पिछले दशक के उत्तरार्द्ध से लघुकथा लेखन में क़दम रखने वाले युवा रचनाकारों में से वाणी दवे भी एक हैं दस्तावेज़। उनकी लघुकथाएँ घर की चार दीवारी से बाहर निकलकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों का ध्यान आकर्षित करती रही हैं । कुछ तो अपने मर्मस्पर्शी कथ्य के कारण बहुप्रशंसित भी हुईं हैं जैसे कि ”तेरी बदसूरत माँ”, ”प्रायवेसी”आदि । अनवरत लिखते रहने का सुपरिणाम यह हुआ है कि वाणी दवे का प्रथम लघुकथा संग्रह ”अस्थायी चार दिवारी” हमारे सम्मुख है । इस संग्रह की लघुकथाओं को एकमुश्त पढ़ लेने के पश्चात हम इनकी कई विशेषताओं की चर्चा कर सकते हैं । कमियाँ तो ख़ैर होती ही हैं, खासकर प्रथम संग्रह में । कुछ लघुकथाओं की विवरणात्मकता असहज लग सकती है। परंतु विश्वास है कि वाणी दवे जैसी प्रतिभाशाली कथाकार शीघ्र ही इस कमजोरी से पार पा लेंगी और विवरण को दृश्य में बदलने का कौशल हासिल कर लेंगी । फ़िलवक्त हम वे चीजें लेते हैं जो वाणी को अन्य लघुकथाकारों से अलग ज़मीन पर खड़ा करती हैं ।
रचनाकार की सबसे बड़ी पूँजी है उसका दृष्टिकोण । प्रायः किसी भी रचना के तीन आयाम होते हैं । क्या(कथ्य), कैसे(शिल्प) और क्यों(दृष्टिकोण) । इनमें से तीसरा आयाम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । प्रथम दोनों तो तीसरे तक पहुँचने के साधन हैं । रचना का तीसरा आयाम अर्थात दृष्टिकोण ही पाठकों को संस्कारित करता है , उनकी समझ में वृद्धि करता है । और यही रचनाकार की परिपक्वता की ओर इशारा करता है । आज कई लघुकथाकार समाज में व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्तियों का चित्रण कर यह उम्मीद करते हैं कि पाठक बुराई को देखकर उससे बचने की चेष्टा करेंगे । बदलाव लाने का यह भी एक तरीका है । निःसंदेह नग्न यथार्थ का कटु चित्रण पाठक के दिमाग को झकझोरता है । परंतु यह उसमें एक प्रकार की वितृष्णा भी उत्पन्न करता है । वाणी दवे प्रायः सकारात्मक जीवन मूल्यों को संवेदनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत करती हैं जिससे उनका संदेश सीधे दिल में उतर जाता है । रंग,विश्वास, दृष्टिकोण, तेरी बदसूरत माँ, बौने पापा के मजबूत कंधे, आई, परिधि, लक्ष्मी, इंटीरियर जैसी कई लघुकथाएँ इस संग्रह में पढ़ने को मिलेंगी जो मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था जगाती हैं । रमानाथ अवस्थी अपनी एक कविता में कहते हैं,””कुछ कर गुजरने के लिए /मौसम नहीं/मन चाहिए।” वाणी जी प्रकारांतर से इसी बात को दृष्टिकोण से जोड़कर कहती हैं । ”दृष्टिकोण” लघुकथा की बीमार चिड़िया पतझड़ के गिरते पत्तों को देख-देख मृत्यु की आशंका से भयभीत हो उठती है । तब उसकी सहेलियाँ उसे अन्यत्र हरे-भरे गुलमोहर के पेड़ पर ले जाती हैं । चिड़िया धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाती है । जब वह पुराने आशियाने में लौटती है तो देखती है कि मौसम तो नहीं बदला था,उसका दृष्टिकोण जरूर बादल गया था । वाणी दवे की लघुकथाएँ इसी सकारात्मक दृष्टिकोण की रचनाएँ हैं जो मनुष्य को जिजीविषा से भरपूर रखती हैं । समालोचक अशोक भाटिया ठीक ही कहते हैं, ”सकारात्मक दृष्टिकोण से लघुकथाएँ लिखते हुए वाणी दवे की सूक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि मानवीय संवेदनाओं को इस तरह अपनी रचना में ले आती है , जिस तरह कुएँ में उतरने पर बाल्टी में बाल्टी-भर पानी आ जाता है ।”
आज के बाजारवादी आत्मकेंद्रिकता के दौर में टूटते-बिखरते सम्बन्धों के बीच वाणी की दृष्टि बार-बार वहाँ टिकती है जहाँ अभी भी रिश्तों की उष्णता बाकी है । ”परिधि” के रामदयालजी,”कीमती” का सेवानिवृत्त पति, ”इंटीरियर” की बहू, ”तमाचा” का बेटा,””जानकी भवन”, ”अंगारा” और”तेरी बदसूरत माँ” की माताएँ, ”बौने पापा” का पिता आदि ऐसे किरदार हैं जो हमें रिश्तों की अहमियत से रूबरू कराते हैं । ये सभी लघुकथाएँ कहीं भीतर तक छू जाती हैं । उदाहरणार्थ ”इंटीरियर” की आधुनिका नई बहू द्वारा ड्राइंग रूम से अपने श्वसुर के स्वर्गीय माता-पिता की पुराने फ्रेम वाली तस्वीर को हटाये जाने पर हम भी उतने ही आक्रोशित हो उठते हैं जितने कि बहू के परिवारजन । परंतु जब डाकिया गिफ्ट पैक लेकर आता है और उसमें से शर्मा जी के माता-पिता की चाँदी के फ्रेम में जड़ी तस्वीर निकलती है तो सभी अभिभूत हो जाते हैं । यह लघुकथा एक तरफ आधुनिकता और परंपरा के पारंपरिक संघर्ष का खूबसूरत समाधान है तो दूसरी तरफ कथा प्रस्तुति का उत्कृष्ट उदाहरण है जिसमें पाठक कथा के उतार-चढ़ाव के साथ बहता चला जाता है । इधर ”परिधि” के अधेड़ रामदयाल जी हिसाब-किताब में जानबूझकर गलतियाँ करते हैं ताकि वयोवृद्ध पिता लाल घेरे लगाकर चिह्नित करें और रामदयाल जी उन घेरों के मध्य स्वयं को सुरक्षित महसूस करें । यह परिवार के बुजुर्गों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का नायाब तरीका है ।”अहमियत” लघुकथा भी रेखांकित करने योग्य है जो देवर भाभी के पवित्र रिश्ते को नए ढंग से परिभाषित करती है ।
वाणी की लघुकथाओं में विषय वैविध्य है । यहाँ एक तरफ घर-परिवार, रिश्ते-नातों के संदर्भ हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक विसंगतियों की भी शिनाख़्त की गई है । गरीब, दबे-कुचले लोगों के संघर्ष,जातिवादी व्यवस्था के दुष्परिणाम(खाई),भ्रष्टाचार(सेटलमेंट) जैसे विषय भी वाणी की नजरों से बच नहीं पाये हैं । यद्यपि इन विषयों पर केन्द्रित लघुकथाएँ कम ही हैं परंतु जो भी हैं उनकी मौलिकता, भावनात्मक तीव्रता और नुकीलापन चौंकाने वाला है ।”उजाले बेचने वाले लोग”, ”अस्थायी चार दीवारी”, ”उसकी ढपली उसका राग”, ”अनाज-तीन दृश्य” लघुकथाएँ अभावग्रस्त किन्तु मेहनतकश लोगों का जीवन-राग है । उजाले बेचने वाले और अस्थायी चार दीवारी में रहने वाले लोगों का जीवट प्रणम्य है । ये लोग दूसरों को उजाला बाँटते हैं , स्वयं अंधेरे में रहते हैं । दूसरों को छत देते हैं, स्वयं खुले आसमान के नीचे सोते हैं । फिर भी प्रसन्न हैं । इनकी ज़िंदादिली से मृतप्राय सी पॉश कॉलोनी जिंदा हो जाती है । ”लंबी खामोशी” और ”किन्नर” की विषयवस्तु लीक से हटकर है । ये दोनों लघुकथाएँ समलैंगिक मानसिकता को विश्वसनीयता के साथ विश्लेषित करती हैं । ”रिस्क” तथा ”उत्तर कार्य” में उन बुजुर्गों का दर्द उजागर हुआ है जिनके पुत्र बड़े पैकेज के आकर्षण में विदेश जा बसे हैं । ”उत्तर कार्य” में उपजी सांस्कृतिक दूरियाँ पिता को इतना आहत करती हैं कि वह जीते जी अपने ही हाथों से मृत्यु बाद के संस्कार निबटा देता है । ”किसकी बलि””, ”प्रायवेसी”, ”टाइल्स”,”फिरकी”, किरदार”, ”पत्थर”आदि लघुकथाएँ भी नयापन लिए हुए हैं । ””पत्थर” का संदेश बहुत अर्थगर्भित है । बार-बार ठोकरों से इधर-उधर उछलने वाला व उपेक्षा का शिकार पत्थर एक दिन प्रतिमा के रूप में स्थापित होकर पूजा जाता है ।
”अस्थायी चार दीवारी” संग्रह की लघुकथाएँ भाषा की दृष्टि से सहज व संप्रेषणीय हैं । इसीलिए ये पाठकों से सीधे संवाद करती प्रतीत होती हैं । वाणी दवे में यह विशेषता है कि वे साधारण सी घटना को भी संवेदना की आँच में पकाकर एक हृदयस्पर्शी लघुकथा में ढाल सकती हैं । वे एक संभावनावान लघुकथाकार हैं । उनसे लघुकथा जगत को बहुत उम्मीद है ।
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अस्थायी चार दीवारी (लघुकथा संग्रह), लेखक-वाणी दवे, प्रकाशक-जैनसन प्रिंटर्स, इंदौर, संस्करण-2016, पृष्ठ-84, मूल्य-रु.150 ; संस्करण:2016
समीक्षक – माधव नागदा,लालमादड़ी(नाथद्वारा)-313301 ;मोब. 09829588494
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