
घर में खुशी का माहौल था। सब शालिनी के लिए आए रिश्ते के बारे में बात कर रहे थे। लड़का अच्छे और ऊँचे खानदान का था। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी; लेकिन शालिनी अभी तक उलझन में थी, क्या यहीं काफी था जिंदगी के लिए ?
घर में लगभग सब इस रिश्ते के लिए तैयार थे; पर शालिनी…
शालिनी हर बार की तरह इस बार भी साहित्य में अपनी उलझन का जवाब ढूँढ रही थीं… तभी उसकी नजर एक कहानी पर गई… कहानी में एक पिता अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने के लिए जाता हैं… घर बड़ा और लड़का अच्छा होने के बावजूद वह रिश्ता मना करके आ जाता हैं… अपनी पत्नी के पूछने पर कि आखिर सब कुछ तो था..फिर आप रिश्ते के लिए मना क्यों कर आए !
तब पिता ने कहा,”हाँ ! घर में सब कुछ था लेकिन किताबें नहीं थीं… और मेरी बेटी की अब तक की ज़िंदगी किताबों के साथ बीती हैं… फिर बाकी ज़िन्दगी वो कैसे उनके बगैर बिता लेती ? वहाँ सब था मगर क्या वहाँ ज्ञान का मोल था…क्या वहाँ मेरी बेटी की जिज्ञासाओं, सपनों और आत्म निर्भरता का मान था ?
नहीं न !
बस इसलिए ही मैं मना कर आया।
कहानी के अंत तक शालिनी को अपना जवाब मिल गया था ।
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