शाम के सात बजे। एक कॉफी शॉप में हल्की हलचल है। मगर हर कोई मोबाइल में जंगुम है। ईशा और राहुल एक टेबल पर बैठे हैं।
ईशा ने कहा, “राहुल, देखो न, कितनी अजीब बात है! सब यहाँ हैं, फिर भी किसी को किसी की परवाह नहीं।”
राहुल ने मोबाइल स्क्रीन से अपनी नज़रें नहीं हटाई, “हम्म… क्या कहा?”
“यही कि हर कोई अपने आप में गुम है। जैसे ये कॉफी शॉप नहीं, कोई डिजिटल कैदखाना हो।”
राहुल हँसा, “तुम भी न… ये सब नॉर्मल है। अब तो दुनिया ऐसी ही हो गई है।”
ईशा चौंकी, “नॉर्मल ? मतलब हम सब साथ होकर भी अकेले रहें, ये नॉर्मल है?”
“इसमें इतना चौंकने की बात क्या है? सोशल मीडिया, चैटिंग, वर्चुअल कनेक्शन-अब यही असली दुनिया है।”
ईशा ने गहरी साँस ली, “और असली लोग? जो हमारे सामने बैठे हैं? उनका क्या?”
राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों के बीच कुछ पल की चुप्पी छा गई। ईशा ने कॉफी शॉप में चारों तरफ देखा, फिर उठकर पास की टेबल पर बैठे एक बुजुर्ग के पास गई और उनसे कहा, “नमस्ते अंकल ! क्या मैं आपके साथ बैठ सकती हूँ?”
बुजुर्ग थोड़ा चौंके, फिर मुस्कुराते हुए बोले, “अरे बेटा, क्यों नहीं? बहुत दिनों बाद किसी ने ऐसे पूछा।”
राहुल ने हैरानी से देखा, फिर अपना मोबाइल टेबल पर रख दिया। माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।