जुलाई 2026

मेरी पसन्दमेरी पसंद की दो लघुकथाएँ     Posted: March 1, 2026

मेरी पसंद की दो लघुकथाएँ हैं- 1 ‘सलाम’ 2 ‘बस छूट गई’ इन दोनों लघुकथाओं पर क्रमशः मेरे विचार प्रस्तुत हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री योगराज प्रभाकर की लघुकथा ‘सलाम’ संक्षिप्त, प्रभावी और सोचने के लिए मजबूर करने वाली व्यंग्यात्मक शैली की लघुकथा है।

         लघुकथा का कथानक दिखावा बनाम वास्तविकता, प्रतिष्ठा का पाखंड व शक्ति की सापेक्षता है। अंतिम पंक्ति में मौजूद असंभव माँग, ‘रात में सूरज का उदय’ यह संकेत देता है कि दिखावे से सच्ची शक्ति नहीं बनती और कुछ चीजें अपनी सीमाओं के साथ ही सत्य होती हैं।

        लघुकथा में दो पात्र हैं- सूरज और फक्कड़। इन्हीं दोनों पात्रों के बीच संवाद चलता है। सूरज पारंपरिक रूप से शक्ति, महिमा और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। यहाँ वह स्वाभिमानी पर कुछ असुरक्षित भी दिखाई देता है। उसे मान्यता चाहिए। फक्कड़ सहज, व्यंग्यपूर्ण, साधारण बुद्धि वाला लेकिन तर्कपूर्ण आलोचक।

      सूरज चाहता है कि फक्कड़ उसको सलाम करे। फक्कड़ मानने से इंकार करता है और कहता है सूरज कमजोर है। सूरज कहता है कि अगर वह सबल साबित कर दे, तो वह सलाम करेगा; फक्कड़ कहता है-“रात में उदय होकर दिखा दो।” संवाद इसी पकड़ पर समाप्त होकर एक कटु-व्यंग्यात्मक संदेश देता है।

     रचना संवाद प्रधान,संक्षिप्त और अत्यंत प्रभावी है। उसकी संक्षिप्तता उसे और प्रभावी बनाती है।

     भाषा सरल और सहज है। संवादों में ताज़गी और चुटीलापन है। शब्दों का चयन और सांकेतिक वाक्य अंतिम लाइन के प्रभाव को बड़ी ताकत के साथ उभार देता है- “रात में उदय होकर दिखा दो।”

      सूरज प्रतिष्ठा,शक्ति और उच्चता का प्रतीक है वहीं रात में उदय होना असंभव अपेक्षा,प्रदर्शन का प्रतीक है जिसके द्वारा वास्तविकता को बदलने की माँग की जाती है।यह स्थिति पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है।

       कथानक परंपरागत श्रद्धा बनाम सत्यापन की माँग का संघर्ष दिखलाता है जो पुष्टि के बजाय विडम्बना के साथ खत्म होता है। यह नैतिक निर्णय या स्पष्ट विजेता नहीं दिखाता, बल्कि पाठक को टिप्पणी के लिए छोड़ देता है।

‘बस छूट गई’ लघुकथा सुप्रसिद्ध लघुकथाकार श्री हरभगवान चावला की अत्यंत प्रभावी रचना है।

‘बस छूट गई’ शीर्षक अत्यंत सार्थक और प्रतीकात्मक है। यह केवल घटना नहीं, बल्कि जीवन को चुनने का निर्णय भी दर्शाता है।

      लघुकथा का कथानक अत्यंत संक्षिप्त, स्पष्ट और प्रभावी है। दादी के सपने से आरंभ होकर पोती की प्रतिक्रिया और दादी के संकल्प पर समाप्त होती लघुकथा जीवन-मृत्यु के द्वंद्व को सहज रूप में प्रस्तुत करती है। आरंभ, उत्कर्ष और समापन तीनों चरण संतुलित हैं। अंत में “पक्का छोड़ दूँगी” कथानक को भावनात्मक पूर्णता देता है।

कथा में दादी और पोती अत्यंत सशक्त पात्र हैं। परलोक में दिखने वाले दादा, पिता और गाँव के लोग प्रतीकात्मक पात्र के रूप में उपस्थित हैं।

         जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी दादी एक अनुभवी स्त्री, जो परिवार के स्नेह से बंधी है।पोती मासूम होते हुए भी जीवन-मूल्यों को समझने वाली,आशा और भविष्य का प्रतीक।

      संवाद इस लघुकथा की सबसे बड़ी ताकत हैं।

“बस छूट गई, है न!”

“अब कभी बस आए तो छोड़ देना…”

संवाद स्वाभाविक, संक्षिप्त और भावना प्रधान हैं। अनावश्यक वर्णन के बिना कथा आगे बढ़ती है। लघुकथा की भाषा सरल, सहज और भावनात्मक है। बिंबों का सुंदर प्रयोग हुआ है। शीशा इहलोक और परलोक की आभासी सीमा है जो जीवन और मृत्यु को सहज व्याख्यायित कर देती है। बस महाप्रयाण का प्रतीक है

     लघुकथा कथोपकथनात्मक शैली में है, जो पाठक को कथा से तुरंत जोड़ लेती है।

      लघुकथा का मूल कथ्य जीवन के प्रति लगाव, पारिवारिक ज़िम्मेदारी और प्रेम है। यह संदेश देती है कि मृत्यु का आकर्षण भी तब फीका पड़ जाता है, जब जीवन में किसी की ज़रूरत और स्नेह जुड़ा हो।रचना पाठक को भीतर तक छूती है। अंत में करुणा, आशा और स्नेह का मिला-जुला भाव उत्पन्न होता है। यही लघुकथा की सफलता का मानदंड है। जीवन-मूल्यों को सरल, पर गहरे ढंग से प्रस्तुत करने वाली एक सशक्त और स्मरणीय लघुकथा है।

1-सलाम/ योगराज प्रभाकर

सूरज ने फक्कड़ से कहा:”मुझे झुक कर सलाम कर !”

“तुझे सलाम करूँ ? मगर क्यों?”

“ये दुनिया का दस्तूर है, चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं !”

“करते होंगे, मगर मैं तेरे आगे सिर नहीं झुकाऊँगा !”

“मगर क्यों ?”

“क्योंकि तू बहुत कमज़ोर और निर्बल है, जिस दिन सबल हो जाएगा, मैं तेरे आगे सर ज़रूर झुकाऊँगा !”

“कमज़ोर और निर्बल ? और वो भी मैं ?”

“हाँ !”

“तो अगर मैं ये साबित कर दूँ कि मैं सबल हूँ, तो क्या तुम मुझे सलाम करोगे?”

“एक बार नही सौ- सौ बार सिर झुकाकर सलाम करूँगा !”

“तो फिर जल्दी से बता कि तुम्हें यकीन दिलवाने के लिए मुझे क्या करना होगा ?

फक्कड़ से मुस्कुराते हुए कहा:एक बार, सिर्फ एक बार रात में उदय होकर दिखा दो !”

-0-

बस छूट गई/ हरभगवान चावला

दादी पोती को अपना सपना सुना रही थी, “मैं शीशे के इस पार खड़ी थी। शीशे के उस पार यमलोक था। वहाँ तुम्हारे दादा थे, तुम्हारे पापा थे, गाँव के बहुत सारे लोग भी दिखाई दे रहे थे। तभी एक बस आई। शीशे के पार से तुम्हारे दादा बस की तरफ़ इशारा करते हुए चिल्लाए – ‘बस पर चढ़कर आ जाओ।’ मैं बस की तरफ़ दौड़ी कि बस चल पड़ी। मैं बस के पीछे भागी, पर…”“बस छूट गई, है न!” पोती ने वाक्य पूरा किया।

“हाँ।”

“बहुत अच्छा हुआ।” पोती ताली बजाती हुई ज़ोर से हँसी और तुरंत ही संजीदा हो आई, “हम तीनों बहनों को तुम्हारी बहुत ज़रूरत है दादी! अब कभी बस आए तो छोड़ देना, चाहे दादा कितना ही बुलाएँ।”

दादी ने पोती को अपने सीने से लगाया और कहा, “पक्का छोड़ दूँगी।”

-0-

         लघुकथा का कथानक दिखावा बनाम वास्तविकता, प्रतिष्ठा का पाखंड व शक्ति की सापेक्षता है। अंतिम पंक्ति में मौजूद असंभव माँग, ‘रात में सूरज का उदय’ यह संकेत देता है कि दिखावे से सच्ची शक्ति नहीं बनती और कुछ चीजें अपनी सीमाओं के साथ ही सत्य होती हैं।

        लघुकथा में दो पात्र हैं- सूरज और फक्कड़। इन्हीं दोनों पात्रों के बीच संवाद चलता है। सूरज पारंपरिक रूप से शक्ति, महिमा और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। यहाँ वह स्वाभिमानी पर कुछ असुरक्षित भी दिखाई देता है। उसे मान्यता चाहिए। फक्कड़ सहज, व्यंग्यपूर्ण, साधारण बुद्धि वाला लेकिन तर्कपूर्ण आलोचक।

      सूरज चाहता है कि फक्कड़ उसको सलाम करे। फक्कड़ मानने से इंकार करता है और कहता है सूरज कमजोर है। सूरज कहता है कि अगर वह सबल साबित कर दे, तो वह सलाम करेगा; फक्कड़ कहता है-“रात में उदय होकर दिखा दो।” संवाद इसी पकड़ पर समाप्त होकर एक कटु-व्यंग्यात्मक संदेश देता है।

     रचना संवाद प्रधान,संक्षिप्त और अत्यंत प्रभावी है। उसकी संक्षिप्तता उसे और प्रभावी बनाती है।

     भाषा सरल और सहज है। संवादों में ताज़गी और चुटीलापन है। शब्दों का चयन और सांकेतिक वाक्य अंतिम लाइन के प्रभाव को बड़ी ताकत के साथ उभार देता है- “रात में उदय होकर दिखा दो।”

      सूरज प्रतिष्ठा,शक्ति और उच्चता का प्रतीक है वहीं रात में उदय होना असंभव अपेक्षा,प्रदर्शन का प्रतीक है जिसके द्वारा वास्तविकता को बदलने की माँग की जाती है।यह स्थिति पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है।

       कथानक परंपरागत श्रद्धा बनाम सत्यापन की माँग का संघर्ष दिखलाता है जो पुष्टि के बजाय विडम्बना के साथ खत्म होता है। यह नैतिक निर्णय या स्पष्ट विजेता नहीं दिखाता, बल्कि पाठक को टिप्पणी के लिए छोड़ देता है।

‘बस छूट गई’ लघुकथा सुप्रसिद्ध लघुकथाकार श्री हरभगवान चावला की अत्यंत प्रभावी रचना है।

‘बस छूट गई’ शीर्षक अत्यंत सार्थक और प्रतीकात्मक है। यह केवल घटना नहीं, बल्कि जीवन को चुनने का निर्णय भी दर्शाता है।

      लघुकथा का कथानक अत्यंत संक्षिप्त, स्पष्ट और प्रभावी है। दादी के सपने से आरंभ होकर पोती की प्रतिक्रिया और दादी के संकल्प पर समाप्त होती लघुकथा जीवन-मृत्यु के द्वंद्व को सहज रूप में प्रस्तुत करती है। आरंभ, उत्कर्ष और समापन तीनों चरण संतुलित हैं। अंत में “पक्का छोड़ दूँगी” कथानक को भावनात्मक पूर्णता देता है।

कथा में दादी और पोती अत्यंत सशक्त पात्र हैं। परलोक में दिखने वाले दादा, पिता और गाँव के लोग प्रतीकात्मक पात्र के रूप में उपस्थित हैं।

         जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी दादी एक अनुभवी स्त्री, जो परिवार के स्नेह से बंधी है।पोती मासूम होते हुए भी जीवन-मूल्यों को समझने वाली,आशा और भविष्य का प्रतीक।

      संवाद इस लघुकथा की सबसे बड़ी ताकत हैं।

“बस छूट गई, है न!”

“अब कभी बस आए तो छोड़ देना…”

संवाद स्वाभाविक, संक्षिप्त और भावना प्रधान हैं। अनावश्यक वर्णन के बिना कथा आगे बढ़ती है। लघुकथा की भाषा सरल, सहज और भावनात्मक है। बिंबों का सुंदर प्रयोग हुआ है। शीशा इहलोक और परलोक की आभासी सीमा है जो जीवन और मृत्यु को सहज व्याख्यायित कर देती है। बस महाप्रयाण का प्रतीक है

     लघुकथा कथोपकथनात्मक शैली में है, जो पाठक को कथा से तुरंत जोड़ लेती है।

      लघुकथा का मूल कथ्य जीवन के प्रति लगाव, पारिवारिक ज़िम्मेदारी और प्रेम है। यह संदेश देती है कि मृत्यु का आकर्षण भी तब फीका पड़ जाता है, जब जीवन में किसी की ज़रूरत और स्नेह जुड़ा हो।रचना पाठक को भीतर तक छूती है। अंत में करुणा, आशा और स्नेह का मिला-जुला भाव उत्पन्न होता है। यही लघुकथा की सफलता का मानदंड है। जीवन-मूल्यों को सरल, पर गहरे ढंग से प्रस्तुत करने वाली एक सशक्त और स्मरणीय लघुकथा है।

1-सलाम/ योगराज प्रभाकर

सूरज ने फक्कड़ से कहा:”मुझे झुक कर सलाम कर !”

“तुझे सलाम करूँ ? मगर क्यों?”

“ये दुनिया का दस्तूर है, चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं !”

“करते होंगे, मगर मैं तेरे आगे सिर नहीं झुकाऊँगा !”

“मगर क्यों ?”

“क्योंकि तू बहुत कमज़ोर और निर्बल है, जिस दिन सबल हो जाएगा, मैं तेरे आगे सर ज़रूर झुकाऊँगा !”

“कमज़ोर और निर्बल ? और वो भी मैं ?”

“हाँ !”

“तो अगर मैं ये साबित कर दूँ कि मैं सबल हूँ, तो क्या तुम मुझे सलाम करोगे?”

“एक बार नही सौ- सौ बार सिर झुकाकर सलाम करूँगा !”

“तो फिर जल्दी से बता कि तुम्हें यकीन दिलवाने के लिए मुझे क्या करना होगा ?

फक्कड़ से मुस्कुराते हुए कहा:एक बार, सिर्फ एक बार रात में उदय होकर दिखा दो !”

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बस छूट गई/ हरभगवान चावला

दादी पोती को अपना सपना सुना रही थी, “मैं शीशे के इस पार खड़ी थी। शीशे के उस पार यमलोक था। वहाँ तुम्हारे दादा थे, तुम्हारे पापा थे, गाँव के बहुत सारे लोग भी दिखाई दे रहे थे। तभी एक बस आई। शीशे के पार से तुम्हारे दादा बस की तरफ़ इशारा करते हुए चिल्लाए – ‘बस पर चढ़कर आ जाओ।’ मैं बस की तरफ़ दौड़ी कि बस चल पड़ी। मैं बस के पीछे भागी, पर…”“बस छूट गई, है न!” पोती ने वाक्य पूरा किया।

“हाँ।”

“बहुत अच्छा हुआ।” पोती ताली बजाती हुई ज़ोर से हँसी और तुरंत ही संजीदा हो आई, “हम तीनों बहनों को तुम्हारी बहुत ज़रूरत है दादी! अब कभी बस आए तो छोड़ देना, चाहे दादा कितना ही बुलाएँ।”

दादी ने पोती को अपने सीने से लगाया और कहा, “पक्का छोड़ दूँगी।”

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