स्कूल के बरामदे में रोहन एक बेंच पर बैठा है और कुछ सोच रहा है । रोहन बारहवीं का छात्र है । रमेश रोहन के पास आते हैं । रमेश पचास साल के हैं और स्कूल में चपरासी हैं ।
रमेश ने पूछा, “बेटा, क्या बात है? कुछ परेशान लग रहे हो?”
रोहन ने जवाब दिया, “नहीं अंकल ।”
“कुछ बात तो है? “
“बस सोच रहा हूँ कि बड़ा होकर कुछ असाधारण करूँ । सब कहते हैं कि बड़ा आदमी बनो, नाम कमाओ; लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ?”
“अच्छा! और असाधारण बनने के लिए क्या करना होगा?”
“शायद कोई बड़ा वैज्ञानिक, नेता या फिर करोड़पति बनना होगा । तभी तो लोग पहचानेंगे!”
रमेश रोहन के भोलेपन पर मुस्कुराए बिना नहीं रह पाए ।
स्कूल के मैदान में रमेश एक कोने में खड़े देखते हैं कि कुछ बच्चे लड़ रहे हैं । वह चुपचाप उनके बीच गए और प्यार से समझा दिया । बच्चे तुरंत शांत हो गए। रोहन यह सब देख रहा है ।
रोहन ने रमेश से पूछा, “अंकल, आपने बस दो शब्द बोले और वे लड़ना छोड़कर खेल में लग गए! यह कैसे किया?”
रमेश हँसे, “बेटा, यह कोई बड़ी बात नहीं । बस, समझ और धैर्य की जरूरत होती है। लोग सोचते हैं कि असाधारण वही है, जो दुनिया बदल दे, लेकिन कभी-कभी किसी के दिन को अच्छा बना देना भी असाधारण ही होता है ।”
रोहन के चेहरे पर मुस्कान आ गई ।