जून 2026

मेरी पसन्दक्लासिक लघुकथा: चरित्र में सन्निहित उसके यथार्थ का संधान     Posted: November 1, 2025

लघुकथा को पढ़ना केवल दो पृष्ठों का समय काटना नहीं है। यह छोटे वाक्यों में बड़े अनुभवों को पकड़ने की कला है। एक श्रेष्ठ या क्लासिक लघुकथा से अध्येता सबसे पहले यही देखना चाहेंगे कि क्या यह अपने कम शब्दों में पूरे समय, समाज और मनुष्य को छू रही है या नहीं।

वे यह भी देखेंगे कि लेखक ने कहाँ ‘छोड़’ दिया है और कहाँ ‘कहा’ है। लघुकथा का सौंदर्य उसकी मितव्ययिता में है, और एक अच्छे अध्येता को यही परखनी होती है – क्या यह कथा अपने मौन से बोल रही है या केवल शब्दों के शोर में चल रही है।

पात्र कोई भी हो सकता है – चाय वाला, रिक्शा खींचने वाला या बैंक मैनेजर या फिर मज़दूर या किसान या कारीगर – लेकिन क्लासिक लघुकथा पात्र को उसके समय और समाज के साथ खड़ा करती है। वह चरित्र के पीछे उसके पूरे यथार्थ को टटोलती है।

फिर, कथ्य की तात्कालिकता। कथा किसी क्षणिक हंगामे पर टिक कर बैठी है या अपने भीतर समयातीतता रखती है। कोई भी उत्कृष्ट लघुकथा केवल ‘आज’ नहीं होती, वह ‘कल’ में भी काम आती है।

और सबसे  अहम – अंत। एक श्रेष्ठ लघुकथा का अंत किसी शंखनाद या उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक छोटी-सी चमक की तरह आता है – आँखों के सामने नया परिदृश्य खोल देता है। अध्येता के लिए यही परखने की बात है – क्या कथा के बाद पाठक का मन कुछ देर तक उसी में भटकता है या नहीं।

लघुकथा छोटी डिबिया है, पर उसमें बंद खुशबू का असर पूरे घर में फैलना चाहिए। अध्येता को देखना है कि डिबिया खोली और खुशबू निकली या सिर्फ़ ख़ाली हवा। यही कसौटी है क्लासिक लघुकथा की।

मैं अपनी मान्यताओं के बीच लघुकथाकारों की लम्बी फ़ेहरिस्त में वरिष्ठ लघुकथार श्री सुभाष नीरव जी की रचना ‘मकड़ी’ के बहाने यह सब कह रहा हूँ और आगे कुछ और बात करना चाहता हूँ – जिसे मैंने तीन स्तरों पर देखने-निरखने की कोशिश की है । यह मेरी अपनी कोशिश है – किसी और की कोशिश मुझसे हटकर भी क्यों नहीं हो सकती है । बहरहाल…. वे स्तर हैं :

विधागत अनुशासन (लघुकथा के शिल्प)

भाषागत सौंदर्य व सरोकार

नयी पीढ़ी के लिए पाठ

संक्षिप्तता व एक-सूत्रीयता : सुभाष जी की लघुकथा में केवल एक ही केंद्रीय घटना व अनुभव है—‘बाज़ार’ के माध्यम से मध्यमवर्गीय आदमी का धीरे-धीरे फँसना – और फँसकर धँसते चले जाना । गौर करिए – इस लघुकथा में कोई अनावश्यक प्रसंग या पात्र नहीं है।

रूपकात्मक शीर्षक : ‘मकड़ी’ शीर्षक सीधा और प्रतीकात्मक है। यहाँ बाज़ार (और क्रेडिट संस्कृति) को एक मकड़ी की तरह दिखाया गया है, जो जाल बुनती है और शिकार को लपेटती है। मकड़ी का रूपक भी बोध-संबोध की दृष्टि से सामान्य से सामान्य या असाक्षर पाठकों के लिए भी सहज है – अतः पाठकीय आकर्षण का कलेवर रचता हुआ शीर्षक

चरित्र-चित्रण का संक्षेप : नायक ‘ग़रीब बाबू’ नामहीन है, जिससे वह सार्वभौमिक बन जाता है। पत्नी, बच्चे, पड़ोसी – सब पृष्ठभूमि में हैं।

समाप्ति का झटका (पंच) : आख़िरी दृश्य—दरवाज़े पर बाज़ार का फिर से आगमन और नायक का उसे ‘मकड़ी’ कहना—कहानी को तीव्र और स्मरणीय बनाता है।

समय का बहाव : लघुकथाकार के दीर्घ अनुभव का कमाल ही कहें इसे कि उसके द्वारा कैसे बिना तारीख़-समय बताए, ‘धीरे-धीरे’ और ‘कुछ बरस बाद’ जैसे संकेतों से एक सामान्य भारतीय परिवार की आर्थिक यात्रा दिखा दी जाती है।

इस लघुकथा में प्रदीप्त भाषागत सौंदर्य व सरोकार दोनों ही मुझे भाते हैं – बाँच कर देखिए- शायद आप भी सहमत हो उठेंगे । सबसे पहले भाषा की सादगी – यहाँ बोलचाल का, सहज और स्पष्ट गद्य उपस्थित है । कोई कठिन अलंकार या अतिशयोक्ति नहीं। इस लघुकथा में गजब की चित्रात्मकता है –  ‘जेब में सुनहरी कार्ड’, ‘वातानुकूलित चमचमाती दुकानें’, ‘जाले-ही-जाले दिखाई देते’— ये दृश्य पाठक के मन में मूर्त रूप से उतरते हैं।  रचना वायवी नहीं होती, वह शून्य में नहीं जन्म लेती। उसकी जड़ें जीवन, समाज और अनुभव की मिट्टी में होती हैं। कल्पना उसका आकाश है, पर आधार धरती का यथार्थ है। इसी धरती–आकाश के संतुलन से रचना शास्त्रीय स्थायित्व पाती है। इसे लघुकथाकार की सामाजिकता कहें या फिर उसका सरोकार, यदि वह लघुकथा के वाचन-काल में साफ़ झलकने ने लगे, तो फिर वह मात्र मनोरंजन का गद्य बन कर रह जाता है – रह सकता है ।  यहाँ लघुकथाकार ने मध्यमवर्गीय जीवन, उपभोक्तावाद, आसान कर्ज़, ए.टी.एम. संस्कृति, ब्याज का बोझ – जो आज के यथार्थ हैं को बड़ी कलात्मकता से उभारा है । इस बारीक़ियों के नब्ज़ को पकड़ पाना साधारण पाठकों के लिए लगभग कठिन हो सकता है । कथावस्तु सिर्फ व्यक्तिगत संकट नहीं बताती, बल्कि पूरी एक व्यवस्था की आलोचना करती है। यह यथार्थ भी कैसा – एक मनोवैज्ञानिक यथार्थ- नायक का आत्मविश्वास, फिर भय, फिर अवसाद—पूरे मनोभाव सारे के सारे एक छोटे-से कथ्य में आ जाते हैं।

            यह लघुकथा बिना क्लास लगाए यानी बिना जताए पाठकों या श्रोताओं के मन-मनीषा में अनायास पाठ के बीज बो देती है – कि उपभोक्तावादी जाल से सावधान रहिए वरना – ‘आसान’ सुविधाएँ भी दीर्घकाल में बंधन बन सकती हैं। यह लघुकथा पाठकों को संबोधती है कि झूठे आत्मविश्वास से बचिए भी – यह कहते हुए कि क्रेडिट कार्ड/लोन तत्काल राहत तो देते हैं; लेकिन अनुशासन न हो, तो जीवन में मकड़ी का जाल बन जाता है। बाज़ार व्यक्ति को यह यक़ीन दिलाता है कि अमीर-गरीब का अंतर मिट गया है, जबकि वास्तव में वह उसे और गहरे फँसा देता है।मकड़ी वस्तुतः आत्मसम्मान बनाम आत्मभ्रम को विलग-विलग कर समझा जाती है कि आज के उपभोक्तावादी संसार में मनुष्य के लिए क्या चयन करना चाहिए।  किउपभोग की चकाचौंध के पीछे कौन-सी ताक़तें काम कर रही हैं ।

निष्कर्षतः लघुकथा ‘मकड़ी’ विधा के अनुशासन (संक्षिप्तता, रूपकात्मक शीर्षक, तीव्र अंत) का अनुकरणीय उदाहरण है। भाषा सरल, दृश्यात्मक और समकालीन जीवन-सरोकार से जुड़ी है। यह लघुकथा नयी पीढ़ी को मोहक बाज़ार के जाल में विवेक के बिना फँस जाने के ख़तरे का पाठ देती है और चेतना जगाती है—यही इसका स्थायी मूल्य है।

0-

अब मैं आपको ले चलता हूँ अपनी पसंद की एक और उज्ज्वल रचना की ओर – समकालीन लघुकथा के बड़े हस्ताक्षर यानी श्री हरभगवान चावला की लघुकथा ‘चाबी’ अपने कथ्य में समय, स्मृति और क्षरण को प्रतीकात्मक वस्तुओं के माध्यम से प्रस्तुत करती है। इस कथा को ‘लघुता में प्रभुता’ तथा ‘विधायी सौष्ठव’ के आधार पर परखें तो हम पाते हैं कि यह लघुता में प्रभुता को शिद्धत से चरितार्थ करती है। लघुकथा का सबसे बड़ा गुण उसका संक्षिप्त होना है। यह कथा केवल कुछ अनुच्छेदों में ही एक पूरे जीवन-क्रम को दिखा देती है। घर का मालिक, जीर्ण-शीर्ण घर, ज़ंग खाया ताला, खोई हुई चाबी – ये चार संकेत इतने पर्याप्त हैं कि पाठक बरसों का समय और घटनाएँ स्वतः कल्पना में जोड़ लेता है। कथा में कोई द्वितीयक प्रसंग, व्यर्थ संवाद या अतिरिक्त पात्र नहीं है। यह संक्षिप्तता ही कथा की शक्ति है और इसे “लघुता में प्रभुता” की कसौटी पर खरा उतरने योग्य बनाती है।

लघुकथा का दूसरा आधार है – उसकी एकसूत्रीय रचना, सघन बिंब और तीव्र अंत। इस कथा में कथा-रेखा एक ही है : बरसों बाद लौटे मालिक, ताले-चाबी का मिलन और ताले का टूट जाना। वस्तुओं का मानवीकरण – ताले को प्रतीक्षा करते पिता के रूप में, चाबी को बेटी के रूप में – एक सशक्त बिंब देता है। अंत में “ताला मालिक के हाथ में आ गिरा” कथ्य को तीव्र कर देता है। यह एक अप्रत्याशित परंतु स्वाभाविक अंत है, जो लघुकथा के शिल्प की पहचान है।

एक क्लासिक लघुकथा वह होती है, जो समय, समाज या मनुष्य के किसी सार्वभौमिक अनुभव को अपनी संक्षिप्तता में स्थायी बना दे। यह कथा उस कसौटी को कई स्तरों पर पूरा करती है –प्रतीक और रूपक साफ़ हैं और पाठक को अपनी व्याख्या करने की गुंजाइश देते हैं।

भाषा साधारण और सुलभ है। विषय (समय, स्मृति, क्षरण, लौटना) सार्वभौमिक है। हालाँकि, कुछ आलोचनात्मक दृष्टियाँ कह सकती हैं – “चाबी का बार-बार बोलना” कहानी को थोड़ा भावुक बना देता है और अंत को बहुत स्पष्ट कर देता है। क्लासिक लघुकथा सामान्यतः अर्थ को थोड़ा खुला छोड़ती है, ताकि पाठक पर वह और गहरा असर करे।

इस कथा में लघुकथा के दोनों आधार – लघुता में प्रभुता और विधायी सौष्ठव – मौजूद हैं। इसकी संक्षिप्तता, एकसूत्रीय रचना, सशक्त प्रतीक और करुण अंत इसे एक उच्चकोटि की लघुकथा बनाते हैं। यद्यपि इसमें भावुकता का अंश अधिक है, फिर भी इसकी बिंब-संरचना और विचार-गहनता इसे ‘अच्छी’ और संभावित रूप से ‘क्लासिक; लघुकथा की श्रेणी में रखती है।

1-मकड़ी – सुभाष नीरव

अधिक बरस नहीं बीते जब बाज़ार ने ख़ुद चलकर उसके द्वार पर दस्तक दी थी। चकाचौंध से भरपूर लुभावने बाज़ार को देखकर वह दंग रह गया था। अवश्य बाज़ार को कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी, जो वह ग़लत जगह पर आ गया – उसने सोचा था। उसने बाज़ार को समझाने की कोशिश की थी कि यह कोई रुपये-पैसे वाले अमीर व्यक्ति का घर नहीं, बल्कि एक गरीब बाबू का घर है, जहाँ हर महीने बँधी-बँधाई तनख़्वाह आती है और बमुश्किल पूरा महीना खींच पाती है। इस पर बाज़ार ने हँसकर कहा था, “आप अपने आप को इतना हीन क्यों समझते हैं? इस बाज़ार पर जितना रुपये-पैसों वाले अमीर लोगों का हक है, उतना ही आपका भी? हम जो आपके लिए लाए हैं, उससे अमीर-ग़रीब का फ़र्क ही ख़त्म हो जाएगा।” बाज़ार ने जिस मोहित कर देने वाली मुस्कान में बात की थी, उसका असर इतनी तेज़ी से हुआ था कि वह बाज़ार की गिरफ़्त में आने से स्वयं को बचा न सका था।

अब उसकी जेब में सुनहरी कार्ड रहने लगा था। अकेले में उसे देख-देखकर वह मुग्ध होता रहता। धीरे-धीरे उसमें आत्म-विश्वास पैदा हुआ। जिन वातानुकूलित चमचमाती दुकानों में घुसने का उसके अन्दर साहस नहीं होता था, वह उनमें गर्दन ऊँची करके जाने लगा।

धीरे-धीरे घर का नक्शा बदलने लगा। सोफ़ा, फ्रिज़, रंगीन टी.वी., वाशिंग-मशीन आदि घर की शोभा बढ़ाने लगे। आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में रुतबा बढ़ गया। घर में फ़ोन की घंटियाँ बजने लगीं। हाथ में मोबाइल आ गया। कुछ ही समय बाद बाज़ार फिर उसके द्वार पर था। इस बार बाज़ार पहले से अधिक लुभावने रूप में था। मुफ्त कार्ड, अधिक लिमिट, साथ में बीमा दो लाख का। जब चाहे वक़्त-बेवक़्त ज़रूरत पड़ने पर ए.टी.एम. से कैश। किसी महाजन, दोस्त-यार, रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं।

इसी बीच पत्नी भंयकर रूप से बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर ने आपरेशन की सलाह दी थी और दस हज़ार का ख़र्चा बता दिया था। इतने रुपये कहां थे उसके पास? बँधे-बँधाए वेतन में से बमुश्किल गुज़ारा होता था। और अब तो बिलों का भुगतान भी हर माह करना पड़ता था। पर इलाज तो करवाना था। उसे चिंता सताने लगी थी। कैसे होगा? तभी, जेब मे रखे कार्ड उछलने लगे थे, जैसे कह रहे हों– “हम है न !” धन्य हो इस बाज़ार का! न किसी के पीछे मारे-मारे घूमने की ज़रूरत, न गिड़गिड़ाने की। ए.टी.एम.से रुपया निकलवाकर उसने पत्नी का ऑपरेशन कराया था।

लेकिन, कुछ बरस पहले बहुत लुभावना लगने वाला बाज़ार अब उसे भयभीत करने लगा था। हर माह आने वाले बिलों का न्यूनतम चुकाने में ही उसकी आधी तनख़्वाह ख़त्म हो जाती थी। इधर बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी पढ़ाई का खर्च बढ़ रहा था। हारी-बीमारी अलग थी। कोई चारा न देख, आफ़िस के बाद वह दो घंटे पार्ट टाइम करने लगा। पर इससे अधिक राहत न मिली। बिलों का न्यूनतम ही वह अदा कर पाता था। बकाया रकम और उस पर लगने वाले ब्याज ने उसका मानसिक चैन छीन लिया था। उसकी नींद गायब कर दी थी। रात में, बमुश्किल आँख लगती तो सपने में जाले-ही-जाले दिखाई देते जिनमें वह ख़ुद को बुरी तरह फँसा हुआ पाता।

छुट्टी का दिन था और वह घर पर था। डोर-बेल बजी तो उसने उठकर दरवाज़ा खोला। एक सुन्दर-सी बाला फिर उसके सामने खड़ी थी, मोहक मुस्कान बिखेरती। उसने फटाक-से दरवाज़ा बन्द कर दिया। उसकी सांसे तेज़ हो गई थीं जैसे बाहर कोई भयानक चीज़ देख ली हो। पत्नी ने पूछा, “क्या बात है? इतना घबरा क्यों गये? बाहर कौन है?”

“मकड़ी !” कहकर वह माथे का पसीना पोंछने लगा।

-0-

2-चाबी – हरभगवान चावला

बरसों बाद घर का मालिक घर लौटा था। घर की इमारत खंडहर में तब्दील हो गई थी। द्वार जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था, द्वार पर लटका ज़ंग खाया ताला बूढ़ा हो चला था ।

इस ताले ने बरसों अपनी बेटी चाबी के लौट आने का इन्तज़ार किया था। उसे वह क्षण कभी नहीं भूला, जब घर का मालिक उसे द्वार पर लटका, चाबी को जेब में डालकर चला गया था। लंबे इन्तज़ार के बाद ताले को लगने लगा था कि उसकी चाबी सामान की भीड़ में कहीं खो गई होगी, जैसे कोई बच्ची मेले में खो जाती है। अवसाद में डूबा ताला चाबी से मिलने की आशा छोड़ चुका था। घर के मालिक ने चाबी को दाएँ हाथ की उँगलियों में थामा।

उत्कंठित चाबी चिल्लाई – मैं आ गई हूँ मेरे प्यारे पिता!

मालिक ने बाएँ हाथ में ताले को थामा कि दाएँ हाथ में थामी चाबी से उसे खोल सके। हाथ लगते ही ताला मालिक के हाथ में आ गिरा।

चाबी बार-बार चिल्ला रही थी – मैं आ गई हूँ मेरे प्यारे पिता!

भला मर चुका ताला अपनी चाबी की बेसब्र आवाज़ को कैसे सुनता?

-0-एफ-3, आवासीय परिसर, छ.ग.मा.शि.मं. पेंशनबाड़ा, रायपुर – 492001

ईमेल-srijan2samman@gmail.com

मो. न. – 94241-82664

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine