‘‘दुलारी अब नहीं मुझसे बसों में चढ़ा–उतरा जाता। ड्यूटी पर जाकर बैठना भी मुश्किल लगता है, वैसे डॉक्टर ने भी राय दी, भई आराम कर, ज्यादा चलना–फिरना नहीं, बेआरामी में हालत खराब होने का डर है।
‘‘रब्ब ही बैरी हुआ फिरता है, अगर लड़का कहीं छोटे–मोटे धंधे में अटक जाता,किसी न किसी तरह टैम निकालते रहते।’’ शिवलाल की बात सुनकर पत्नी का दुख बाहर आने लगा।
‘‘मैंने तो अब रिटायमैंट के कागज भेज देने हैं, बहुत करली नौकरी अब जब सेहत ही इजाजत नहीं देती।’’ शिवलाल ने अपनी बात जारी रखते कहा।
‘‘वह तो ठीक है…पर….पत्नी ने अंदर का फिक्र जाहिर करते हुए कहा। पर पुर का क्या करें…..? मैं तो खुद ही नहीं चाहता।’’
‘‘मैं तो कहती हूँ धीरे–धीरे यूँ ही जाते रहो, तीन साल पड़े हैं रिटैरमेंट में, क्या पता अभी क्या बनना है। रब्ब ने गर हम पर पहाड़ गिरा ही दिया है, बाद मैं नौकरी तो मिल जाएगी लड़के को, बेकार फिरता है…..।’’ यह सुनते शिवलाल के चेहरे पर एकदम पीलापन छा गया। पत्नी की आँखों से टप्–टप् आँसू गिरने लगे।
अनुवाद–डॉ. श्यामसुंदर दीप्ति