मैं स्कूल से निकल भागकर सड़क पार आ गया। रोज़ की तरह वह भी स्कूल से निकली और बहुत डरी-सी हालत में वह भी सड़क पार करने लगी। वही चार लडके रोज़ की तरह अजीब-सी आवाजें निकालकर, उस पर ख़ूब हँसे।
पहले लगा था शायद वह ज़्यादा गोरी है या शायद उसकी स्कर्ट थोड़ी ऊँची है, इसलिए लोग ऐसा करते हैं; पर स्कूल की बाक़ी कई गोरी लड़कियों को इससे भी ऊँची स्कर्ट, जानबूझकर सरकाए गए मोज़े, उतरी हुई टाई के साथ लापरवाही से खिलखिलाते सड़क पार करते भी देखा है।
मैं तकने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता था। मेरी हिम्मत नहीं थी कि मैं उसे अपने साथ चलने को कह सकूँ, न मेरी हिम्मत थी कि उन लड़कों को… लड़कों की हिम्मत बढ़ती जा रही थी उसके करीब आने लगे थे- जैसे ही एक लड़का उसके बहुत करीब आ उसे छूता हुआ निकलकर गया, उसकी नज़र उठकर मेरी तरफ़ आई और झुक गई।
वह आत्मग्लानि का पल था, नज़रें वह न हटाती, तो मैं मिलाए रख भी न पाता। दूर जाती उसकी नजरें एक सवाल छोड़ गई थीं मुझ पर और शायद वहाँ तमाशा देखते हर एक पर, किस तरफ़ हो तुम?
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