नाम?”
“कंजरी।”
“पेशा नहीं, नाम पूछ रहा हूँ।” – डॉक्टर ने दोहराया।
“नाम ही बता रही हूँ साब।” वह सूखी-हँसी हँसी, “बचपन में सड़क पर पड़े कबाड़ को बीनकर घर ले आती, इस-उस से माँगकर खा लेती थी, तो सभी मुझे कंजरी पुकारने लगे। फिर यही नाम पड़ गया।”
“उम्र?”
“तीस।”
“तकलीफ़?”
“चार-छह ईंटें ढोने में ही साँस फूलने लगती है डाक्साब। कुछ दिनों से खाँसी भी रहने लगी है।”
डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप उठाया। डायफ्राम को उसकी कमीज़ उठाए बिना पसलियों और पीठ पर घुमाया। उधर मुँह कर, खाँसने को कहा। बोला, “इन्फेक्शन है। पाँच दिन की दवा लिख रहा हूँ फ़िलहाल। खाना खाने के बाद एक-एक गोली सुबह-शाम लेनी है।”
“जी डाक्साब।”
“गोली खाने के बाद नींद-सी महसूस हो सकती है।” डॉक्टर ने आगाह किया, “ध्यान रखना।”
उसकी बात सुन कंजरी काँप-सी गई। दो पल चुप्पी के बाद गिड़गिड़ाती-सी बोली, “दोनों गोलियाँ रात के खाने के बाद एक-साथ ले लूँ?”
डॉक्टर चौंका। कड़े स्वर में पूछा, “दोनों समय का खाना एक-साथ खा सकती हो क्या?”
“दोनों समय मिलता ही कहाँ है!” वह सहमे स्वर में बोली।
“?” डॉक्टर ने सवालिया अंदाज़ में उसे घूरा।
“मजदूर औरत हूँ साब,” नज़रें झुकाकर उसने धीमे लेकिन सधे स्वर में कहा, “सुबह की गोली नहीं ले सकती। काम के समय हल्क़ा भी झोंका आया तो… दिहाड़ी तो जाएगी ही, इज्जत भी जा सकती है और ज़िन्दगी भी!”
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