अम्बिका अपने कमरे में लेटी हुई रो रही थी। उसी वक्त डोरबैल बजी। वह उठी और आँसू पोंछते हुए उसने दरवाजा खोला- “मामा आप? आइए।”
“कैसी हो बेटा? दीदी कहाँ हैं?”
“ऊपर अपने कमरे में होंगी।’’
मामा ने पूछा—“तुम्हारी आँखें रोई– रोई— सी क्यों लग रही हैं बेटा?”
“पापा की याद आ रही थी। यही सोचकर रोना आता है कि जब वो थे, तो मैं उनके पास बैठती नहीं थी, आज वो होते तो…”
“अभी भी वक्त है, अपनी माँ के पास बैठा कर। वरना कल रोएगी और भी ज्यादा”- कहते हुए मामा सीढ़ियाँ चढ़ गए।
-0-