हिन्दी गद्य साहित्य की बात करूँ तो इसमें ‘लघुकथा’ मेरी प्रिय विधा है। वर्तमान में लघुकथा अधिक लोकप्रिय विधा बन गई है। लघुकथाओं पर अनेक कार्यक्रम ऑनलाइन-ऑफलाइन होने लगे हैं, अधिवेशन हो रहे हैं, इस पर समय-समय पर विमर्श होते हैं, जो इस विधा के विकास में सहायक हैं। यह सब इस विधा के लिए शुभ संकेत है।
मेरी पसंद की लघुकथाओं की सूची बहुत लम्बी है; परन्तु यहाँ मैं उनमें से दो लघुकथाओं के बारे में चर्चा करूँगी, जो मुझे बेहद पसंद आई हैं, जिनमें से प्रथम रचना सुकेश साहनी जी की ‘हैड एंड टेल’ है । इस लघुकथा में एक खेल को चित्रांकित किया गया है। दो टीम थीं जिनको दो रास्तों में से किसी एक का चयन कर, एक निर्धारित दूरी पर स्थित एक जगह पर पहुँचना था। कथानायक की टीम टॉस जीत जाती है और दो चयनित रास्ते, जिसमें से पहला रास्ता बहुत ही बीहड़ था, उस पर चलते हुए उनको आग उगलते सूरज का सामना करना पड़ता; जबकि दूसरा रास्ता समतल, साफ़-सुथरा था, उसके दोनों ओर घने पेड़ों की छाया थी। उस पर चलते हुए सूर्य की ओर उनकी पीठ रहनी थी।
इसमें से कथानायक की टीम न दूसरे रास्ते का चयन करती है और पलक झपकते ही निर्धारित दूरी को पार कर अपने लक्ष्य तक पहुँच जाती है परन्तु; उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता, जब वे देखते हैं कि उनकी प्रतिद्वंद्वी टीम उस दुर्गम रास्ते से चलकर वहाँ पहले ही पहुँच गई है और जश्न मना रही है। वे पसीने से तर-बतर थे। श्रम की आँच से उनके चेहरे दमक रहे थे। क्योंकि वे धूप उगलते हुए सूरज का सामना करके आये थे, यहाँ यह वाक्य प्रतीकात्मक रूप-से मेहनत और संघर्ष को दर्शा रहा है। मेहनत करने वालों को धूप से डर नहीं लगता, उनके रास्ते में बीहड़ भी उनकी जज्बे को कम नहीं कर सकते और वे हर मुसीबत का सामना करते हुए आगे बढ़ते हैं। उनको फल की चिंता नहीं होती, न हार-जीत उनके लिए मायने रखता है। वे तो बस अपना कार्य करते हैं।
यहाँ कथानायक की टीम जो शोर्ट-कट अपनाती है और सुगम रास्ते का चयन करती है, फिर भी वे हार जाते हैं। तात्त्पर्य यह है कि लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कोई शॉर्ट कट नहीं होता। इंसान वही कामयाब होता है, जो मेहनत करता है और निरंतर प्रयास करता रहता है, बिना रुके, बिना डरे, बिना आलस के, तभी वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। लेखक ने इसी सन्देश को इस लघुकथा के माध्यम से संप्रेषित किया है। शीर्षक भी कथानक के अनुरूप है ।
अब मेरी पसंद की दूसरी लघुकथा कनक हरलालका जी की ‘अनंत लिप्सा’ है। लेखिका ने अपनी उत्कृष्ट कल्पनाशीलता का परिचय देते हुए एक ग्रह के प्राणी को मानव का अध्ययन करते दिखाया है, जिस कारण कथानक एक नए कलेवर में पाठक के समक्ष आता है जो बहुत ही रोचक भी है।
इसकी शुरुआत को ही देखें -मशीनें मानव का अध्ययन कर उसकी विस्तृत जानकारी आकारी प्राणियों को प्रेषित कर रही थी। जिसकी कल्पना करते ही मन-मष्तिष्क अन्तरिक्ष में पहुँच जाता है, जो अपने भीतर आज भी कितने और रहस्य छिपाए हुए है, जिसकी खोज करने के लिए वैज्ञानिक निरंतर प्रयास कर रहे हैं । ‘आगे क्या होने वाला है’ की जिज्ञासा पाठक के मन में उत्पन्न होगी, कि मशीनें किस तरह से मनुष्यों का अध्ययन करने वाले हैं? लेखिका ने अंतरिक्ष में रहने वाले एलिएअन्स को मुख्य पात्र बनाया है, जो पृथ्वीवासियों के राकेट, सैटेलाइट स्टेशनों, अन्वेषणों से हमेशा खतरा महसूस करने लगे थे उनको डर था कि कहीं वे लोग उनपर अधिकार हासिल कर लेंगे ? सर्वप्रथम वे पृथ्वीवासी के मष्तिष्क को देखते है जो उनको उसके इतने बड़े शरीर के हिसाब से बहुत छोटा दिखाई देता है।
मशीन पेट में होने वाले संवेदन को भूख बतलाता है।
तभी कोई एलियन पूछता है, “वहाँ तो कोई ऑर्गन नहीं है, फिर यह भूख क्या चीज है?”
तभी मशीन उनको बताता है कि मानव मस्तिष्क का सारा ध्यान बाकी स्थानों से सिमटकर भूख पर केन्द्रित होता है।
वहाँ एकत्रित सभी प्राणी खुशी और निश्चितता की साँस लेते हैं कि अगर भूख मानव मस्तिष्क की सारी गतिविधियों को निश्चल कर सकता है तो उसके यहाँ पहुँचने की संभावना नहीं है।
तभी एक बड़े मस्तिष्क ने उन्हें सावधान करते हुए कहता है, “तुम लोग गलत सोच रहे हो। जो भूख उसके मस्तिष्क को वश में कर सकती है, वह उससे कुछ भी करा सकती है… दूर तक की यात्रा भी…!”
अन्तिम संवाद इस लघुकथा के उद्देश्य को सिद्ध करता है जो यह संप्रेषित करता है कि मनुष्य के लिए उसका पेट सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है; क्योंकि भूख को मिटाने पर ही मस्तिष्क और उसका शरीर काम करेगा; अन्यथा वह निढ़ाल हो जाएगा। इंसान जो भी कुछ करता है पेट की खातिर करता है और दूसरे अर्थ में यह भी कहा जा सकता है कि वह अपने पेट के खातिर कुछ भी कर सकता है, फिर चाहे उसके लिए उसको किसी अनजानी राह पर भी भेज दिया जाए, वह जाता है। यह फंतासी शैली में लिखी हुई है। प्रस्तुत लघुकथा में मानव प्रकृति के महत्त्वपूर्ण पहलू, भूख और लिप्सा की शक्ति पर प्रकाश डाला गया है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा और भूख की पूर्ति के लिए कार्य करता है, जो अटल सत्य है और यही सच इस लघुकथा से संप्रेषित हो रहा है। सरल, स्वाभाविक भाषा और संवाद कथानक को गति देते हैं और साथ ही पाठक को बाँधे रखते हैं।
1- हैड एंड टेल/सुकेश साहनी
हम खुशी से उछल पड़े, टॉस हमारे पक्ष में गया था। अब उन दो रास्तों में से किसी एक को हम चुन सकते थे। पहला रास्ता बहुत ही बीहड़ था, उस पर चलते हुए हमें आग उगलते सूरज का सामना करना पड़ता, जबकि दूसरा रास्ता समतल, साफ़-सुथरा था, उसके दोनों ओर घने पेड़ों की छाया थी। उस पर चलते हुए सूर्य की ओर हमारी पीठ रहनी थी।
हमने दूसरा रास्ता चुना।
हम बेफ़िक्र थे। टॉस ने हमारा काम आसान कर दिया था। हमने पलक झपकते ही निर्धारित दूरी तय कर ली थी; लेकिन लक्ष्य पर पहुँचते ही हमें शॉक-सा लगा, हमारी खुशी काफूर हो गई।
प्रतिद्वंद्वी टीम उस दुर्गम रास्ते से चलकर हमसे पहले ही वहाँ पहुँचकर जश्न मना रही थी। वे पसीने से तर-बतर थे। श्रम की आँच से उनके चेहरे दमक रहे थे।
हमारे चेहरे बुझ गए थे। हमारे पास अपनी लंबी होती परछाइयों के सिवा कुछ भी नहीं था।
2-अनंत लिप्सा/ कनक हरलालका
मशीनें मानव का अध्ययन कर उसकी विस्तृत जानकारी आकारी प्राणियों को प्रेषित कर रही थी।
अंतरिक्ष में पृथ्वी ग्रह से अड़तीस मिलियन मील दूर एक ग्रह में पृथ्वीवासी, जिसे वे पृथ्वी से उठा लाए थे, उन प्राणियों से घिरा हुआ मशीनों के बीच लिटाया गया था।
अंतरिक्ष में दिन-प्रतिदिन पृथ्वीवासियों के रॉकेट, सैटेलाइट स्टेशनों अन्वेषणों से वे यह खतरा महसूस करने लगे थे कि क्या ये पृथ्वीवासी उनके ग्रह तक भी पहुँच कर उन पर अधिकार कर सकने में सक्षम हो सकेंगे? वह सब उसे घेर कर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।
“अरे! इसका मस्तिष्क तो इसके इतने बड़े शरीर के आकार में बहुत छोटा है।”
“देखो, हाथ और पाँव कितने बड़े हैं।” मशीन ने जिसे हाथ और पाँव बतलाया था उसके आधार पर एक ने कहा।
“और जो बीच में बड़ी-सी चीज है, उसे इसका दिमाग पेट बतला रहा है।”
मशीन ने पेट में होने वाले संवेदन को भूख बतला कर सूचना दी।
“वहाँ तो कोई ऑर्गन नहीं है, फिर यह भूख क्या चीज है?”
तभी मशीन ने दिखलाया कि मानव मस्तिष्क का सारा ध्यान शरीर के बाकी स्थानों से सिमट कर भूख पर केंद्रित हो गया है।
एकत्रित सभी प्राणियों ने खुशी और निश्चितता की साँस ली कि अगर भूख मानव मस्तिष्क की सारी गतिविधियों को निश्चल कर सकता है, तो उसके यहाँ पहुँचने की संभावना नहीं है।
तभी एक बड़े मस्तिष्क ने उन्हें सावधान करते हुए कहा, “तुम लोग गलत सोच रहे हो। जो भूख उसके मस्तिष्क को वश में कर सकती है, वह उससे कुछ भी करा सकती है… दूर तक की यात्रा भी…!”
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