इंटरव्यू लेने के लिए सामने लगभग सात-आठ लोग बैठे थे। वे आपस में कुछ विचार – विमर्श कर रहे थे। शालीनता ने तो रात भर जगकर पूरी तैयारी की थी। दिन में समय निकालना तो उसके लिए दूभर था। उसी वक्त शालीनता के दिमाग में कई ख़यालात एक साथ गडमड हो रहे थे –
“गैस बंद करना कहीं भूल तो नहीं गई! कान की बालियाँ तो तकिये के नीचे ही भूल आई। भगवान जाने मिलेगा भी या नहीं! माता जी ने तो आज कोफ्ते बनाने को कहा था। उफ्फ! तैयारी तो की नहीं! अब आज फिर से डाँट सुननी पड़ेगी।”
प्रश्न से उसका ध्यान भंग हुआ।
“तो आपने हिन्दी में पी.एच.डी. की है। बहुत अच्छा! आपके प्रिय कवि कौन हैं?”
“जी! सूर्यकांत त्रिपाठी निराला!”
“बहुत सुन्दर! उनकी एक रचना सुनाइए!”
शालीनता कुछ देर तक जड़वत् बैठी रह गई। क्षण भर पहले ही तो वह कहाँ- कहाँ घूम कर आ गई थी। कुछ जवाब ही नहीं सूझा।
“कुछ तो बोलिए!”
“जी क्षमा चाहूँगी! कुछ याद नहीं आ रहा। अचानक न जाने दिमाग को क्या हो गया! कृपया कोई अन्य प्रश्न पूछ लें!”
“नेक्स्ट…..”
हताश होकर कमरे से बाहर निकलते ही बिजली की तरह पंक्तियाँ कौंध गईं।
“वर दे वीणा वादिनि वर दे!”
उसे तो पूरी कविता याद है। कई बार उसने इसे गाया भी है। फिर! फिर क्या हुआ!
उसे लगा उसकी वरदायिनी माँ तेल, मसाले, कोफ्ते, झाड़ू, बर्तन, पोतडे़, मच्छरदानियों के नीचे दबी- कुचली जा रही हैं। न जाने कई मन पत्थरों को हटाने में कितनी सदियाँ लगेंगी।
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