संतो अपनी माँ को मुखाग्नि देने के लिए श्मशान घाट पहुँची।

“लकड़ी के कितने पैसे हुए?”
“जी चार हज़ार।” कर्मकांड करने वाले सुन्दर ने जवाब दिया।
कुछ सिक्के तथा मुड़े-तुड़े नोटों से भरी एक पन्नी सुन्दर को देते हुए संतो फफक कर रोते हुए बोली-“भैया! इसमें पता नहीं कितने पैसे होंगे!”
“रहने दो!” सुन्दर ने पन्नी के भीतर गुल्लक के टूटे टुकड़ों को देखते हुए धीमे से कहा- “आपके पास नहीं हैं, तो रहने दो। जो दे सकते हैं, मैं बस उन्ही से लेता हूँ। आप लोगों के लिए व्यवस्था हो जाएगी”- सुन्दर भरी-भरी ऑंखों को पोंछते हुए मुड़ा!
“ले लो भैया! शायद कुछ कम हों, तो मिला देना। मेरी माँ बहुत स्वाभिमानी स्त्री थीं, ताजी, सूखी लकड़ियाँ होनी चाहिए।”
“बेफिकर रहो! ये पैसे आप बाकी के काम के लिए रख लो। आप आई तो हो इनके साथ!” उसने धरती पर रखे उसकी माँ के शव की तरफ इशारा करते हुए कहा-“यहाँ तो लोग आते हैं , ‘फ्लाइट न छूट जाए’ कहते हुए बॉडी पटककर भाग लेते हैं,” चिता के लिए लकड़ी रखते हुए वह बोला।
अपने ऑंसू पोछकर संतो ने उसको प्रश्नवाचक निगाहों से उसे देखा।
“अभी कल ही आया था एक साहब, सूट-बूट पहने हुए! रसीद माँगी और …” कहते-कहते वह थोड़ा रुका, फिर आगे बोला-“उसके साथ पाँच-छह लोग थे बस! डेड- बॉडी पर न ठीक से कफ़न था, न फूल थे, न ठीक से बाँधी गई थी। उसने शव के अँगूठे पर नीली स्याही लगाकर, फटाफट कई कागजों पर शव का अँगूठा लगाया और मुझसे कहा -देख लेना भैया! सब ठीक से हो जाए, इनकी आत्मा को शांति मिल जाए और चला गया! एक पैसा नहीं दे गया! अब ऐसे लोगों का क्रियाकर्म मैं अनाथ! अपने पैसों से, अपनी आत्मा की शांति के कारण कर देता हूँ,” कहते हुए उसने व्हील चेयर पर बैठी संतों के हाथ में जल- भरा लोटा पकड़ाया और संतो के साथ आये गरीब बस्ती के बच्चों/बूढ़ों के साथ मुखाग्नि की व्यवस्था करने लगा!
-0-