साहित्य में मानवीय मूल्यों का समावेश आवश्यक है । इसे मनुष्यता का उन्नायक और कल्याणकारी होना चाहिए । मेरी पसंद की चुनी हुई दोनों लघुकथाएँ इस दृष्टि से पूर्ण है। यह समाज की विडम्बनाओं पर करारा प्रहार करती हैं और एक सकारात्मक संदेश देती हैं ।
पहली लघुकथा विरेन्द्र वीर मेहता जी की ‘बुनियाद’ है । आज हमारे तंत्र में भ्रष्टाचार इतना रच-बस गया है कि उसका ही एक हिस्सा बन गया है । सरकारी कार्यालयों में बिना रिश्वत के काम नहीं होता । भ्रष्टाचार की एक समानांतर व्यवस्था फल -फूल रही है । इस भौतिकतावादी युग में ज़रूरतें बहुत बढ़ा ली गई है जिन्हें पूरा करने के लिए ‘ऊपर की कमाई’ का इस्तेमाल किया जाता है । यह लघुकथा बताती है कि भ्रष्टाचार के अंधकार में आकण्ठ डूबे तंत्र में कुछ ऐसे दीप बचे रह गए हैं जिनमें ‘तेल से भीगी हुई बाती’ है । रिश्वत के प्रलोभन में न आने वाले अशोक जी का आत्मबल इतना मजबूत है कि वह कहते हैं ‘इस घर में रहने वालों की बुनियाद बहुत मजबूत है, इसे हिलाने की कोशिश करना व्यर्थ है ।’
भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी रूप में लिखने वाले कलमकार की सराहना करनी ही चाहिए । हम व्यवस्था में भ्रष्टाचार को स्वीकारते हुए इतना आगे ना बढ़ जाए कि उसके खिलाफ लड़ने वाला अकेला खड़ा रह जाए । साहित्य का सृजन सोद्देश्य किया जाता है । यहां लेखक यह संदेश देने में सफल है कि अभी कुछ लोग हैं, जो भ्रष्टाचार जैसी बुराइयों से लड़ रहे हैं । ईमानदारी खत्म नहीं हुई है ।
मेरी पसंद की दूसरी लघुकथा वरिष्ठ कथाकार सुकेश साहनी जी की ‘आधी दुनिया’ है। स्त्री- विमर्श पर आधारित यह एक अद्भुत व अद्वितीय रचना है । पितृसत्तात्मक समाज एक स्त्री से इतनी अधिक भूमिकाऐ निभाने की आकांक्षा रखता है, जिन्हें पूरा करने में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है । माँ – बाप का मान रखने व परिवार को टूटने से बचाने के दबाव में एक स्त्री पूरा जीवन खपा देती है । यह कहानी समाज की उस सच्चाई से रूबरू कराती है जिसमें तथाकथित आधुनिक ‘सोसायटी’ आज भी पुरुष ग्रंथि का शिकार है जो स्त्री पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहती है । स्त्री पर इतनी बंदिशे और आकाँक्षायें लाद दी जाती है जिनके बोझ से वह टूट जाती है ।
घर पर स्त्री का व्यवहार संयत व परंपरागत होना चाहिए, जबकि घर के बाहर पार्टियों में एकदम आधुनिक! सास -ससुर के लिए आज्ञाकारी संस्कारी बहू चाहिए; लेकिन शयनकक्ष में पति को विदेशी मैम! बोलने बात करने का तरीका हो या कपड़े पहनने का ढंग, सब पर रोक-टोक! सोने- जागने से लेकर पैसा खर्चने तक सब पर नियंत्रण ! बात-बात पर दहेज को लेकर ताने! एक ओर बेटा न जनने का उलाहना, वहीं दूसरी ओर बेटियों को अपने जैसा न बनाने का दबाव! मायके की खोज – खबर लेने की भी स्वतंत्रता नहीं !
वर्षों तक इन सब में ढलते-ढलते जब मन में कुछ टूटता है और उसकी आवाज उठती है, तो सुनने को मिलता है ‘निकलो मेरे घर से’…………………….. ।
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1-बुनियाद/ विरेंद्र वीर मेहता
अशोक जी फाइलें समेटकर कार्यालय से निकले ही थे कि शहर के प्रमुख कांट्रेक्टर्स में से एक खुराना साहब मिल गए ‘अरे ! अशोक जी आप तो साकेत में रहते हैं ना ! मैं भी उधर ही जा रहा था चलिए आपको ड्रॉप कर दूँ।’ इच्छा ना होते हुए भी अशोक जी उनके साथ चल पड़े। खुराना जी की कार साकेत की ओर दौड़ पड़ी। आपसी वार्तालाप कुशल-क्षेम से होता हुआ उस टेंडर तक पहुँच गया, जो आजकल अशोक जी की फाइलों में बंद था । खुराना जी कुछ मुस्करा कर बोले, ‘अशोक जी यह समाज एक दूसरे के सहयोग से ही चलता है । अब आप हमारे काम आएँगे तो हम आपके काम आएँगे ही ।’
अशोक जी ख़ामोश रहे । वो खुराना जी की उनको लिफ्ट देने की कृपा को पूरी तरह समझ गए थे । घर के पास पहुँचने पर उन्होंने खुराना जी को कार रोकने का इशारा किया । कार एक ओर रोकने के बाद खुराना जी अशोक जी के साधारण और पुराने घर की ओर नजर मारते हुए अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बोले – “बड़े बाबू ! आपके मकान की बुनियाद तो बहुत ही कमजोर है। हमारा साथ दो तो घर का कायाकल्प कर देंगे।”
अशोक जी कार से नीचे उतरे और मुस्कुरा पड़े- “हूँ, खुराना साहब घर छोड़ने के लिए धन्यवाद। एक बात मैं आपको कहना चाहूँगा- इस घर की बुनियाद कमजोर हो सकती है; लेकिन इस घर में रहने वालों की बुनियाद बहुत मजबूत है। इसे हिलाने की कोशिश करना व्यर्थ है।” अपनी बात पूरी करते हुए अशोक जी घर की ओर मुड़ चुके थे ।
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2-आधी दुनिया/सुकेश साहनी
..साड़ी पहनकर दिखाओ, लूज फिटिंग के सूट में फिगर्स का पता ही नहीं चलता…चलकर दिखाओ…लम्बाई? ऐसे नहीं-बिना सैडिंल के चाहिए…मेकअप तो नहीं किया है न? …पार्क में चलो, चेहरे का रंग खुले में ही पता चलता है…बड़ी बहन की शादी में क्या दिया था? … क्या-क्या पका लेती हो? …घर सम्हालना आता है? आज के समय में नौकर-मेहरी रखना ‘सेफ’ नहीं है।
… ‘जयमाल’ के समय सूट पहनना, लहँगा-चोली नहीं चलेगा…डार्लिंग, ये देहाती औरतों वाला अंदाज़ छोड़ दो…आज की रात हम जो कहेंगे, करना होगा…हमसे कुछ मत छिपाना…शादी से पहले किसी से प्यार किया था? …कितना नमक झोंक दिया है सब्जी में! …स्वीट हार्ट! इधर आओ, हमारे करीब…दिनभर की थकान हम अभी दूर किए देते हैं! …चूमने का ये अंग्रेज़ी अंदाज कहाँ से सीखा? तुम तो छिपी रुस्तम निकली! …कैसा खाना बनाया है? देखते ही भूख मर गई।<
…खिड़की पर मत खड़ी हुआ करो…बेमतलब खी-खी मत किया करो! …तुम्हारे घर वालों में ज़रा भी अक्ल नहीं है, इस कूड़े, -कबाड़ की जगह कार ही दे देते। …अक्ल से बिल्कुल पैदल हो! प्यार करने के तरीके इन विदेषी मेमो से सीखो। …कितनी बार कहा है-बेवक्त घर का रोना मत रोया करो, सारा मजा किरकिरा हो जाता है। …मुझसे पहले तुम कैसे सो सकती हो? …दोस्त आएँ, तो उन्हें चाय-पानी के लिए पूछा करो। …दोस्तों के सामने मुँह उठाए क्यों चली आती हो? उनसे ज़्यादा हँस-हँसकर बात मत किया करो।
…बहुत फालतू-खर्च करने लगी हो! …तुम्हारे खानदान में किसी ने बेटा जना है, जो तुम जनोगी! मैं तो फँस गया! …दिन-रात मायकेवालों का जाप मत किया करो। …किसे चाय-पानी के लिए पूछना है, किसे नहीं, ये सब भी सिखाना पड़ेगा तुम्हें? …तुम्हारी बहन की शादी में बहुत माल खर्च कर रहे हैं, हमें तो बहुत सस्ते में ही निबटा दिया था बुढ़ऊ ने।
…आए दिन पर्स उठाकर कहाँ चल देती हो? घर का नाम मत डुबो देना! …बेटियों को चौपट करोगी तुम! भगवान के लिए उन्हें अपने जैसा मत बनाना। …रोजाना माँ को देखने मत चल दिया करो। बुढ़िया के प्राण इतनी आसानी से नहीं निकलने वाले, अब ‘खबर’ आने पर ही जाना। …दिन-रात घुटनों को लेकर ‘हाय-हाय’ करना छोड़ दो। घर में घुसते ही मूड खराब हो जाता है।
…कितनी ठंडी होती जा रही हो दिन-ब-दिन! …मोहल्ले की इन दो टके की औरतों से बात मत किया करो…अब ये रोना धोना बंद करो! माँ के मरने पर नहीं पहुँच सकी, तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा। …ये चोंचले मुझे मत दिखाओ! …ज्यादा अगर-मगर मत करो… शक्की बुढ़िया की तरह ‘बिहेव’ मत करो… दिमाग का इलाज कराओ…सिर मत खाओ…ज्यादा चीं-चपड़ मत करो! मुझसे ऊँची आवाज में बात मत करना…तुम्हारी ये मजाल! …मुझे आँखें दिखाती हो! निकलो…अभी निकलो ‘मेरे’ घर से।
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