त का गुस्सा/ उमेश महादोषी
“क्या बनाऊँ?”, वही रोज़ वाला घिसा-पिटा सवाल था।
“जो हो, सो बना लो। हम कौन से सेठ-साहूकार हैं, जो कुछ स्पेशल बनाने के बारे में सोचा जाए।” उसने भी रोज़ की तरह टालते हुए कहा।
“फिर भी चिन्ता तो करनी ही पड़ती है। इन हालात में भी मेहनत-मजूरी करने वाले तन में कुछ तो जाना चाहिए कि नहीं!”
“ऐसे हालात में मेहनत-मजूरी भी कहाँ है। आज दो महीना से तो खाली बैठा हूँ। जो हज़ार-आठ सौ पास थे, वे भी”, उसने मन में उठी परिस्थितिजन्य पीड़ा को दबाते हुए अपनी आँखें भींच लीं।
“वो तो भला हो सरकार का, फ्री में अनाज दे रही है।”
“पर, इस महीने का तो वह भी दो-तीन दिन बाद ही मिलेगा तब…।”
“निकाल लेंगे ये दो-तीन दिन भी किसी तरह। वैसे सुबह, जो रसे के आलू बनाये थे, वो बचे…।”
“वो पनीले आलू…! तो फिर क्या ज़रूरत है और कुछ बनाने की…।”
“ठीक है तो उसी के संग रोटियाँ सेंके ले रही हूँ।”
“यह क्या…? इतनी सारी सब्जी थोड़े ही खा लूँगा मैं। मुझे तो बस आधी करके दो, दूसरी कटोरी में।” उसने अनुमान लगा लिया था कि जिस कटोरी में बचाकर सुबह के पनीले आलू की सब्जी रखी गई थी, वह वैसी की वैसी ही उसकी प्लेट में रख दी गई है।
“ये भी कोई बात हई। इत्ती-सी सब्जी नहीं खा सकते हो। कल को मेहनत पर जाना पड़ेगा तो…?”, पत्नी गुस्सा-सी होने लगी।
“देखो, तुम मेरे खाना खाते समय गुस्सा मत हुआ करो। मुझे भी पता है कि मेरे पेट में कितना हजम हो सकता है। आजकल खाली बैठे-बैठे भूख तो लगती नहीं।” वह दो रोटियाँ आधी सब्जी से खाकर उठने ही वाला था, तभी पत्नी फिर से गुस्साते हुए दो राटियाँ और रख गई, “ऐसे कैसे भूख नहीं लगती तुम्हें। पूरा खाना खाए बिना कैसे चलेगा!”
“ठीक है, पर ये सब्जी ले जाओ; मैंने अपने भर के लिए प्लेट में रख ली है। और खुद भी खाना खा लो।”
पत्नी रसोई में खड़ी-खड़ी खा रही थी। तभी एक हाथ उसकी प्लेट मे डेढ़ रोटी रखकर ज्यों का त्यों पीछे लौट गया। पत्नी अवाक् थी। रोटी के ऊपर टपके आँसुओं को उसकी अँगुलियाँ स्पर्श कर चुकी थीं। वह तेज़ी से घूमी औ पति का चेहरा दोनों हाथों में लेकर अपनी ओर घुमाते हुए बोली, “अब ये सभी करोगे?” आँसुओं की धार उसकी आँखों से भी बहने लगी थी।
“तो क्या नहीं करना चाहिए मुझे? क्या गुस्सा करना केवल औरत क अधिकार है? और क्या मैं यों ही देखता रहूँ तुम्हें झूठमूठ की रोटी खाते हुए?”
दोनों के बहते आँसू एक होने लगे थे।