मनोहर बाबू कई दिनों से बीमार चल रहे थे. डाक्टर के परामर्श पर दवाइयां भी नियमित ले रहे थे, परंतु बुखार था कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा था। शारीरिक जांच और दवाओं की वजह से घर का बजट बुरी तरह बिगड़ चुका था।
बिस्तर पर लेटे हुए कराह रहे थे कि बगल में रखा मोबाइल बज उठा। उन्होंने पत्नी को आवाज दी, ‘गुड्डी की अम्मा, देखना तो किसका फोन है?’
पत्नी ने मोबाइल पर नजर डालते हुए कहा, ‘गुड्डी का है।’
‘उसे मत बताना कि मैं कई दिनों से बीमार हूँ।’
‘… परंतु वह जानती है. मैंने उसे बता दिया था।’
‘क्या जरूरत थी। खामख्वाह परेशान होती रहेगी।’
‘ कैसे नहीं बताती। आपका बुखार तो उतर ही नहीं रहा।’
इसी बीच फोन कट चुका था और फिर से दुबारा बजा।
‘अब सुन लो, क्या कह रही है?’ कहकर मनोहर बाबू ने करवट बदली।
फोन पर कुछ देर बात करने के बाद पत्नी ने कहा, ‘आने की जिद्द कर रही है। मैंने तो बहुत मना किया परंतु वह कल ही आ रही है।’
सुनकर मनोहर बाबू के माथे की चिंता की रेखाएं और अधिक गहरा गई। पैसों का प्रबंध कहां से हो, इसी सोच में वे डूबते चले गए। लौटते वक्त बेटी को खाली हाथ भेज भी तो नहीं सकते।
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