लघुकथा विश्व साहित्य की आदि विधा है; क्योंकि चाहे पंचतंत्र हो, हितोपदेश या वेदों और पुराणों की दृष्टान्त कथाएँ, सबका अनुवाद हुआ और वही सारे संसार में फैली। हिंदी में भी कथा पहले आई, जिसे हम बाद में कहानी के रूप में पाते हैं; लेकिन दृष्टांत, नीति और बोधकथाएँ भी उनके साथ-साथ चलती रहीं। इसी तरह हिंदी के प्रायः सभी कथाकारों ने कभी न कभी लघुकथाएँ भी लिखी ही है: गुलेरी, प्रसाद, प्रेमचंद, विष्णु प्रभाकर, काशीनाथ सिंह, सुदर्शन वशिष्ठ, असगर वज़ाहत, विष्णु नागर, उदय प्रकाश, शशांक,राजकुमार गौतम और नैथानी तक यह सिलसिला जारी हैं। लघु पत्रिकाओं से लेकर ‘सारिका’, ‘हंस’, ‘कथाक्रम’ और ‘कथादेश’ तक में लघुकथाओं के छपने का क्रम निरंतर चलता चला आ रहा है।
कमलेश्वर, कन्हैया लाल नन्दन और अवधनारायण मुद्गल ने ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांकों के जरिए इस विधा की पहुँच बड़े पाठक वर्ग तक बनाई; लेकिन अब वैदिक संस्कृति से लेकर पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी और ब्रज भाषा के बाद खड़ी बोली हिंदी तक की लघुकथाओं का क्रमवार अध्ययन का प्रयास होना चाहिए, क्योंकि बीसवीं सदी के अन्तिम वर्ष में चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा संग्रह ‘उल्लास’ को आर्य स्मृति साहित्य सम्मान मिलने से एक विधा के रूप में लघुकथा या स्थापित हो गई। बाद में मुकेश वर्मा की लघुकथा ‘बलि’ को मिले रमाकांत स्मृति सम्मान ने भी जिसकी पुष्टि की।”
बीसवीं सदी से पहले सिर्फ भारतेंदु हरिशचंद्र की पुस्तिका ‘परिहासिनी’ है, जिसमें खड़ीबोली वाली हिंदी लघुकथा के बीज तलाशे जा सकते हैं, ये पर रचनाएँ हास्यपरक अधिक है, किंचित् व्यंग्य भी उनमें हैं , पर भारतेन्दु की अधिसंख्य रचनाएँ लघुकथा के अनुशासन में मुश्किल से ही बँधती हैं। बीसवीं सदी के आरम्भ में माधवराव सप्रे ने ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ (1901) महत्त्वपूर्ण लघुकथा लिख दी थी, जिसे कुछ लोग हिंदी की पहली कहानी भी मानते हैं, पर हमारी नज़र में यही है हिंदी की पहली लघुकथा। एक समय हम लोग सन् 1909-10 में लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ को हिंदी की पहली लघुकथा मान रहे थे , पर हमारे प्रयास प्रायः सिसिफस के प्रयासों जैसे व्यर्थ सिद्ध होते रहे; जो हमें लेकिन शायद ऐसे प्रयासों से ही कोई पगडंडी निकलती हो, लघुकथा मान रहे अंतत: मंजिल तक पहुँचा दे। 1915 में लिखी हुई छबीले लाल गोस्वामी की लघुकथा ‘विमाता’ को भी हिंदी की प्रारंभिक कहानियों में गिना जाता है, पर है यह भी लघुकथा ही। 1916 में पदमलाल पुन्नालाल बख्शी ने ‘झलमला’ जैसी लघुकथा लिखी थी, तो 1929 में कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ‘सेठजी’ जैसी श्रेष्ठ लघुकथा हिंदी को दी। इनकी रचनाओं को सन् 1935 में प्रेमचंद ने हिंदी की नई कलम कहा था। गद्यकाव्य और कहानी को बीच एक नई पौध, जिसमें गद्यकाव्य का चित्र है, तो कहानी का चरित्र भी। वही पौधा आज लघुकथा के रूप में एक बड़ा वृक्ष बन चुका है। हिंदी की ये प्रारंभिक लघुकथाएँ कहीं से भी पाश्चात्य कथा साहित्य से प्रेरित- प्रभावित नहीं लगती। इनमें निखालिस भारतीय मिट्टी की गंध है। इनका उत्स भारतीय कथा परंपरा में ही कहीं है।
‘कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ऐसे पहले कथाकार हैं, जिनका संग्रह ‘आकाश के तारे धरती के फूल’ हिंदी का प्रारंभिक लघुकथा- संग्रह माना गया है। इसके बाद रावी का लघुकथा- संग्रह ‘मेरे कथागुरु का कहना है’ प्रकाशित हुआ। इनकी लघुकथा ‘पहले बाहर, फिर भीतर’ काफी प्रभावशाली लघुकथा है, वैसे ही जैसे आनंद मोहन अवस्थी की लघुकथा ‘बंधनों की रक्षा’। इसी नाम से सन् 1952 में उनका लघुकथा- संग्रह छपा था, जिसका ब्लर्व हरिशंकर परसाई ने लिखा था। रामवृक्ष बेनीपुरी ने भी इस विधा को अपनी कलम से सींचा और ‘घासवाली’ जैसी सर्वांग-संपूर्ण लघुकथा की रचना की। श्रीचंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की दृष्टांत कथा ‘पाठशाला’ हो या प्रेमचंद की ‘कश्मीरी सेब’, जयशंकर प्रसाद की लघुकथा ‘कलावती की शिक्षा’ हो या विष्णु प्रभाकर की ‘फर्क’, जानकीवल्लभ शास्त्री की ‘पंडितजी’ हो या हरिशंकर परसाई की ‘दानी’ अथवा राजेंद्र यादव की लघुकथा ‘हनीमून’, ये मानक हिंदी लघुकथा परंपरा के ऐसे नमूने हैं, जिनसे आज की लघुकथा कितनी भी अलग दिखने की कोशिश करे, पर उनसे अलग दिख पाना असंभव है, क्योंकि कहीं न कहीं आप परंपरा से जुड़े तो होते ही हैं, लेकिन परंपरा का मतलब जड़ों से जुड़ा होना ही है, जड़ हो जाने से कदापि नहीं। मनुष्य जाति विकास करती है तो कलाविधाएँ भी विकसित होती ही हैं। आज की लघुकथाएँ कल की लघुकथाओं का विकसित रूप हैं। प्रेमचंद की लघुकथाएँ पूर्णतः विकसित लघुकथाएँ हैं, जो बहुत समय तक काल का अतिक्रमण करती रहेंगी।
कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रावी, आनंदमोहन अवस्थी, विष्णु प्रभाकर, चित्रा मुद्गल, सुदर्शन वशिष्ठ, रूपसिंह चंदेल, मनीषराय, सीतेश आलोक, सुकेश साहनी तथा पवन शर्मा आदि के लघुकथा संग्रहों के अलावा कमल गुप्त का लघुकहानी -संग्रह ‘तेजाब’ छपा, जिसमें ‘असर’ जैसी प्रभावशाली लघुकथा है। महेश दर्पण ने भी अपने संग्रह ‘मिट्टी का आदमी’ को लघुकहानी- संग्रह माना है, लघुकथा- संग्रह नहीं। बहरहाल, पृथ्वीराज अरोड़ा के लघुकथा- संग्रह ‘तीन न तेरह’ में ‘दुःख’ जैसी यादगार लघुकथा है, लेकिन पृथ्वीराज की लघुकथा ‘बेटी तो बेटी होती है’ उन्हें विशिष्टतम लघुकथा लेखक का दर्जा दिला देने के लिए पर्याप्त है। इसी तरह सूर्यकांत नागर के लघुकथा संग्रह ‘विष-बीज’ की लघुकथाएँ असर डालती हैं, तो विनायक ने ‘आदमी से आदमी तक’ जैसी यादगार लघुकथा लिखी है। उन्हीं की तरह पक्षु-पक्षी और वन्य जीवन के बहाने बेहतर लघुकथाएँ लिखने वाले कथाकार दामोदरदत्त दीक्षित का भी लघुकथा संग्रह ‘विचित्र वन के विचित्र किस्से’ छपा है। उदय प्रकाश अपनी लघुकथाओं को किस्से कहते हैं। ऐसे ही श्रीनिवास जोशी की लघुकथा ‘जनहित’ में शेर का जीवन तो नहीं है, पर उसके जीवन में मनुष्य की अमानवीयता का अविस्मरणीय चित्रण हुआ है। भारत से बाहर मॉरीशस में बसे हिंदी कथाकार अभिमन्यु अनत की लघुकथा ‘खिलौना’ में रंगभेद का भेदन हुआ है तो वहीं के दूसरे कथाकार रामदेव धुरंधर की लघुकथा ‘आँखें’ हमारी आँखें खोल देने के लिए पर्याप्त है।
सतीश दुबे की लघुकथा ‘अतिथि’ दंगे की स्थिति पर एक महत्त्वपूर्ण रचना है तो मनीषराय की ‘सिंहासन के दावेदार’ आज की राजनीति पर चोट करती है और आर.एस. रमन की ‘नीली फ्रॉक’ पाठक पर गहरा असर डालती है। चित्रा मुद्गल की लघुकथाएँ पाठक पर कहानी के वजन का प्रभाव डालती हैं और पाठक को बताती हैं कि बड़ी लघुकथाएँ कैसे लिखी जाती हैं। भारतीय ज्ञानपीठ से छपे उनके लघुकथा संग्रह ‘बयान’ की लघुकथा ‘रिश्ता’ की नायिका मारथा पाठक के जेहन में स्थायी रूप से अंकित हो जाती है। इसे हम हिंदी की एक मानक लघुकथा कह सकते है। अपना अलग ही रंग लिये हुए हैं अमर गोस्वामी की लघुकथाएँ । ‘स्त्री का दर्द’ उनकी अच्छी लघुकथा है। इसे भी मानक लघुकथाओं में शुमार किया जाना चाहिए और शुमार की जानी चाहिए असगर वजाहत की लघुकथा ‘वीरता’ भी। असगर वजाहत की लघुकथाएँ बहुत गहरी मार करती हैं, मार खाने वाला न चीख पाता है, न चिल्ला पाता है। बस, भीतर ही भीतर बिचलता है और धीरे-धीरे बदलता है। पाठक की विचार प्रणाली में बदलाव लाने का काम ही साहित्य का उद्देश्य है, बाकी रोचक-मनोरंजक तो उसे होना ही चाहिए। असगर की लघुकथाएँ मनोरंजक होते हुए भी मारक हैं।
हिंदी लघुकथा आलोचना पर पहली किताब ‘हिंदी लघुकथा : स्वरूप और दिशा’ लिखने का श्रेय मिला है कृष्णानंद कृष्ण को। दूसरी महत्त्वपूर्ण किताब है कमलकिशोर गोयनका की ‘लघुकथा का व्याकरण’। कृष्णानंद ने कुछ सार्थक लघुकथाओं का सृजन भी किया है, जिनमें से ‘सुख के लिए’ एक विशिष्ट रचना है। सुरेश उनियाल की वजह अशोक लव की ‘अपना घर’ वेदप्रकाश अमिताभ की पहचान, संजीव की लुप्त होती प्रजाति, मृदुला सिन्हा को ‘पराजित अभिमान’ तथा हरिशंकर सक्सेना की ‘सुरक्षा’ आदि अच्छी लघुकथाएँ हैं। नासिरा शर्मा की ‘रुतबा’ एक मध्यवर्गीय व्यक्ति को असहायता को ही उजागर नहीं करती उसके सामंती चरित्र को भी दिखाती है। इसी तरह सामंती ही नहीं, नस्लवाद में डूबे नेताओं की कथनी और करनी को उजागर करती है बालेंद्रशेखर तिवारी की लघुकथा ‘मंच के नीचे’। दामोदर खडसे की ‘गोल्डमेडल’ लघुकथा भी एक यादगार लघुकथा है। ज्ञानप्रकाश विवेक ने ‘मेहमाननवाजी’ जैसी श्रेष्ठ लघुकथा लिखी है, तो पुलिसिया अंदाज और क्रूरता का दिल दहला देने वाला आख्यान प्रेम जनमेजय ने अपनी लघुकथा ‘अजनबी’ में रचा है। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की यादगार लघुकथा है ‘सपने और सपने’। इनका भी लघुकथा- संग्रह छपा है। हिंदी लघुकथा के कुछ अन्य सक्रिय हस्ताक्षर हैं- सतीशराज पुष्करणा, अशोक भाटिया, कमल चोपड़ा और बलराम अग्रवाल, जो सर्जक तो हैं ही, समीक्षक भी हैं। सुदर्शन वशिष्ठ हिंदी लघुकथा के उत्कृष्ट सर्जक हैं, जिन्होंने ‘अकेला ईमानदार’, ‘रामलीला’, ‘धंधा’, ‘उसकी हँसी’ तथा ‘पहाड़ पर कटहल’ जैसी लघुकथाएँ लिखी हैं। चर्चित लघुकथा लेखकों में वे सब पर भारी पड़ते हैं। दुर्भाग्यवश उनकी लघुकथाओं की चर्चा प्रायः नहीं हुई। उनकी लघुकथाओं का संग्रह ‘पहाड़ पर कटहल’ आने के बाद उम्मीद है कि उनकी लघुकथाओं पर चर्चा शुरू होगी।
राजेंद्रकुमार शर्मा की लघुकथा ‘गलत ट्रेन’ एक स्मरणीय लघुकथा है तो दामोदरदत्त दीक्षित की ‘जनता गुफाएँ ‘ नावक के तीर की तरह मारक। तरसेम गुजराल ने ‘पर्वतारोही’ जैसी यादगार लघुकथा लिख डाली है तो मधुदीप ने ‘हिस्से का दूध’। विष्णु नागर की लघुकथाओं का रंग सबसे अलग है और विशिष्ट भी, जिनमें गद्यकाव्य जैसे चित्र हैं तो कहानियों जैसे चरित्र भी। वे कथा भी हैं और कविता भी। विष्णु नागर की ‘बच्चा और गेंद’ एक अद्भुत लघुकथा है। रमेश बत्तरा की ‘सिर्फ हिंदुस्तान में’ पढ़कर पाठक इस विधा की असीम शक्ति और सामर्थ्य का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं, जो विदेश से आए अनिवासी भारतीय की भारतीयता के दर्शन ही नहीं कराती, इसके प्रति उसे नतमस्तक भी कर देती है। इसी प्रकार ‘नाकेबंदी’ (सुरेंद्र मंथन), ‘प्रतीक्षा’ (रूपसिंह चंदेल), ‘आफत’ (योगेंद्र दवे), ‘मजाक नहीं’ (माधव नागदा), ‘गुरुदक्षिणा’ (मधु धवन), ‘एक आत्मा की मौत’ (हीरालाल नागर), ‘कंधा और बंदूक’ (हरिमोहन शर्मा), ‘कर्म और धर्म’ (आलोक मेहता), ‘सुरक्षा’ (सुरेंद्र सुकुमार), ‘गमक’ (प्रबोध कुमार गोविल), ‘बस’ (जसबीर चावला), ‘महाकाल’ (उपेन्द्रकुमार राय), ‘कबूतरों से भी खतरा है’ (एन. उन्नी), ‘आग के बारे में एक कहानी’ (शशांक), ‘अदला-बदली (मालती वसंत), ‘प्रतिवाद’ (श्यामसुंदर चौधरी), ‘इंसानी रंग’ (सुभाष नीरव), ‘जब हिम्मत साथ होती है’ (कुलदीप जैन), ‘बेपर्दा’ (अशोक भाटिया), ‘संस्कार’ (महावीर प्रसाद जैन), ‘सामान सौ बरस का’ (कुमार नरेंद्र), ‘बैल’ (प्रमोद कुमार दुवे), ‘विस्थापित’ (भगवती प्रसाद द्विवेदी), ‘बदलाव’ (वीरेंद्र जैन), ‘मंगला’ (उषा माहेश्वरी), ‘एक उसका होना’ (कमल चोपड़ा), ‘आग्रह’ (सतीश राठी), ‘पराया दर्द’ (प्रतिमा श्रीवास्तव), ‘भयमुक्त’ (मालचंद), ‘पुरस्कार’ (श्यामविहारी श्यामल), ‘बैंक ड्राफ्ट’ (गंभीर सिंह पालनी), ‘गरीब’ (कमलेश भट्ट ‘कमल’), ‘उपयोगिता’ (चरणसिंह अमी) तथा ‘सच्चा पंजाबी’ (शहंशाह आलम) जैसी सैकड़ों लघुकथाएँ मानक लघुकथाओं में शुमार की जा सकती हैं।
रवींद्र वर्मा, उदय प्रकाश, अमरीक सिंह दीप, चैतन्य त्रिवेदी, मुकेश वर्मा, सतीशराज पुष्करणा, जगदीश कश्यप, सुकेश साहनी, महेश दर्पण जैसे सैकड़ों कधाकार लघुकथाएँ लिखते रहते हैं और इनमें से कई के लघुकथा संग्रह भी छपे हैं, जिन पर विस्तार से चर्चा की जरूरत है। और हाँ, एन. उन्नी के बारे में सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि लघुकथा लेखकों की छोटी से छोटी सूची में एन. उन्नी को जरूर रखा जाना चाहिए। हिंदी लघुकथा को एक विशिष्टता प्रेमचंद सौंपते हैं तो दूसरी राजेंद्र यादव, तीसरी सुदर्शन वशिष्ठ तो चौथी चित्रा मुद्गल और पांचवीं विष्णु नागर। इसी क्रम में आगे आते हैं एन. उन्नी। एन. उन्नी हिंदी लघुकथा को भाषा और भाव की जो गरिमा सौंपते हैं, वह हिंदी में दुर्लभ है, जबकि वे हिंदीतर भाषी हिंदी रचनाकार हैं, मलयालम उनकी मातृभाषा है और वे उसमें भी लिखते हैं। कुछ-कुछ ऐसी ही बात मालचंद की लघुकथाओं के बारे में कही जा सकती है, जिनकी लघुकथाओं में जितनी कथा है, उतनी ही कविता। न भाषा का बोझ, न भावों की बहुत ऊंची उड़ान, बस, उतनी ही, जितनी हिंदी लघुकथा को चाहिए। पवन शर्मा की लघुकथाएँ भी एन. उन्नी और मालचंद के बराबर गर्व के साथ रखी जा सकती हैं।
बीसवीं सदी में दो सौ से अधिक कथाकारों ने लघुकथाएँ लिखी है। इस कोश में वे सब नहीं हैं। यह उनकी नहीं, हमारी सीमा है। अन्य संकलनों में कुछ तक हमारी पहुँच बनेगी तो उन्हें शामिल कर हमें खुशी होगी।
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