
बच्चे का जन्मदिन/ प्रदीप मिश्र -इन्दौर
शायद वह नौकरी से घर लौट रही थी। दिनभर की थकान उसके चेहरे पर घर बनाकर बैठ गई थी। बस में सामनेवाली सीट पर जबसे वह बैठी है, ऊँघ रही है। उसकी उम्र कोई तीस-पैंतीस की होगी। कद-काठी आकर्षक रहा होगा। फिलहाल तो वह बुझी-बुझी सी निढाल पड़ी है। मेरे मन में बहुत बार यह ख्याल आया कि पूछ लूँ कि तुम्हारी तबीयत तो ठीक है। लेकिन पूछा नहीं। आजकल किसी अजनबी से बात करना खतरा मोल लेना है। इस तरह से मैं अपने अन्दर के मनुष्य को दबाते हुए यात्रा कर रहा था कि इतने में उसका मोबाइल फोन बज उठा। उसने बड़े अदब से फोन उठाया और यस सर…. जी सर….. एक बार और मौका दीजिए, डील क्रेक कर दूँगी अदि–आदि बोल रही थी। मैं समझ गया था कि उसके बॉस का फोन था। फोन जब रखा, तो वह लगभग गिड़गिड़ा रही था। अब बह ऊँघ नहीं रही थी। उसकी नींद खुल गई थी । चौकन्ना होकर उसने इधर-उधर देखती रही, और फिर अपने मोबाइल में सिमट गई। इतने में फिर उसका फोन बज उठा। शायद कोई लेनदार था। वह फिर गिड़गिड़ाई – अगली सेलरी पर वह जरूर वापस कर देगी। उधर से मिली धमकी की धमक उसके चेहरे पर साफ थी। वह थोड़ी असहज हो रही थी। अपने चारों तरफ का मुआयना किया। जैसे यह पता लगा रही हो कि फोन पर उसके बातचीत को किसी ने सुन तो नहीं लिया। फिर अनमनी सी बैठी रही।
थोड़ी देर बाद, उसका फोन फिर बजा। इस बार फोन उठाते ही उसका चेहरा खिल गया। यह फोन उसके बच्चे का था, शायद। फोन पर ही उसने अपने बच्चे को पुचकारा-दुलराया और बोली बस आधे घंटे में घर पहुँचकर, उसके जन्मदिन का सारा इन्तजाम कर देगी। तब तक वह अपने दोस्तों को निमन्त्रित कर ले। इस बार जब उसने बात खत्म की तो उसकी नजर मेरी नजर से टकरा गई। एक स्वाभाविक मुस्कान हम दोनों के चेहरे पर तैर गई। पुनः वह अपने मोबाइल में और मैं अपने मोबाइल में। थोड़ी देर बाद फिर उसका मोबाइल बजा। शायद फिर उसके बॉस को फोन था। बात का वही पुराना लहजा था। शायद वह कहीं किसी क्लाइंट मिटिंग की बात कर रहा था। वह यह समझाने की कोशिश कर रही थी कि आज उसके बच्चे का जन्मदिन है। बात खत्म होते-होते उसने कहा – ठीक है। मैं अपना इस्तीफा भेज दूँगी। फिर एक गहरी साँस लेते हुए, आँखें बंन्द करके सीट से पीछे टिक गई। हताशा उसके पूरे हाव-भाव में झलक रही थी। बच्चे से बात करके जो कुछ क्षण की ताजगी उसके चेहरे पर आई थी। अब वह उड़ गई थी। कुछ देर तक वह यूँ ही पड़ी रही। उसका फोन फिर बजा। इसबार फोन बच्चे के स्कूल से था। फीस जमा करने की आखिरी तारीख की बात चल रही थी। बात करते हुए, झुंझलाहट उसके चेहरे पर साफ थी। इसबार फोन बन्द होने के बाद, वह बस की खिड़की के बाहर छूटते हुए पेड़-पौधे और घरों देखने लगी। फिर उसने अपना मोबाइल उठाया और कोई मैसेज टाइप करके भेज दिया। इतने में बस का स्टाप आ गया। वह बस से फटाफट उतरकर दूसरी बस की लाइन में लग गई। अपनी बस में बैठा मैं देख रहा था, वह लाइन में खड़े-खड़े वह अपने पर्स के मिरर में देखते हुए अपना चेहरा और बाल संवार रही थी। देखते-देखते उसने अपने को एक प्रोफेशनल की तरह ्सँवार लिया। मेरी बस चल पड़ी। बस की खिड़की से मैंने देखा फुटपाथ पर खड़े एक बच्चे के हाथ से छूटकर एक गुब्बारा आसमान की तरफ उड़ गया।
-0-प्रदीप मिश्र, दिव्यांश 72ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा नगर पो.- सुदामानगर, इंदौर-452009 (म.प्र.)
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