
जब लघुकथा डॉट कॉम के चर्चित स्तंभ ‘मेरी पसंद’ के लिए मैं स्तरीय लघुकथाओं की खोज कर रहा था, तब यात्राओं के विषय में अज्ञेय जी द्वारा कही गई एक बात अनायास ही मेरे दिमाग में गूँज उठी कि ‘‘जानना ही सब कुछ नहीं है। देखना, और जो देखा उसके बारे में सोचना भी बड़ी बात है।’’
इसके बाद मैंने ‘मेरी पसंद’ के लिए लघुकथाओं की खोज बंद कर दी, और यह सोचने के लिए बाध्य हुआ कि लघुकथा विधा पर शोध कार्य के दौरान और उसके बाद भी इतना पढ़ा-लिखा कि सैकड़ों लघुकथाएँ और उनके शीर्षक अभी भी मेरे मन-मस्तिष्क में गूँज रहे हैं। जिन पर अभिनय के माध्यम से कई बार एकल प्रस्तुति भी दे चुका हूँ। उनमें से कोई भी दो लघुकथाएँ हो सकती हैं। बस इसी आधार पर मैंने कस्तूरीलाल तागरा जी की लघुकथा ‘गुलाब के लिए’ और सतीश दुबे जी की लघुकथा ‘पासा’ का चयन किया कि अपनी समझ के अनुसार इनका ही वैचारिक और तात्विक विश्लेषण किया जाए। अज्ञेय जी को पढ़ने के बाद यह ख़याल उठ रहा था कि लघुकथा का सृजन भी एक जटिल यात्रा है। इस यात्रा में अपने समाज को देखना, सोचना और उसी अनुसार अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व का निर्वहन बहुत जरूरी बात है। यदि यह न हुआ तो लघुकथा और लघुकथाकार, दोनों ही कूड़े के ढेर से अधिक न हुआ। मेरी दृष्टि में दोनों लघुकथाएँ बाहरी (राजनीतिक व्यवस्था) और अंदरूनी (पारिवारिक) ताने-बाने की समस्याओं को बहुत अलग एवं सरल तरीके से उठाती हैं, और सोचने के लिए विवश करती हैं कि धन-दौलत कमाकर या सफलता के उच्च पायदान पर खड़े होकर भी आज हम कहाँ खड़े हैं? बहरहाल। मेरी बातों में दोनों लघुकथाओं के लिए तुलनात्मक बातें भी आएँगी जो केवल लघुकथाओं को समझने के लिए होंगी। न कि किसी लघुकथाकार को ऊपर-नीचे उठाने-गिराने की। अब आते हैं दोनों लघुकथाओं पर।
कस्तूरीलाल तागरा की लघुकथा ‘गुलाब के लिए’ अपनी बुनावट में जितनी सरल दिखाई देती है, उतनी ही तीखी सामाजिक विडंबना और विसंगतियाँ अपने भीतर समेटकर चलती है। माली, गुलाब और घास ये तीनों ही केवल सामाजिक चरित्र नहीं, बल्कि वर्ग-संबंधों के ठोस एवं सार्वभौमिक रूपक हैं। माली का श्रम यहाँ निष्पक्ष नहीं, अपितु सत्ता या ताकतवर मनुष्य द्वारा निर्देशित है। वह सौंदर्य और विशेषाधिकार के प्रतीक गुलाब को बचाने के लिए घास को निर्ममता से उखाड़ने में थोड़ा भी संकोच नहीं करता। लघुकथा का सबसे प्रभावी बिंदु वह क्षण है जहाँ बगीचे की घटना और सड़क पर हो रहे श्रमिक आंदोलन एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। लघुकथा में इस दृश्य का उपजना भी आकस्मिक नहीं, बल्कि लघुकथाकार की सुनियोजित, सुदृढ़ एवं वैचारिक संरचना है, जो यह स्थापित करता है कि शोषण का तंत्र हर स्तर पर एक जैसा ही होता है। चाहे वह प्रकृति का हो या मनुष्य द्वारा बनाई गई इस दुनिया-समाज का।
इस लघुकथा की आत्मा, उसकी बातें और समस्या चूँकि प्रतीकों के माध्यम से उजागर हो रही है, अतः लघुकथा के साथ इसकी तीव्रता, तीखापन और समझ की सीमा भी स्वतः जुड़ जाती है। लघुकथा के प्रतीक इतने प्रत्यक्ष हैं कि यह कथावस्तु पाठकों को अर्थ-निर्माण की स्वतंत्रता बहुत कम देती है। घास का अंतिम वाक्य कि ‘कुछ खास नहीं, बस किसी गुलाब के लिए घास उखाड़ी जा रही है’ अत्यंत प्रभावशाली है, जो ‘कहता’ अधिकाधिक है और ‘दिखाता’ बहुत कम। विचारणीय है कि लघुकथा इसलिए भी आकर्षण, अनोखी और आँख की विधा है कि वह अपने प्रतीकों के माध्यम से कभी कम कहती है, कभी बहुत अधिक दिखाती है। कभी बहुत अधिक कहती है और कभी कम दिखाती है। जैसा कि इस लघुकथा में भी देख सकते हैं। गुलाब का चरित्र बिलकुल अलग और एक रेखीय है। इसलिए उसमें आत्ममुग्धता तो है, पर अंतर्द्वंद्व नहीं, जिस कारण व्यंग्य की धार सतही हो जाती है। यह सब होने के बावजूद यह लघुकथा अपने अंत के कारण लंबे समय तक मनुष्य स्मृति और व्यवस्था को चुभती है। पाठक बहुआयामी दृष्टि का है, तो लघुकथा उन्हें महसूस करा देती है कि व्यवस्था हमेशा ही किसी ‘गुलाब’ के लिए ‘घास’ को कुचलने और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ तैयार बैठी हुई है। जो कमजोर है और गांधी के शब्दों में जिसे अंतिम जन कहा जाता है, व्यवस्था की मार हमेशा उसी पर पड़ती है। श्रमिकों के संदर्भ में बस एक बार किसी औद्योगिक क्षेत्र या स्लम एरिया का भ्रमण ही कर लीजिए। रोटी-पानी, शोषण, अव्यवस्था और जीवन का पाठ बहुत कुछ समझ में आ जाएगा। बेशक… इस भ्रमण से आँखें खुलें या न खुलें पर बहुत कुछ समझ में अवश्य आ जाएगा।
अब आते हैं दूसरी लघुकथा यानी हिंदी साहित्य के चर्चित लघुकथाकार सतीश दुबे की लघुकथा ‘पासा’ पर। ‘पासा’ का संसार कस्तूरीलाल तागरा की लघुकथा ‘गुलाब के लिए’ से विपरीत और बिलकुल भिन्न आस्वाद का है। इस लघुकथा की मारक क्षमता और संवेदना भी बहुत गहरी है। हालांकि यहाँ कोई प्रत्यक्ष सामाजिक-श्रमिक आंदोलन, हो हल्ला, शोर या बात-बात पर अपनी ओर से या सरकार-संस्था की ओर से सफाई देने की मानसिकता नहीं, बल्कि घरेलू जीवन के भीतर छिपा हुआ बारीक अंतर्द्वंद्व, पीड़ा और भावना का असंतुलन है। संवादों की एकरसता के क्रम में ‘हाँ, हूँ’ वास्तव में पारिवारिक जीवन के रास्ते में थके हुए रिश्ते की लंबी थकान व्यक्त करती है, जिसमें संवाद औपचारिकता मात्र बनकर रह जाता है। पत्नी के प्रश्न या कुछ भी पूछने के उत्तर में पति का हर उत्तर एक मशीनी प्रतिक्रिया की तरह है जिसमें न रुचि है, न संवेदना, न ही मानवीय प्रेमिल भावना और सम्मान। लघुकथा की वास्तविक शक्ति उसके अंतिम मोड़ में निहित है, जहाँ पत्नी के मुख से ‘कुमुद’ का नाम सुनते ही वह व्यक्ति यानी पति अचानक इतना सक्रिय, इतना उत्सुक और इतना जीवंत हो उठता है कि विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि कुछ समय पहले तक यही आदमी यहाँ पर बैठा हुआ ’हूँ हाँ’ कर रहा था। यहीं से उसके चरित्र का असली चेहरा और दूषित मन खुलने लगता है। रील-रियल, यूट्यूब, फेसबुक और आभासी दुनिया के इस दौर में सौ दंपतियों पर एक छोटा सा शोध कर लीजिए। मुझे संशय है कि कम से कम अस्सी-नब्बे पतिदेव अपनी पत्नी संग इसी प्रकार उबाऊ जिंदगी जी रहे होंगे। उन्हें ‘कुमुद’ के रूप में कुछ नया चाहिए, जो उन्हें समझ-बूझ सकें लेकिन वे स्वयं या अपनी पत्नियों को समझने और उन्हें सम्मान देने का प्रयत्न नहीं करेंगे। यह भी सहनशीलता की सीमा है!
इस लघुकथा में पत्नी का अंतिम वाक्य कि ‘कुमुद भी हाँ-हूँ करती रही’, केवल प्रत्युत्तर नहीं, बल्कि सधा हुआ व्यंग्य है। यह वाक्य लघुकथा और कथ्य को भी चक्रीय संरचना देता है, जहाँ पत्नी द्वारा मौन तिरस्कार और उपेक्षा उसी रूप में लौटा दी जाती है जिस प्रकार पति लौटा रहा है। अंत में लघुकथा का अंत मनोवैज्ञानिक धरातल पर पहुँचकर रुक जाता है। यद्यपि पात्रों के आपसी संबंधों की पृष्ठभूमि का अभाव इस लघुकथा को भी कुछ हद तक सतही बनाती है कि किसके साथ किसका क्या और कैसा सम्बन्ध हैं? तथापि इसका अंत और प्रभाव तीखा है। एक बात यह भी कि लघुकथा के गहरे पानी पैठ पाठक लघुकथा की कथावस्तु का कुछ हद तक पूर्वानुमान भी लगा सकते हैं। हालाँकि लघुकथा या किसी भी विधा में कथावस्तु का पूर्वानुमान नामक यह बिंदु गौण होता है अन्यथा पाठकीय-लेखकीय स्तर पर सोच और सृजन बहुत कठिन हो जाएगा।
समग्रता में कस्तूरीलाल तागरा की लघुकथा ‘गुलाब के लिए’ और सतीश दुबे की लघुकथा ‘पासा’, दोनों ही लघुकथाएँ अपने-अपने स्तर पर उपेक्षा, टीस, शोषण और अव्यवस्था की दुनिया रचती-दिखाती हैं। एक में जहाँ वर्ग संघर्ष की राजनीति है, वहीं दूसरी में निजी, पारिवारिक और भावनात्मक उतार-चढ़ाव का संगम। पहली लघुकथा व्यवस्था की क्रूरता को उद्घाटित करती है तो दूसरी लघुकथा मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक स्वार्थ को। दोनों का शिल्प संक्षिप्त, विषय व्यापक और हमारे आसपास का है। भाषा-शैली प्रवाहमयी और प्रहार का प्रभाव बिलकुल सीधा-सधा एवं गहरा। एक लघुकथा बाहरी दुनिया की पोल खोलती है, तो दूसरी लघुकथा मन और पारिवारिक दुनिया और आंतरिक विघटन की। दोनों ही लघुकथाओं में व्यापक और समृद्ध विवरण नहीं है लेकिन सोचने-विचारने के लिए बहुत कुछ है। कथाकारों के कथाकार अन्तोन चेखव कहते हैं कि ‘‘आदमी को यह दिखला दो कि वह वास्तव में कैसा है तो वह निश्चय ही बेहतर आदमी बन जाएगा।’’ दोनों लघुकथाओं को इसी दृष्टि और सामाजिक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। बहरहाल। अब चलते हैं दोनों लघुकथाओं के पाठ की ओर, जिनके शीर्षक भी बहुत कमाल के हैं।
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1. गुलाब के लिए : कस्तूरीलाल तागरा
माली ने जैसे ही बगीचे में प्रवेश किया। कुछ पौधे उल्लास से तो कुछ तनाव से भर गए।
माली ने अपनी खुर्पी संभाली। गुलाब के पौधे के इर्द-गिर्द उग आई घास को खोद-खोद कर क्यारी के बाहर फेंकने लगा। उसके बाद उसने मिट्टी में खाद डाली और क्यारी को पानी से भर दिया।
क्यारी के बाहर एक तरफ घायल पड़े घास को माली इस समय जल्लाद जैसा लग रहा था। पर वह बेचारा कर क्या सकता था। ठीक इसी समय घास को बगीचे के बाहर वाली सड़क से ऊँची-ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं-मजदूर एकता जिन्दाबाद। मजदूर एकता…
आवाजें और ऊँची होती चली गईं। थोड़ी देर में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज शुरू कर दिया। आन्दोलनकारी इधर-उधर भागने लगे। चीख पुकार मच गई। चोट खाए कुछ लोग बचने के लिए बगीचे की ओर भागे। पुलिस लाठियाँ भाँजते हुए वहाँ भी पहुँच गई।
गुलाब ने कोलाहल सुना तो पास ही घायल पड़ी घास से इठलाते हुए पूछा-‘‘अबे घास! यह सब क्या हो रहा है ?’’
घास ने तिलमिलाकर जवाब दिया-‘‘कुछ खास नहीं, बस किसी गुलाब के लिए घास उखाड़ी जा रही है।’’
2. पासा : सतीश दुबे
‘‘खाना लगा दूँ?‘‘
‘‘हूँ…!‘‘
‘‘मूड तो अच्छा है?‘‘
‘‘हाँ…!‘‘
‘‘स्मिता आजकल जिद नहीं करती।‘‘
‘‘हूँ…!
‘‘अब बाजार भाव फिर से बढ़ने लगे हैं।’’
‘‘हाँ…!’’
‘‘पड़ोस के वर्मा जी का बच्चा बहुत बीमार है।’’
‘‘हूँ…!’’
‘‘थोड़ी मिठाई लीजिए ना!’’
‘‘ऊँ-हूँ…।’’
‘‘नीता की शादी में चलेंगे ना?’’
‘‘हाँ-हाँ…।’’
‘‘…।’’
‘‘…।’’
‘‘आपकी क्लास-फैलो कुमुद आई थी, बड़ी देर तक इन्तजार करती रही।’’
‘‘अच्छा! कब? कहाँ है वह आजकल? कैसी है? तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? बताओ, और क्या-क्या कहा उसने…?’’
‘‘मैंने यह सब उससे पूछा था किन्तु वह हाँ-हूँ करती रही।‘‘
–0-खेमकरण ‘सोमन’, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग,राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय तलवाड़ी-थराली, जिला- चमोली, उत्तराखंड, पिनकोड- 246482
ईमेल : khemkaransoman07@gmail-com