
“बाहर सब्जी वाला आया है।” यशोदा देवी ने अपने पति रामरख जी को सूचित किया।
“क्या-क्या लाया है?”
“भिंडी, अरबी, बैंगन, तोरी…।”
रामरख जी ने बाहर जाकर मोल भाव किया और सब्जी ले ली।
“सर्दी पड़ने लगी है, रज़ाई की खोलियाँ सिलनी हैं।” यशोदा देवी ने रामरख जी को याद
दिलाया।
“कल बाज़ार जाकर पूरा थान ही ले आऊँगा। बैठी-बैठी बीनणी के साथ सिलती रहना।
“सुनो, परसों बेटी सुमित्रा ससुराल वापस जाने को कह रही है, उसके लिए दो सूट का कपड़ा
और मिठाई लानी हैं” यशोदा देवी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा।
“ठीक है, ले आऊँगा”
घर में राशन चाहिए या कोई बर्तन-भांडा, छोटा-बड़ा कोई समान चाहिए या शादी-ब्याह का
लेन-देन यानी घर-परिवार का कोई भी खर्चा हो सभी का जिम्मा रामरख जी ने ले रखा था।
शादी को पचास बरस हो चुके थे, रामरख जी ने यशोदा देवी के हाथ में कभी पैसे नहीं दिए।
जो भी चाहिए, मँगवा लो।
यशोदा देवी बहुत बार अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को मारती रही। कभी बिना जरूरत, बिना
बताये-पूछे, आते-जाते कुछ पसंद आ जाये या फिर कभी पड़ोसन या कोई रिश्तेदार महिला
किसी चीज़ के बारे में बता दे तो अपने लिए कोई सामान लेने का मन कर ही जाता था ,
पर हाथ में पैसा हो तब न।
रामरख जी दो महीने बीमारी में बिस्तर से न उठ पाने की स्थिति में भी पैसे का हिसाब-
किताब ख़ुद ही करते रहे।
आखिर एक दिन उनके दिन पूरे हो गए।
“भाभीजी, यहां साइन कर दो…और यहां भी।” रामरख जी के मित्र हरिहर जी फ़ैमिली पेंशन
के लिए यशोदा देवी के सम्मुख कागज फैलाते हुए बोले।
यशोदा देवी ने जीवन में पहली बार बैंक के दर्शन किए। उनके नाम से पहला बैंक खाता
खुला। पुराना खाता बंद कराकर हरिहर जी ने उन्हें बीस हज़ार रुपये निकलवा कर सौंप दिए।
अपने छोटे से बटुए में रुपये ठूँसते हुए यशोदा देवी की आँखें गीली हो आयी। बीच-बीच में
हरिहर जी को उनकी एकाध सिसकी भी सुनाई दे जाती थी।
“भाभी जी, जो होना था, हो गया। पोते-पोतियों वाले थे। थोड़ी हिम्मत रखो।” हरिहर जी ने
उन्हें दिलासा दिया।
बात उनकी ठीक ही थी। बीते तीन महीनों में वह अपने आप को काफ़ी सँभाल चुकी थी।
आज फिर से कौन सा पुराना दर्द ऐंठने लगा था, यह वह ख़ुद भी ठीक से नहीं समझ पा
रही थी।
-0- कविता मुकेश,ए-38-डी, करणी नगर,पवनपुरी, बीकानेर-334003
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