टैक्सी से उतरते ही अंकुर की निगाह कोठी के गेट पर लगे नेम प्लेट पर गई, “संध्या निवास”। नेम प्लेट पढ़ते ही अंकुर साठ वर्ष पूर्व की यादों में खो गया। उसकी अपनी कोठी या कहें कि उसकी माँ की कोठी, जहाँ उसका बचपन बीता। इसी कोठी के कंपाउंड और छत पर खेलते-कूदते वह बड़ा हुआ था। इस कोठी के चप्पे-चप्पे पर उसका ही अधिकार हुआ करता था। लेकिन आज यह एक वृद्धाश्रम था। वैसे तो इस कोठी पर उसका ही हक होता: लेकिन अपनी नासमझी में उसने माँ के प्रति अत्यंत कठोरतापूर्ण रवैया अपना लिया था। उनकी देखभाल करना और स्नेह जतलाना तो दूर, बात-बात में उन्हें ज़लील करता। इकलौता पुत्र था वह। माँ को भी उनके बुढ़ापे में देखभाल की आवश्यकता थी। पुत्र के निर्दय व्यवहार से विवश होकर माँ को अपनी कोठी वृद्धाश्रम में तब्दील करनी पड़ी थी। उस समय उनके लिए वही सुविधाजनक कदम था। जैसा व्यवहार उसका अपनी माँ के प्रति था, उसको देखते हुए माँ का यह कदम कहीं से भी कठोर नहीं कहा जा सकता था। वही अपनी स्नेहमयी, ममतामयी माँ के प्रति पता नहीं कैसे अत्यधिक कठोर हो गया था।
समय के चक्र ने उसे अपनी गलती का एहसास बखूबी करा दिया, जब उसके अपने बेटे ने भी उसके साथ वही किया। बल्कि उसके बेटे ने तो एक कदम आगे बढ़कर उसका मकान भी अपने नाम करवा लिया और घर से बदखल कर दिया। मजबूरन उसे वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ा।
रिसेप्शन पर जाकर जैसे ही उसने अपना नाम बोला, वहाँ बैठे बुजुर्ग ने तत्काल उससे पूछा, “क्या आप संध्या जी के बेटे हैं?”
“जी…हाँ…।” बहुत सकुचाते हुए उसने जवाब दिया।
“आपके लिए यहाँ एक कमरा तैयार है। और हाँ, आपको उसके लिए आजीवन कोई शुल्क नहीं देना है।”
अंकुर की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह भौंचक्का सा उस व्यक्ति को देख रहा था। “मेरे लिए कमरा तैयार …?”
“जी हाँ, यह आपकी माता जी की ही इच्छा थी कि अगर आप यहाँ आते हैं तो आपसे कोई शुल्क न लिया जाए और हर तरह की सुविधाओं से लैस कमरा आपको दिया जाए।”
अंकुर को काटो तो मानो खून नहीं। जिस माँ की उसने कभी परवाह नहीं की, हमेशा ही उनकी उपेक्षा की, उस माँ ने अपनी मृत्यु से पूर्व उसके सुखद बुढ़ापे का बंदोबस्त कर दिया था। उसका हृदय पश्चाताप और ग्लानि से भर उठा। स्वयं के प्रति वितृष्णा होने लगी। कमरे में अपना सामान रखवाकर वह घूमकर कोठी का निरीक्षण करने लगा। वह कोठी के जिस किसी भी हिस्से में जाता उसे वहाँ माँ के होने का अहसास होता। उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जिस माँ को उसने उनके जीवन के अंतिम पहर में बेसहारा छोड़ दिया था, उसी माँ ने आज उसे अपनी गोद में आश्रय दे दिया है। आज उसे न सिर्फ अपनी माँ के दुःख का अहसास हो रहा था बल्कि माँ के प्रति अपने क्रूर और अशोभनीय रवैये को भी वह भली भाँति महसूस कर पा रहा था। पछतावे की एक तीव्र लहर उसके दिल में बार-बार उठ रही थी। हाॅल में दीवार पर माँ की तस्वीर लगी थी, जिस पर ताजे फूलों की माला चढ़ी थी। माँ की तस्वीर को वह स्नेह से देखने लगा और तस्वीर पर हाथ फेरते हुए धीरे से बोल उठा, “माँ, मैंने आपके साथ बुरा किया, अपना फर्ज नहीं निभाया, फिर भी आपने…। और आपको कैसे पता था कि एक दिन मैं यहाँ…।”
तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा,”क्योंकि वह माँ थी।”
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