पक्षधर। भीकम सिंह की लघुकथा ‘अगोचर ‘मनुष्य को प्रकृति से जोड़ने की बात करती है।’अगोचर ‘की पात्र मनीषा कोई असाधारण काम नहीं करती, वह बस प्रकृति में मौजूद रहती है… अपने छोटे -से चरवाही कार्य के साथ… अपने साहस और संकोचों के साथ। वह किसी बड़े उद्देश्य के लिए संघर्ष नहीं करती, लेकिन जीवन के छोटे -छोटे भारों में बड़े -बड़े सुख जीती है, और प्रकृति उसके साथ इस कदर जुड़ी होती है कि वह स्वयं अचंभित रह जाती है, जब उसकी भेड़ -बकरियों को बचाने के लिए ओक का पेड़ गुलदार (तेंदुए )पर गिर जाता है।

  यह लघुकथा प्रकृति से अनोखे लगाव के धरातल पर बुनी गई है,” मनीषा कुकीना खाल पर अकेली ही आती थी, लेकिन जंगल उसके साथ इस कदर जुड़ा हुआ है इसका अहसास उसे आज हुआ। “

  “अब वह जब भी थक कर चूर हो जाती है तो उसी ओक के तने से सटकर बैठ जाती है… और ऑंखें मूँद लेती है… फिर देखती है उस न दिखने वाले को…”

 1.मोये – सुकेश साहनी

बाबू रामसहाय को अपनी घरेलू परिस्थितियों के कारण छप्पन वर्ष की आयु में हरदोई से लखनऊ की डेली पैसेन्जरी करनी पड़ रही थी।यह दौर बड़ा कष्टकारी था।अपने सहयात्रियों के साथ आरक्षित बोगियों में न चाहते हुए भी नियम विरुद्ध यात्राकरते हुए बहुत असहज महसूस करते थे।सबसे अधिक दहशत उन्हें साथ चलने वाली युवा दबंगों की टोली से होती थी, जो दैनिक यात्रियों के नाम पर कलंक थे, जिन्हें किसी की भी इज़्ज़त उतारने में देर नहीं लगती थी।उनकी कोशिश रहती थी कि उनसे सामना ही ना हो,कई बार वह उनके डर से बोगी तक बदल लेते थे।

आज उस टोली को अपनी बोगी में चढ़ते देख वह मन ही मन काँप गए। दैनिक यात्रियों की  वो टोली गेट पर खड़ी थी,ट्रेन रेंगने लगी थी।एक ग्रामीण औरत और उसकी जवान बेटी रेंगती गाड़ी में चढ़ने का प्रयास कर रहे थे।

“भैया, ये रीज़ब (रिज़र्ब) डिब्बा तो नहीं है?”औरत ने गेट घेरे खड़े युवक से पूछ लिया।

“अरे हमारे रहते क्यों चिंता करती हो,” लड़के नेनउसकी जवान बेटी को हाथ पकड़कर ट्रेन में खींचते हुए कहा,”बहुत आराम से ले जाएँगे।” पीछे -पीछे औरत भी बोगी में चढ़ आई थी।

वो वातानुकूलिक बोगी थी।दैनिक यात्रियों की भीड़ को डिब्बे में चढ़ते देखकर उसमें यात्रा कर रहे यात्रियों ने अपनी चादरें सिर तक ओढ़ ली थीं , मानो गहरी नींद में सो रहे हों। रामसहाय भीअखबार पढ़ने का नाटक कर रहे थे।

देहाती औरत और उसकी बेटी उन युवकों के बीच घिरे हुए थे। उनके कुछ साथी ‘साइड अपर’ सीट पर बैठे थे, वहाँ तिल भर भी जगह नहीं थी।

“बिटिया थक जाएगी, इसे यहाँ भेज दो। हम आराम से बिठा लेंगे।” वहाँ बैठा एक लम्पट किस्म का लड़का बोला।

“भैया, वहाँ जगह कहाँ है, हम यहीं ठीक हैं।”भोली-भाली ग्रामीण औरत ने कहा।

“अरे, जगह ही जगह है, देखो …” उसी लड़के नेअपने बगल में बैठे साथी को अपनी गोद में बिठाते हुए कहा।

लड़की संकोच कर रही थी ,बचाव के लिए अपनी माँ की ओर देख रही थी।

उस टोली का ये रोज का काम था,आँखों -आँखों में इशारे हुए,सुनियोजित तरीके से आनन-फानन में उन्होंने लड़की को ऊपरी बर्थ पर चढ़ा दिया। ये देखकर दूर खड़ा उनका एक साथी चिल्लाया,”अबे ,हम भी हैं।”

गाड़ी के गति पकड़ते ही वे लड़की से अश्लील हरकतें करने लगे।लड़की अपने आप में सिकुड़ती जा रही थी,उनकी हरकतें बढ़ने लगी तो वो रुआँसी  होकर माँ से बोली ,”माँ,मुझे नहीं बैठना इनके बीच,नीचे आना है।”

माँ को पूरी बात समझते देर नहीं लगी,वह शेरनी की तरह लपकी,”थल्ले (नीचे) आ जा पुत्तर !” और बेटी को नीचे उतार लिया। माँ की आँखों से चिंगारियाँ-सी निकल रही थीं,उसने  घृणा- भरी नज़रों से उन बेशर्मी से हँसते लड़को को देखा,फिर वातानुकूलित बोगी में सिर तक सफ़ेद चादर ओढ़े यात्रियों पर निगाह डाली और चिल्लाकर बोली ,”मोये !!”

बाबू रामसहाय के पास बैठे सहयात्री ने फुसफुसाकर उनसे पूछा,”मोये! .. इसका क्या मतलब हुआ?”

“मरे हुए!”

“कौन?”

“हम-सब, और कौन!!” डबडबाई आँखों को अखबार में छुपाए रामसहाय फट पड़े। 

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2-अगोचर/भीकम सिंह

अचानक उसने पहाड़ी से उतरते हुए भेड़-बकरियों का रेवड़ देखा, जो किसी डर से ओक-बुरांश के पेड़ों से बचता-बचाता दौड़े चला जा रहा था – बाऽऽ…. बाऽऽ… बाऽऽ…

एक पल उसने मनीषा की ओर देखा जो एक बकरी के बच्चे को अपनी छाती से चिपकाए जी-जान से रेवड़ को रोकने की कोशिश कर रही थी. वह अभी कुकीना स्वाल पर रेवड़ के साथ कुछ देर और रहना चाहती थी, किंतु एक गुलदार (तेंदुए) को जाने मनीषा के रेवड़ से क्या ले जाना था कि ओक की ओट में घात लगाने लगा. बहादुर मनीषा ने चिल्लाकर गुलदार को दुत्कारा, फिर भी वह न टला तो ओक यह देखकर अपनी जान से खेल गया और जड़ों से उखड़कर उसी पर गिर पड़ा.. उसके साथ उसकी टहनियां और पत्ते भी. गुलदार अपनी चोटों से कराहता मोनाल टॉप की ओर भागा… और रेवड़ कुकीना खाल की ओर… दोनों एक-दूसरे के विपरीत दिशा में।

मनीषा ने अपनी साँसें बटोरकर ओक से कहा, “ऐसा क्यों किया?” ओक ने पत्तियां झपकाईं और दो कदम नीचे खिसक गया… उसकी जड़ें जमीन के बाहर निकल आईं।

मनीषा को समझ नहीं आया।

मनीषा कुकीना वाल पर रेवड़ के साथ अकेली ही आती थी, किंतु इस कदर जंगल उसके साथ जुड़ा था… यह उसे आज अहसास हुआ…

अब वह जब थककर चूर हो जाती है, तो सुस्ताने के लिए उसी ओक के तने से सटकर बैठ जाती है.. और आँखें मूँद लेती है… फिर देखती है उस न दिखने वाले को….

-0-भागचंद गुर्जर 1288/7 चौमू हवेली, गंगा पोल   जयपुर – 302002

   ई मेल – bhagchandgurjar1@gmail.com

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