जून 2026

मेरी पसन्दमेरी पसन्द     Posted: January 1, 2026

मेरी पसन्द की दो लघुकथाएँ हैं-1-उजबक की कदमताल, 2- धरती में गड़ी स्त्रियाँ । इन दोनों लघुकथाओं पर  क्रमशः मेरे विचार प्रस्तुत हैं-

यशशेष मधुदीप की लघुकथा ‘उजबक की कदमताल’ समय, संबंधों और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की एक अत्यंत संवेदनशील अभिव्यक्ति है। यह लघुकथा न केवल एक व्यक्ति की मानसिक स्थिति का चित्रण करती है, बल्कि पूरे सामाजिक परिवर्तन की कहानी कह जाती है।

लघुकथा का मुख्य पात्र बनवारीलाल एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाते-उठाते स्वयं के जीवन से कदमताल नहीं मिला पाया। बचपन में ही पिता के देहावसान के बाद उसने अपने तीनों छोटे भाइयों के लिए पिता का दायित्व निभाया, माँ की मेहनत और त्याग के साथ मिलकर सबको आगे बढ़ाया, परंतु स्वयं वहीं का वहीं रह गया  उसी कच्चे घर, उसी मिट्टी, उसी परंपरा से बंधा हुआ।

     लघुकथा का आरंभ ही एक गहरी संवेदना जगाता है-एक ऐसा व्यक्ति जो जीवनभर परिवार की डोर थामे रहा, पर समय की गति से तालमेल नहीं बैठा पाया। 

     माँ की मृत्यु के बाद जब परिवार एकत्र होता है, तो उसकी उम्मीद थी कि यह मिलन आत्मीयता का क्षण होगा, परन्तु यह केवल विरासत बाँटने की चर्चा में बदल जाता है। यही क्षण कथा का चरमबिंदु है, जहाँ बनवारीलाल की ‘उजबकी’ दरअसल उसकी संवेदनशीलता और समय से पीछे छूट जाने की त्रासदी का प्रतीक बन जाती है।

    लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता से यह दिखाया है कि संस्कार और संवेदना की जगह अब सुविधा और स्वार्थ ने ले ली है।

      लेखक ने अत्यंत सशक्त प्रतीक के रूप में ‘कदमताल’ शब्द का प्रयोग किया है। यह शब्द यहाँ स्थिरता, जड़ता और समय से पीछे छूट जाने का रूपक बन जाता है। जब बाकी तीनों भाई शहरों और विदेशों में अपनी दुनिया बसा चुके हैं, तब भी बनवारीलाल अपने गाँव की सीमाओं में बंधा है मानो वह अतीत की परिधि में ही चक्कर काट रहा हो।

लेखक ने संवादों में बड़ी कुशलता से मूल्यों के क्षरण और आत्मीयता की विडंबना को उकेरा है। “माँ थी तो…”- यह अधूरी पंक्ति बहुत कुछ कह जाती है। यह बताती है कि अब संबंधों की डोर केवल ‘माँ’ की उपस्थिति तक सीमित थी। उसके जाने के साथ ही सारा स्नेह और एकता भी मानो बिखर गई।

अपने कर्त्तव्यों के प्रति समर्पित बनवारीलाल के लिए ‘उजबक’ शब्द का प्रयोग सटीक, सार्थक और व्यंजनात्मक है।आज इस भौतिकतावादी युग में,इस आत्मकेंद्रित समाज में दूसरों के लिए खुद को होम कर देने वाला व्यक्ति ‘उजबक’ ही तो है।

     लघुकथा के अंतिम अंश में जब बनवारीलाल को महसूस होता है कि समय का चक्र बहुत तेजी से घूम रहा है और वह वहीं खड़ा कदमताल कर रहा है।यह केवल एक व्यक्ति की अनुभूति नहीं, बल्कि समूची परंपरागत पीढ़ी का आत्मबोध है। उसे प्रतीत होता है कि जिस जमीन पर उसने अपने जीवन की नींव रखी, वही अब उसके पैरों के नीचे से खिसक चुकी है।

“समय का चक्र बहुत तेजी से घूम रहा है और वह वहीं खड़ा कदमताल कर रहा है।” 

यह पंक्ति लघुकथा की आत्मा है। यह उस व्यक्ति की बेबसी का बयान है, जो अपने आस-पास परिवर्तन को देख तो रहा है, पर स्वीकार नहीं कर पा रहा।

   उजबक की कदमताल’ एक मार्मिक, प्रतीकात्मक और यथार्थवादी लघुकथा है जो पाठक के मन में समय, संबंध और मानवीय मूल्यों के क्षरण पर गहरी छाप छोड़ती है। यह कथा हमें यह सोचने पर विवश करती है कि आधुनिकता की दौड़ में हम कहीं अपने जड़ों से बहुत दूर न चले जाएँ।

    भाषा की सादगी, संवादों की वास्तविकता और भावनाओं की गहराई इस कथा को अत्यंत प्रभावशाली बनाती है। मधुदीप ने बहुत कम शब्दों में समय, मूल्य और पीढ़ीगत अंतर के टकराव को बड़े कौशल से चित्रित किया है। ‘उजबक की कदमताल’ एक ऐसी लघुकथा है जो मनुष्य के भीतर के उस मौन संघर्ष को उजागर करती है जहाँ परंपरा और आधुनिकता का टकराव उसे भीतर से तोड़ देता है। यह लघुकथा हमें आत्ममंथन के लिए विवश करती है।यह हमें सोचने को विवश करती है कि

 क्या समय के साथ आगे बढ़ते हुए हमने अपने संवेदनशील हृदय को पीछे तो नहीं छोड़ दिया है? अपनी संक्षिप्तता में गहन अर्थ समेटे हुए यह रचना एक ऐसा दर्पण है, जिसमें आज का हर संवेदनशील पाठक स्वयं को कहीं न कहीं प्रतिबिंबित पाता है।

प्रसिद्ध लघुकथाकार हरभगवान चावला जी की लघुकथा ‘धरती में गड़ी स्त्रियाँ’ अपने शीर्षक के माध्यम से ही पाठक को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है।यह लघुकथा अत्यंत प्रतीकात्मक और विचारोत्तेजक है।इस लघुकथा में स्त्री-मुक्ति के स्वर की गूंज स्पष्ट रूप से ध्वनित हुई है। इसमें प्रतीक, संवेदना और वैचारिक तीव्रता का विलक्षण संगम है। इसमें कम शब्दों में एक गहरी सामाजिक और दार्शनिक परत उभरती है, जो पाठक को भीतर तक झकझोर देती है।

कथा का आरंभ ही वातावरण-सृजन से होता है-“आसमान में गहरे बादल”, “घना जंगल”, “लकड़ियों का गट्ठर लादे स्त्री”। यह सारा दृश्य न केवल प्राकृतिक परिदृश्य प्रस्तुत करता है, बल्कि स्त्री-जीवन की कठोर वास्तविकता और संघर्ष का संकेत भी देता है। इसी यथार्थ के बीच धरती में गड़ी हुई स्त्रियाँ दृश्य में आती हैं।

     जंगल, वर्षा और धरती में आधी गड़ी स्त्रियाँ यहाँ सामाजिक यथार्थ और स्त्री-अवस्था के सशक्त प्रतीक हैं।

      यहाँ दो दृष्टियाँ टकराती हैं -ऋषि की दृष्टि और श्रमिक स्त्री की दृष्टि।दो पृथक दृष्टिकोणों,परंपरावादी और मुक्तिकामी का टकराव रूपायित होता है।एक ओर ऋषि इन स्त्रियों को ‘कुलटा’ की संज्ञा से विभूषित कर इन्हें दिये गए दंड को शास्त्रोचित बताते हैं तो वहीं श्रमिक महिला जो संघर्षशील है,जो विषम परिस्थितियों से लड़ना और जूझना जानती है उसे ये स्त्रियाँ दासत्व से मुक्ति का प्रयास करती हुई प्रतीत हो रही है।

    ऋषि का दृष्टिकोण उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रतिनिधि है जो स्त्री को “चरित्र” के कठघरे में बाँधती है और दमन को सही ठहराती है।ऋषि उस पितृसत्तात्मक नैतिकता का स्वर हैं जो स्त्री की स्वतंत्रता को ‘अवज्ञा’ और ‘चरित्रहीनता’ के रूप में देखती है। उनकी वाणी में अहंकार है, उनके शब्दों में सदियों का पूर्वाग्रह है-“अवश्य ही ये चरित्रहीन हैं।” इसके विपरीत श्रमिक स्त्री की दृष्टि जीवनदायी और मानवीय है। वह उन्हीं स्त्रियों को “धरती से फूटते अंकुरों” के रूप में देखती है।यह दृष्टि पुनर्जन्म और नवजीवन की है। वह शास्त्र नहीं, अनुभव की भाषा बोलती है। उसकी कल्पना में बारिश विनाश नहीं, मुक्ति है; मिट्टी में समाई देहें मृत्यु नहीं, नवांकुर हैं।वह उन्हीं गड़ी हुई स्त्रियों को धरती से फूटते अंकुरों के रूप में देखती है, जो मुक्ति की ओर बढ़ रही हैं।वे किसी पुरातन शाप या दंड का प्रतीक मात्र नहीं, बल्कि दबी-कुचली, मौन किंतु जीवित चेतना का बिंब हैं।उसका यह कथन –

 “अभी बारिश आएगी… ये पेड़ों को पकड़कर बाहर आ जाएँगी…”

 स्त्री-जीवन के अदम्य जिजीविषा का रूपक है। श्रमिक स्त्री न केवल उन गड़ी स्त्रियों के लिए, बल्कि समूची स्त्री जाति के लिए आशा और प्रतिरोध की लघुकथा अपने अंत में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती, बल्कि विचार की आग को पाठक के भीतर सौंप देती है।

     यह लघुकथा भाषा, प्रतीक और संवाद-प्रधान संरचना का उत्कृष्ट उदाहरण है।

 इसमें प्रकृति और नारी का समानांतर बिंब,परंपरा और विद्रोह का वैचारिक टकराव,मिट्टी, वर्षा और अंकुर की सजीव प्रतीक-व्यंजना,सब कुछ इतनी सघनता से पिरोया गया है कि यह लघुकथा एक सशक्त नारीवादी रूपक बन जाती है।

अंत में उसका कथन “यही प्रलय हम स्त्रियों का मुक्ति गीत बनेगी” इस लघुकथा का उत्कर्ष बिंदु है। 

 यह पंक्ति नारी-सशक्तिकरण, पुनर्जन्म और प्रतिरोध की घोषणा बन जाती है,उनकी आवाज़ बन जाती है।प्रलय यहाँ विनाश नहीं, बल्कि पुनर्जन्म का प्रतीक है। एक ऐसी प्रलय जो एक नए संसार की रचना करेगी।

    यह लघुकथा समर्पण-विद्रोह, मृत्यु और पुनर्जन्म, परंपरा और परिवर्तन के द्वंद्व को मार्मिक और सांकेतिक रूप में प्रस्तुत करती है। यह कथा पाठक के भीतर नैतिकता और न्याय के स्थापित मानकों पर प्रश्न उठाने की शक्ति रखती है और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।संक्षेप में, यह लघुकथा स्त्री की मिट्टी से जुड़ी जिजीविषा, प्रतिरोध और आत्ममुक्ति की गाथा है।

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1-उजबक की कदमताल / मधुदीप

समय के चक्र को उलटा नहीं घुमाया जा सकता।हाँ, बनवारीलाल आज पूरी शिद्दत के साथ यही महसूस कर रहा था। समय चालीस साल आगे बढ़ है मगर वह अभी भी वहीँ खड़ा कदमताल कर रहा है। उसने भी कई बार समय के साथ आगे बढ़ने की बात सोची मगर परम्पराओं और दायित्वों में जकड़े पांवों ने हमेशा ही मना कर दिया, तो वह बेबस होकर रह गया।

    जब सब-कुछ बदल गया है तो उसके पाँव कदमताल छोड़कर आगे क्यों नहीं बढ़ जाते हैं।तीनों छोटे भाई अपनी-अपनी सुविधाओं के तहत शहरों में जा बसे हैं।उनके बच्चे अब सरकारी नौकरियों में अधिकारी हैं, कुछ तो विदेश तक पहुँच गए हैं मगर वह और उसका एकमात्र पुत्र आज तक गाँव के इस कच्चे घर की देहरी नहीं लाँघ पाए। पिता का साया बचपन में ही चारों भाइयों के सिर से उठ गया तो वह उन तीनों के लिए पिता बन गया।जमीन तो थोड़ी ही थी, वह तो माँ की कर्मठता और उसकी जी तोड़ मेहनत थी कि वह सभी छोटों को हिल्ले से लगा सका।

   चार बेटों की कर्मठ माँ की इहलीला कल रात समाप्त हो गई थी और आज दोपहर वह अपने सपूतों के कंधों पर सवार होकर अपनी अंतिम-यात्रा पर जा चुकी थी।उतरती रात के पहले पहर में चारों भाइयों का भरा-पूरा परिवार अपने कच्चे घर की बैठक में जुड़ा हुआ था।

  “बड़े भाई, अब गाँव की जमीन-घर का बँटवारा हो जाए तो अच्छा है।” छोटे ने कहा तो बनवारीलाल उजबक की तरह उसकी तरफ देखने लगा।

    “हाँ,अब गाँव में हमारा आना कहाँ हो पायेगा।माँ थी तो…” मँझले ने जानबूझकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी तो उजबक की गर्दन उधर घूम गई।

       सन्नाटे में तीनों की झकझक तेज होती जा रही है। बनवारीलाल को लग रहा ही कि समय का चक्र बहुत तेजी से घूम रहा है और वह वहीं खड़ा कदमताल कर रहा है। मगर यह क्या! उसके पांवों के तले जमीन तो है ही नहीं।

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2- धरती में गड़ी स्त्रियाँ / हरभगवान चावला 

आसमान में खूब गहरे बादल थे। घनघोर बारिश होने की संभावना थी। घने जंगल में सिर पर लकड़ियों का गट्ठर लादे तेजी से चलती स्त्री अचानक चौंककर रुक गई। ठीक उसी समय सामने की दिशा से आते ऋषि भी ठिठककर रुके। दोनों की दृष्टि जंगल में गाड़ दी गयी उन स्त्रियों पर ठहर गयी, जिनकी देह धरती के भीतर थी, मुख बाहर।

ऋषि ने उस स्त्री की ओर देखते हुए कहा “अवश्य ही ये चरित्रहीन हैं, पतिवर्त्य को खो चुकी कुलटाएँ. शास्त्रों के अनुसार इनको उचित ही दंड मिला है। अभी बारिश आयेगी और ये स्त्रियाँ दलदल में समा जायेगी।” ऋषि के होंठों पर एक वितृष्ण मुस्कान तैरने लगी।

 श्रमिक स्त्री ने ऋषि को देखा और कहा “मुझे ये स्त्रियाँ धरती से फूटते अंकुरों जैसी दिखती हैं। इस स्त्रियों ने अवश्य ही दासत्व से मुक्ति का प्रयास किया होगा। अभी बारिश आएगी, मिटटी पोली हो जाएगी। ये पेड़ों को पकड़कर बाहर आ जाएँगी। हवा इनके बालों से अठखेलियाँ कर रही होगी और देवताओं के नियम शास्त्र पानी में बह रहे होंगे।” 

ऋषि उपहास में हँसे और बोले “इनकी परिणिति तय है निश्चित मृत्यु। प्रलयंकारी वर्षा बस आरम्भ होने को है, तुम अपने घर जाओ।”

“तुम जाओ ऋषि और अपने देवताओं तथा शास्त्रों को इस प्रलय से बचाओ। इन स्त्रियों के निमित्त मैं यहीं रहूंगी। तुम देखना, यही प्रलय हम स्त्रियों का मुक्ति गीत बनेगी।   

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