यूरोपेयन महायुद्ध की बात है।बर्लिन-स्टेशन से मुसाफिरों से भरी रेलगाड़ी रेंगती हुई रवाना हुई । गाड़ी में औरतें, बच्चे, बूढ़े–सभी थे; पर कोई पूरा तन्दुरुस्त नज़र न आता था। एक डब्बे में, भूरे बालोंवाला एक फौजी सिपाही एक अध-बूढ़ी स्त्री के पास बैठा था। स्त्री कमज़ोर और बीमार-सी नज़र आती थी। तेज़ चलती हुई गाड़ी के पहियों की किच-किच आवाज़ में मुसाफिरों ने सुना कि वह स्त्री रह-रहकर गिनती-सी गिन रही है–एक-दो-तीन !’
शायद वह किसी गहरे विचार में मग्न थी। बीच-बीच में वह चुप हो जाती, और फिर वही–‘एक – दो – तीन!’
सामने दो युवतियाँ बैठी थीं। उनसे रहा न गया, और वे खिलखिलाकर हँस पड़ीं। साथ ही इस वृद्धा के अजीब बरताव का वे आपस में मज़ाक उड़ाने लगीं।
इतने में एक बुजुर्ग आदमी ने उन्हें झिड़क दिया । कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया ।
‘एक-दो-तीन’-वृद्धा ने कुछ बेसुध-सी हालत में कहा। युवतियाँ फिर भद्दे ढंग से हँस पड़ी।
भूरे बालों वाला सिपाही कुछ आगे की ओर झुका, और बोला- ‘‘श्रीमतीजी, यह सुनकर आपका खिलखिलाना शायद बन्द हो जाएगा कि जिसपर आप हँस रही हैं, वह मेरी स्त्री है। अभी हाल ही में हमारे तीन जवान बेटे लड़ाई में मारे गए हैं। मैं खुद भी लड़ाई पर जा रहा हूँ; लेकिन जाने के पहले इस बेटों की माँ को पागलखाने पहुँचा देना ज़रूरी है।”
सहसा डब्बे में एक भयंकर सन्नाटा छा गया, जैसे सबकी छाती पर साँप लोट गया हो।
[A translation of the short story, ‘In Berlin’ by Mary Boyle O’Reilly ]