महानगर का एक व्यस्त चौराहा। पैदल चलने वाले सड़क पार करने के लिए हरी बत्ती के इंतजार में खड़े हैं। एक युवक लगातार दूसरे युवक को घूर रहा है। यह भाँपते हुए दूसरा भी पहले की ओर टकटकी लगाकर देखता है। फिर मुस्कुराते हुए आत्मीयता से उसका हाथ पकड़ लिया, “अरे सुरेश तुम! यार कितने साल बाद मिल रहे हो।”
“हाँ यार, कॉलेज की अंतिम परीक्षा के बाद तो हम मिले ही नहीं। पूरे दस साल हो गए हैं। माफ करना तुम्हारा नाम दिल में है, पर जुबान पर नहीं आ रहा; इसीलिए तुम्हें देखता रहा, बुला नहीं पाया।” कहते हुए सुरेश ने प्रसन्नता से उसे बाहों में भर।लिया।
बत्ती हरी होते ही भीड़ के साथ दोनों ने सड़क पार की– “अरे मैं सुरेंद्र…, यार तुम मेरा नाम कैसे भूल गए! चलो इस दिन को यादगार बनाते हैं। हमारी कंपनी का एक मल्टी पर्पज प्रोडक्ट है। बहुत उपयोगी, सिर्फ 995 रुपयों का है। खरीद लो। फिर देखना जिंदगी भर मेरा नाम तुम्हारी जुबान पर रहेगा।” कहते हुए वह अपनी एयरबैग खोलने लगा।
“नहीं यार, अभी नहीं। मैं रेलवे स्टेशन जा रहा हूँ। ऐसा करो, अपना कार्ड दे दो। किसी दिन मैं खुद तुम्हारे यहाँ आऊँगा। अपनी बीमा कंपनी की पॉलिसी तुम्हें दिलाऊँगा, फिर यह प्रोडक्ट भी देख लूँगा।
सुरेंद्र को कार्ड टटोलते देख सुरेश कसमसाते हुए बोला, “ऐसा करो यार, अगली बार देख लेते हैं। इस वक्त मैं जरा जल्दी में हूँ।”
“ठीक है।” सुरेंद्र मुस्कुराया। हाथ मिलाकर दोनों विपरीत दिशाओं की ओर मुड़ गए।
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