
1-प्रचलन से हटकर
वह हमेशा से अलग था ।
गाँव के दो हिस्से थे : एक तरफ़ वे, जो ख़ाली पेट मालिक के आँगन में झुक जाते थे; दूसरी तरफ़ वे, जिनका भरा पेट उन्हें मालिक बना देता था ।
लेकिन वह…
उसने न तो झुकना सीखा, न ही मालिक बनने की लालसा पाली। उसने तीसरा रास्ता चुना—अपनी ज़मीन पर खड़े होकर अपनी रोटी उगाने का ।
एक दिन, जब गाँव वालों ने देखा कि वह अपने खेतों से उगाई गेहूँ की रोटी खा रहा है, तो वे हैरान रह गए।
“यह तो प्रचलन से हटकर है!” – किसी ने कहा।
“यह असंभव है!” – दूसरे ने हँसते हुए कहा।
लेकिन वह मुस्कुराया। उसकी कहानी न तो भूख की थी, न ताक़त की।
वह सिर्फ़ इन्सान होने की कहानी थी।
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2-सूर्य की बात
सूरज अपनी माँ, आकाशगंगा, से अनंत काल बाद मिल रहा था। उसकी किरणें आज कुछ मद्धम थीं, मानो युगों की थकान उनमें समा गई हो। माँ ने अपने विशाल, तारों भरे आलिंगन में उसे समेटते हुए पूछा, “बेटा, दुनिया कैसे लगी? अँधेर ठीक से छँट रहा है न?”
सूरज ने एक गहरी साँस ली, जैसे सारी सृष्टि का बोझ उसकी किरणों पर लदा हो। “माँ, क्या बताऊँ… मैं हार गया। असंख्य युगों से मैंने सबके घर एक समान रोशनी बाँटी। हर प्राणी, हर पौधे, हर नदी को बराबर उजाला दिया। न कोई भेद, न कोई पक्षपात। लेकिन आज भी…” उसकी आवाज़ में एक अनकही पीड़ा थी, जो माँ ने तुरंत भाँप ली।
“लेकिन क्या, बेटा?” माँ की आवाज़ में पहली बार निराशा की छाया झलकी। आकाशगंगा के तारे थम-से गए, मानो सूरज की बात सुनने को आतुर हों।
“माँ, धरती पर इंसान ने सब कुछ बदल दिया है। वह कहता है कि मेरी रोशनी उसकी है, हवा उसकी है, पानी उसका है। उसने धरती को टुकड़ों में बाँट लिया, और हर टुकड़े पर अपना नाम लिख दिया। लेकिन माँ, क्या कोई मेरी किरणों पर दावा कर सकता है? क्या कोई हवा को बाँध सकता है? मैंने तो सबको बराबर बाँटा, फिर भी कुछ लोग सारी धरती को अपने कब्जे में लेना चाहते हैं।”
माँ चुप थी। उसकी चुप्पी में सृष्टि की सारी कहानियाँ गूँज रही थीं। सूरज ने आगे कहा, “माँ, दुनिया के अमीरों ने सबका जीना मुश्किल कर दिया। कुछ लोग मेरी रोशनी को विशाल काँच के महलों में कैद कर लेते हैं, जबकि लाखों लोग झुग्गियों में अंधेरे में जीते हैं। नदियों को बाँधकर वो पानी को बेचते हैं, जंगलों को काटकर वे हवा को जहरीला करते हैं। मेरी रोशनी, जो मैंने सबके लिए बनाई थी, अब उनके लिए सिर्फ़ सोना उगलने का ज़रिया बन गई है।”
आकाशगंगा की आँखों में एक तारा टिमटिमाया, मानो आँसू बनकर गिरने को तैयार हो। “बेटा, क्या वे नहीं समझते कि ये सब उनका नहीं, सबका है?”
“समझते हैं, माँ,” सूरज ने कहा, “लेकिन लालच उनकी आँखों पर पर्दा डाल देता है। मैं हर सुबह उगता हूँ, हर शाम ढलता हूँ, और हर बार सोचता हूँ कि शायद आज वो बदल जाएँ। शायद आज वो मेरी रोशनी को बाँट लें, नदियों को आज़ाद कर दें, हवा को साफ रखें। लेकिन हर बार मेरा दिल टूटता है।”
माँ ने गहरी साँस ली। “बेटा, तू हार मत मान। तू सूरज है। तेरी रोशनी में वो ताकत है जो अंधेरे को चीर सकती है। शायद एक दिन वो समझ जाएँ कि धरती उनकी नहीं, वो धरती के हैं।”
सूरज ने हल्के से मुस्कुराया। “माँ, मैं कोशिश करूँगा। लेकिन अगर वे नहीं बदले, तो तो शायद एक दिन मैं भी थक जाऊँगा।”
आकाशगंगा ने उसे अपने आलिंगन में और कस लिया। “तू थकेगा नहीं, बेटा। तू सूरज है। और सूरज कभी नहीं थकता।”
सूरज चुप रहा। लेकिन अगली सुबह, जब वो फिर उगा, उसकी किरणों में एक नई चमक थी। शायद ये चमक किसी के दिल को छू ले। शायद ये चमक एक नई शुरुआत हो।
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3–एक और फल
स्कूटर पर लौटते हुए थैले से झाँकता आमों का पैकेट चौराहे पर गिर गया। वहीं, वहीं—जहाँ से मुड़ना था। जहाँ हर स्कूटर अपनी जगह जकड़े हुए था, हर कार का हॉर्न हवा को काट रहा था, और पैदल चलते लोगों की नज़रें सिर्फ़ सिग्नल के लाल-हरे पर टँगी थीं। रुकना असंभव था। भीड़ और हॉर्नों के बीच मन ने कहा : “अब ये आम नहीं, सड़क का हिस्सा हों चुके होंगे।”
किनारे लगाकर जब पलटा, तो एक महिला मेरे पास खड़ी थी—हाथ में वही पैकेट, उसके आम बिलकुल सही । “लीजिए,” उसने कहा, “फल गिरते ही नहीं, उठाए भी जाते हैं।”
मैंने पूछा : “आपने इतनी जल्दी स्कूटर रोककर इन्हें कैसे बचा लिया?”
वह मुस्कुराई : जहाँ गाड़ी नहीं रुकती, वहाँ इंसान रुक जाता है। काँटों को देखकर रुक जाएँ, तो फूलों के हाथ किसके पास जाएँगे?”
आमों का पैकेट अब भारी लग रहा था। शायद इसलिए कि उसमें एक और फल समा गया था—वह सवाल जो मैं बाज़ार से लाना भूल गया था।
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4-आशीर्वाद-सा सवाल
गाँव की गलियों में साँझ उतर रही थी, जब आसमान पर काले बादल छा गए, जैसे कोई पुरानी स्मृति उदास हो उठी। आँधी की साँसें तेज़ हुईं, जैसे समय की लहरें दीवारों को छू रही हों।
लोग भागे—मौलवी, पंडित, बनिया, चमार, जुलाहा—सब अपने-अपने घर छोड़कर बरगद के नीचे बनी मड़ई में जा छिपे। मड़ई की छत हवा में काँप रही थी, जैसे कोई कागज़ का घर जो टूटने से पहले थम गया हो।
मौलवी ने दुआ पढ़ी, पंडित ने मंत्र जपा। बनिया ने अपनी थैली थामी, चमार ने अपने औज़ार। जुलाहा चुप था, उसकी आँखें हवा की तरह डोल रही थीं।
“यह आँधी सब कुछ ले जाएगी,” – बनिया बुदबुदाया, जैसे कोई बच्चा अपनी पतंग खोने से डरता हो।
“आँधी न मज़हब देखती है, न जात,” – जुलाहे ने कहा, जैसे कोई सत्य जो हवा में तैरता हो। मौलवी ने सिर हिलाया, “हक़ीकत है, ये मड़ई सबकी है।” पंडित ने जोड़ा – “जैसे ये बरगद, जो सबको छाया देता है।”
रात गहराई। आँधी ने छप्पर उड़ाए, पेड़ हिलाए, पर मड़ई में लोग एक-दूसरे के क़रीब आए। चमार ने सूखी रोटियाँ बाँटीं, बनिया ने पानी का लोटा थमाया।
“हम सब एक ही मिट्टी के हैं,” – मौलवी ने कहा, जैसे कोई दीया जो अँधेरे में जल उठा हो।
सुबह आँधी थम गई। गलियाँ कीचड़ से भरी थीं, पर आसमान साफ़ था, जैसे कोई चेहरा जिसे आँसुओं ने धो दिया हो। लोग अपने घरों की ओर लौटे, पर बरगद के नीचे ठहरे। वे बुदबुदाए, जैसे आशीर्वाद दे रहे हों : “क्या हर बस्ती में ऐसी आँधी नहीं उठनी चाहिए?” बरगद की पत्तियाँ हिलीं, जैसे वह सारी बस्तियों को गले लगाना चाह रही हो ।
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5-यात्रा और मंज़िल
वह हर सुबह नए जूते पहनकर निकलता। मोबाइल में गूगल मैप खोलता। कार की इग्निशन ऑन करता। रोज़ एक नया रास्ता चुनता पर हमेशा उसी मॉल में पहुँच जाता – जहाँ वही दुकानें, वही लोग, वही चेहरे।
एक दिन कार ख़राब हो गई। उसने पैदल चलने का फैसला किया। रास्ते में एक बूढ़ा मिला जो पेड़ के नीचे बैठा था।
“कहाँ जा रहे हो?” बूढ़े ने पूछा।
“मंज़िल की तलाश में।”
बूढ़ा हँसा : “मेरे पास बैठो । यहीं तुम्हारी मंज़िल है।”
“यहाँ? इस सड़क किनारे?”
“हाँ ; क्योंकि जब तक तुम चलते रहोगे, मंज़िल भागती रहेगी। जब बैठोगे, तभी वह तुम्हारे पास आएगी।”
उस दिन से वह वहीं रह गया। उसी पेड़ के नीचे। लोग आते, पूछते: “तुम्हारी यात्रा कैसी चल रही है?”
वह मुस्कुराता: “बहुत अच्छी। मैंने आज तक की सबसे लंबी यात्रा पूरी की है – खुद तक पहुँचने की।”
और फिर एक दिन वह बूढ़ा गायब हो गया। पर वह आदमी अब भी वहीं है। उसी पेड़ के नीचे। बैठा हुआ। देखता हुआ कि कैसे लोग मंज़िलों के पीछे भागते हुए उसके सामने से गुज़र जाते हैं।
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6–मूल्य और मूल्यवान्
वह पुस्तक मेले में घूम रहा था। आँखें नीलकमल प्रकाशन के स्टाल पर रखे नए उपन्यास पर टिकी थीं। हाथ उसे उठाने को बढ़ा ही था कि क़ीमत देखकर ठिठक गया।
“पाँच सौ रुपये!” उसने मन ही मन गुनगुनाया, “इतने में तो घर का महीने भर का नमक-तेल आ जाएगा।”
पास ही खड़े एक युवक ने उसी किताब की दो प्रतियाँ काउंटर पर रखीं। उसकी निगाहें युवक के डिजाइनर कपड़ों और घड़ी पर ठहर गईं।
“सर, क्या आप भी साहित्य में रुचि रखते हैं?” युवक ने उसकी ओर देखकर पूछा।
“हाँ… पर…”
“यह लीजिए।”
युवक ने एक प्रति उसकी ओर बढ़ा दी, “मेरी तरफ़ से तोहफा।”
वह हक्का-बक्का रह गया। किताब के पन्ने पलटते हुए उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“पर… आपने…”
“मैं इस प्रकाशन का मालिक हूँ,” युवक मुस्कुराया, “और आज मैंने तय किया है – हर दसवीं प्रति मुफ्त दी जाएगी। उन्हें जिनकी आँखों में पढ़ने की भूख हो।”
वह किताब उसके हाथों में भारी हो रही थी। उस दिन वह समझ गया – किताबों का असली मोल उनकी क़ीमत में नहीं, उनमें छिपे सपनों में होता है।
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7-मंच के पीछे का सच
साहित्य उत्सव की चमकती रोशनी में जब नव्या का नाम घोषित हुआ, तो मंच के पीछे खड़े ‘वरिष्ठ’ कवि-समीक्षकों की आँखों में एक साथ कई चिंगारियाँ भड़क उठीं। उनमें से एक ने उसके कंधे पर हाथ रखा — ‘‘बेटी, तुम्हारी कविताओं में ‘स्त्री- विमर्श’ की गंध है… पर असली विमर्श तो हमारे साथ चाय पर होगा!’’
दूसरे ने उसकी किताब को सूँघते हुए कहा—’‘स्याही सूखने से पहले हमारी भूमिका सूख जाएगी क्या?’’
नव्या ने देखा — मंच पर ‘नारी सशक्तीकरण’ के पोस्टर लगे थे, और पोस्टरों के पीछे छिपे हुए हाथ उसकी चूड़ियों की खनक पर नज़र गड़ाए थे। गोष्ठी के बाद की पार्टी में जब उसने ‘‘नहीं’’ कहा, तो एक संपादक गिलास फेंककर चीखा — ‘‘अरे! ये नई लेखिकाएँ इतनी ‘ऊँची’ क्यों उड़ती हैं?’’अगले दिन अख़बार में छपा — ‘‘युवा लेखिकाओं का अहंकार साहित्य के लिए ख़तरा!’’
तभी ईसुरिया—गाँव की वही बकरियाँ हाँकने वाली औरत—दरवाज़े पर आ धमकी। उसने नव्या की ठुड्डी पकड़कर कहा — ‘‘लिखती है, तो लिख! पर जब तक तेरे शब्दों की नहीं, तेरी देह की नुमाइश नहीं होगी, तब तक ये ‘गिद्ध’ तेरी रचना नहीं, तेरी रजाई उघाड़ेंगे!’’
नव्या ने अगली कविता-गोष्ठी में माइक छीनकर घोषणा की— ‘‘मेरी कविताएँ मेरी देह से ज़्यादा गर्म हैं, जलना है, तो सुनो!’’ उस रात उसके फ़ोन पर एक अज्ञात नंबर से मैसेज आया — ‘‘तुम्हारी किताब की समीक्षा लिख दी है… तुम्हारे ‘साहस’ की नहीं, तुम्हारे ब्लाउज के बटन की!’’
अगले दिन नव्या ने सभी ‘वरिष्ठों’ को एक पार्सल भेजा — उसमें उनकी लिखी किताबें थीं, जिनके पन्नों पर उसने लाल स्याही से लिखा था — ‘‘आपकी रचनाएँ मर चुकी हैं… मेरी देह ज़िंदा है, पर मेरे शब्द आपकी कब्र खोदेंगे!’’
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8-चाबीवाला
सुबह से हरदयाल पेड़ की छाया में बैठा था। उसके सामने लोहे का छोटा-सा साम्राज्य – चमकती चाबियाँ, जंग खाए ताले, धारदार चाकू। हर चीज़ चमक रही थी, सिवाय उसकी आँखों के, जहाँ सालों की थकान जमा थी।
एक आदमी ने चाबी फेंकते हुए कहा – “ज़ल्दी बना दो।”
हरदयाल ने टेढ़ी-मेढ़ी चाबी को देखा। उसकी उँगलियाँ मशीन की तरह चलने लगीं, पर दिमाग़ में एक ही सवाल – “यह चाबी किस दरवाज़े को खोलेगी? मेरा तो कोई दरवाज़ा खोल ही नहीं पाया।”
दोपहर को एक औरत ने ताला थमाया – “यह ख़राब हो गया है।”
हरदयाल ने ताले को पलट-पलटकर देखा। अचानक उसे लगा जैसे वह अपनी ही ज़िंदगी को हाथ में लिए घूम रहा है।
“यह तो टूट गया है,” उसने कहा, “नया ले लीजिए।”
शाम होते-होते उसने अपना सामान समेटा। चाबियाँ अब भी वही थीं, ताले वही, पर उसके हाथों का ज़ख्म नया था। पेड़ की छाया लम्बी हो चुकी थी, जैसे कोई सवाल जो बिना जवाब के लटक रहा हो। वह चल दिया। पीछे छूट गईं वो सारी चाबियाँ जो दूसरों के ताले तो खोल सकती थीं, पर उसके अपने ताले हमेशा के लिए जाम रह गए थे। सड़क के अंतिम मोड़ पर उसने मुड़कर देखा – पेड़ अब भी वहीं खड़ा था, जैसे कोई मूक गवाह जो सब देख रहा हो पर कुछ न कह रहा हो।
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9–दो दोस्त
उसके भीतर दो आत्माएँ रहती थीं – एक जंगली गुरिल्ला, दूसरी डरपोक कायर।
गुरिल्ला सुबह-सुबह उसे झकझोरकर जगाता – “उठो! दुनिया को बदलना है।”
कायर तुरंत उसके कान में फुसफुसाता – “बैठ जाओ, मरोगे क्या?”
दिन बीतते गए। गुरिल्ला धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगा। कायर फूलता गया। एक दिन गुरिल्ला बिल्कुल ही चुप हो गया।
कायर खुश होकर शीशे के सामने खड़ा हुआ। तभी उसे अपनी आँखों में अजीब सी चमक दिखी। वही पुरानी चिंगारी… पर अब और भी तेज।
अचानक उसके होंठों से गुरिल्ले के शब्द फूट पड़े – “अब तैयार हो जाओ।”
वह समझ गया – गुरिल्ला मरा नहीं था। वह कायर के भीतर समा गया था। अब वह न तो पूरा गुरिल्ला था, न पूरा कायर। वह दोनों का मिला-जुला रूप था – एक ऐसा योद्धा जिसमें गुरिल्ले का साहस और कायर की समझदारी दोनों थी।
उस दिन से उसकी लड़ाई का तरीक़ा बदल गया। अब वह बिना सोचे-समझे भागने वाला नहीं था, न ही बिना सोचे-समझे लड़ने वाला। वह जान गया था – असली जीत दोनों के बीच के संतुलन में है।
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10-गोरा पैकेट
वह दुकानदार ने उसे देखा तो झट से अलमारी के पिछले हिस्से से एक डिब्बा निकाला- “यही लो मैडम, विशेष ऑफ़र चल रहा है। गोरा करने वाला नया क्रीम। सात दिन में गोरा। नहीं हुआ तो पैसा वापस।”
उसने डिब्बे को पलटा। एक गोरी औरत हँस रही थी। उसके दाँत मोती जैसे चमकदार थे। उसकी अपनी त्वचा पर धूप के काले धब्बे थे, जो उसकी माँ को विरासत में मिले थे।
“कितना?”
“सिर्फ़ पाँच सौ निन्यानवे। आज खरीदिए तो फ़ेसवॉश फ्री।”
उसके पास बैठी दूसरी औरत ने कहा : “मैं भी लूँगी। मेरी बेटी की शादी है। दूल्हे वाले गोरा चाहते हैं।”
टीवी पर एक विज्ञापन चल रहा था। दो बहनें। एक गोरी, एक साँवली। गोरी वाली की शादी हो गई। साँवली रो रही है। फिर वही क्रीम लगाती है और गोरी हो जाती है। अंत में दोनों हँस रही हैं।
उसने क्रीम ख़रीद ली। घर आकर बाथरूम के शीशे के सामने खड़ी हो गई। उसकी बेटी ने पूछा : “माँ, यह क्या?”
“खुश होने की दवाई बेटा।”
उस रात उसने पति से झगड़ा किया। “तुम्हारी ही काली क़िस्मत ने मेरा रंग खराब कर दिया।” पति ने टीवी की तरफ़ देखा जहाँ एक और विज्ञापन चल रहा था – गोरे बच्चे के लिए चॉकलेट दूध।
अगले दिन वह दुकान पर फिर खड़ी थी। “क्रीम काम नहीं कर रहा।”
दुकानदार ने नया डिब्बा निकाला : “यह लो मैडम, सुपर एक्स्ट्रा व्हाइटनिंग। असली स्विस तकनीक।”
डिब्बे पर दो गोरी औरतें हँस रही थीं। एक दूसरे को गले लगाए हुए। बहनें। उसने पैसे दिए और डिब्बा लेकर चली गई।
घर लौटकर जैसे ही उसने ट्यूब खोली, अंदर से एक नोट निकला : “इस उत्पाद को बनाने वाली साँवली महिलाओं की टीम की ओर से। हमें गोरा बनाने के लिए धन्यवाद।”
ट्यूब के पीछे छपे थे छोटे-छोटे अक्षर : “चेतावनी: यह उत्पाद आपके आत्मसम्मान को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है।”
उसी क्षण टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज आ : “स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी फ़ेयरनेस क्रीम्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। निर्माता कंपनियों पर मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने का मुकदमा दर्ज…”
उसने शीशे में अपना चेहरा देखा। आँखों के नीचे काले घेरे थे । क्रीम के निशान थे। और एक नया भाव – शायद पहली बार, अपने असली रंग को स्वीकार करने का साहस ।
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संप्रति: छ.ग.शासन में वरिष्ठ अधिकारी
संपर्क:एफ-3, आवासीय परिसर, छग माध्यमिक शिक्षा मंडल (पेंशनवाड़ा), रायपुर, छत्तीसगढ़, 492001
ईमेल: srijan2samman@gmail.com