जून 2026

मेरी पसन्दलघुकथा का व्यापक संदेश     Posted: April 1, 2025

लघुकथा एक लोकप्रिय विधा है। इसकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि किसी भी साहित्यिक पत्रिका का अंक हाथ में आते ही सर्वप्रथम लघुकथा ही पढ़ी जाती है, भले ही पन्नों पर इसे सबसे कम महत्त्व और स्थान प्राप्त होता हो। एक अच्छी लघुकथा के लिए भाषा व भाव का जानकार या शब्दों का जादूगर होना ही काफ़ी नहीं है; अपितु आस-पास के राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक वातावरण पर भी पैनी दृष्टि होनी चाहिए। एक संवेदनशील व पैनी दृष्टि रखने वाला लेखक किसी भी विषय को अपनी लघ्हुकथा का कथ्य बना सकता है। लघुकथा यथार्थ की बुनावट है। लघुकथा का  संदेश व्यापक होता है। वह आपको किसी काल्पनिक रूमानी स्थानों की सैर नहीं कराती; अपितु एक खरोंच छोड़ देती है।  लघुकथा के लिए  रचना-कौशल व संवेदनशीलता अनिवार्य हैं। रचना-कौशल न हो तो एक अच्छी विषयवस्तु भी प्रभावहीन रह जाती है। किस प्रकार अल्प परन्तु मारक शब्दों में लघुकथा को बाँधा जाए, यह कौशल अनिवार्य है। दूसरा व संवेदनशीलता की जब उसमें कोई बात न हो, तब तक वह सामान्य  होने के कारण मस्तिष्क पर प्रभाव नहीं छोड़ती।

वास्तव में देखा जाए तो लघुकथा में पाठक के मन के भीतर पैठ बनाने की जबरदस्त क्षमता तभी होती है जब वह पैनी हो। लंबी कहानियों की तरह इसमें कल्पना शक्ति से तैयार किए गए बगीचों में पुष्पों के मध्य घूमने का मौका नहीं दिया जाता: अपितु  पाठक की चेतना को झकझोर देना लघुकथा का प्रमुख उद्देश्य होता है। सामाजिक विसंगतियों, बुराइयों, रूढ़ियों, कुरीतियों, असमानताओं पर प्रहार करने वाली विधा है । उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह बिना हिचके, बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात तो रखे ; परंतु प्रायोजित न हो।

लघुकथाओं की विषयवस्तु में दोहराव एक प्रमुख समस्या है। घूम-फिरकर लघुकथा कुछ चुने हुए विषयों के इर्द-गिर्द ही बुनी जा रहीं हैं। भारतीय समाज का ताना बाना ऐसा है कि न चाहते हुए भी जाति, लैंगिक भेदभाव, रिश्तों की खटास, भ्रष्टाचार, बदलते परिवेश में ही लघुकथा गुम हो जाती है। लघुकथा में दार्शनिक बिंबों का प्रयोग तो बहुत ही कम देखने को मिलता है। लघुकथा लेखन में नवीन विषयवस्तु की भी बहुत आवश्यकता है।

 लघुकथा के क्षेत्र में पहले से स्थापित कई नाम हैं, जिन्होंने क्लासिक लघुकथाएँ लिख दी हैं। यदि वे सब किसी अंग्रेज़ी के लेखक की कलम से निकली होतीं, तो उनकी लोकप्रियता देखने लायक होती।

मेरी पसंद कॉलम के लिए मैंने जिन दो लघुकथाओं का चुनाव किया है- वे हैं हरभगवान चावला जी की ‘त्रासदी’ और रामकरन जी की ‘चर्चा’।

 हरभगवान चावला जी लघुकथा लेखन के क्षेत्र में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी लघुकथाएँ सपाट नहीं हैं, नैतिक संदेश देने वाली लघुकथाएँ नहीं हैं, अपितु वे बिंब के माध्यम से उकेरी गईं सजीव लघुकथाएँ हैं , जो मस्तिष्क पर कई दिनों प्रभाव छोड़ती रहती हैं, मानो कि कोई लघु कला-फ़िल्म देख ली हो। अपनी बात को कम व सटीक शब्दों में, बिम्बों के माध्यम से व्यक्त कर देते हैं। इनकी लघुकथाएँ, हल्ला नहीं मचातीं, बल्कि पाठकों के सदन में हौले से समस्या रखती हैं।

 प्रस्तुत लघुकथा त्रासदी में हरभगवान चावला जी ने पहली ही पंक्ति से स्पष्ट कर दिया है- कटाक्ष, व्यवस्था पर होने वाला है- ‘लोग हाथों में थैले लिए राजमार्ग पर चले जा रहे थे’। राजमार्ग का अर्थ हाइवे या राजा की घर की ओर जाता मार्ग भी हो सकता है। व्यवस्था में बने रहने की कीमत आम नागरिक को ही चुकानी ही पड़ती है। बदले में उसे दिखाने के लिए कुछ रेवडियाँ भी बाँटीं जातीं हैं। लोग रेवड़ी जैसा कुछ पा रहे हैं, जो वास्तव में ‘न पाने’ के बराबर ही है ; पर यह उन्हें दिखता नहीं। वे हँसी -खुशी उस पर बात कर रहे हैं। थैले में ख़ून है, बिल्ली चूहे को खा चुकी है और कुछ हाथ न आकर भी उपहार पाने का इल्जाम सिर पर है। निज़ाम को सिर बिठाए रखने की त्रासदी झेलना ही है।

थैले में मिलने वाली दूसरी वस्तु की संभावना पर विचार किया जाता है,  तो साँप का नाम आता है। मतलब,  सरकार की सेवा में सारे कर चुकाने के बाद भी, सारी देशभक्ति वाली नियमावली पूर्ण करने  के उपरांत भी,  किस कल्याणकारी योजना का सर्पदंश आपको आ लगेगा, आपको अंदाजा भी नहीं।

इस लघुकथा का जहाँ पर समापन किया गया है, वह इसकी सुंदरता है। इसमें सीधे-सीधे कुछ भी न कहकर, पाठक के विवेक पर बहुत कुछ छोड़ दिया गया है। आप निज़ाम के प्रिय हैं, सोना-चाँदी आपको उपहार में मिलता है, तो अवश्य ही आपकी थैली में ख़ून लगा दिख नहीं रहा होगा; परंतु इस बात की पूरी संभावना है कि ख़ून आपके हाथ में ही लगा हो, और यह त्रासदी एक आम ईमानदार आदमी की त्रासदी से कहीं अधिक बढ़कर है।

दूसरी लघुकथा है- रामकरन जी की चर्चा, जो कि कथादेश लघुकथा- प्रतियोगिता में विजेता लघुकथाओं में से थी। रामकरन जी की लघुकथाओं के विषयों में नवीनता स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। यदि उन्होंने कोई पहले से प्रचलित विषय उठाया भी है, तो उसे अपने ढंग से एक नया कोण देकर प्रस्तुत किया है। उनकी सोच का दायरा व्यापक है। उनके पास भाषा-प्रवाह भी बहुत सुंदर है। उनकी लघुकथा ‘चर्चा’ भारतीय सामाजिक परिवेश में जड़ें जमाये रूढ़िवादी सोच और जाति प्रथा पर जमकर प्रहार करती है। यह दिखाती है कि इन गहरी जड़ों को नोचकर न फेंक पाने में शिक्षा भी असमर्थ है। शिक्षा के माध्यम से समाज में सुधार लाने का प्रयास करते शिक्षक की स्थिति ‘अकेला चना भाड़ क्या फोड़ पाएगा’ जैसी है। वह शिक्षित तो कर सकता है; परंतु समाज के ताने-बाने और उसकी सोच को परिवर्तित नहीं कर सकता। एक कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का शिक्षक होना उसकी दूसरी पहचान है, पहली पहचान जाति, उसकी आर्थिक स्थिति, उसकी सामाजिक हैसियत ही है। मास्टर साहब पूर्ण मनोयोग से पढ़ाने के उपरांत, उस पर फीडबैक पाने के लिए उस छात्र की तरह उत्साहित हैं, जिसका परीक्षा के बाद परिणाम आने वाला हो। एक- एक करके वह कई प्रश्न अपने छात्रों के समक्ष इस आस में रखते हैं कि गाँव में उनकी विद्या की, उनकी मेहनत की चर्चा तो होती ही होगी; पर गाँववासी उनके परिवार, उनकी जाति, उनकी आर्थिक स्थिति, उनके इतिहास की चर्चा में ही व्यस्त हैं। यह सड़ी-गली रूढ़ियों पर मारक प्रहार करने वाली लघुकथा है।

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1-त्रासदी / हरभगवान चावला

लोग हाथों में थैले लिए राजमार्ग पर चले जा रहे थे। ये थैले उन्हें निज़ाम ने दिये थे। एक थैले वाले को देखकर एक और थैले वाला आदमी चौंका, “अरे, तुम्हारे थैले में से ख़ून जैसा क्या टपक रहा है?”

उस आदमी ने थैले को देखा और कहा, “ख़ून जैसा नहीं, यह ख़ून ही है। लगता है थैले की बिल्ली ने चूहे का काम तमाम कर दिया है।”

“यह क्या? तुम्हारे थैले में चूहा और बिल्ली हैं! यह तो मज़ाक ही हो गया तुम्हारे साथ। मज़ाक क्या, त्रासदी ही हो गई!” पहला हँसा।

“तुम्हारे थैले में क्या है?” दूसरे ने पूछा।

“पता नहीं।”

“हो सकता है साँप हो। थैले को सावधानी से खोलना, ऐसा न हो कि थैला खोलते ही साँप तुम्हें डस ले।”

“हँ… हँ… हँ… क्या बात करते हो? मेरे थैले में ज़रूर सोना होगा या हीरे। जानते नहीं मैं निज़ाम के प्रति कितना वफ़ादार हूँ और निज़ाम की मुझ पर कितनी कृपा है।”

“ओह, फिर तो तुम्हारी त्रासदी मुझसे बड़ी है।”

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2- चर्चा/ रामकरन

बहुत साल बाद बदली होकर मास्टर जी करीब के गाँव में आ पाए थे। मास्टर तो पुराने थे, पर नये स्कूल में आने के कारण नये वाले मास्टर थे। बच्चे उन्हें ऐसे देखते जैसे कि टोह ले रहे हों। वे कोशिश करते कि छात्रों को इस तरह पढ़ाएँ  कि उन्हें लगे कि ये वाले मास्टर जी कुछ अलग हैं।

कुछ दिन छात्र उनसे  खुलकर बातचीत करने में हिचकिचाते रहे, इसलिए वे ख़ुद उनसे ज्यादा बात करते। उनसे उनकी रुचियों एवं पसन्द पर बात करते। कुछ हल्की बातों और चुटकुलों से कक्षा का माहौल तनावरहित बनाने की कोशिश करते। बच्चे दाँत निकालकर ठठाकर हँसते, तो उन्हें अच्छा लगता। कुछ ही दिनों में उन्हें लगा कि अब छात्रों ने उन्हें अपना लिया है। खुलकर पढ़ाई और बातचीत होने लगी। उनकी इच्छा होती कि छात्र ख़ुद बताएँ  कि उनका पढ़ाया, उन्हें क्या अच्छा लगा, क्या नहीं। जब खुद किसी छात्र ने उन्हें यह पुरस्कार नहीं दिया, तो उनके अंदर का कीड़ा कुलबुलाने लगा।

एक दिन मास्टर साब ने स्वयं बात छेड़ दी। बात चली तो गाँव-कस्बे से होते हुए परिवार-परिचय पर चली गई। छात्रों और मास्टर साब के बीच की जो खाई थी, मिट गई। एक छात्र बोला –“सर, हमे पता है कि आप किस गाँव के हैं।”

“अच्छा! और क्या जानते हो?” उन्होंने उत्सुकता पूर्वक पूछा।

“आप गाँव में नहीं शहर में रहते हैं।”

“और?”

“आप कितने भाई हैं।”

“अच्छा..”- वे हौले से मुस्कराए।

एक छात्र बोला –“हम लोगों को आपकी जाति भी पता है।”

उन्हें हल्का झटका लगा। उन्होंने अपने नाम के आगे – पीछे कोई जाति सूचक उपसर्ग-प्रत्यय लगाया नहीं था। फिर भी उन्होंने पूछा- “और?”

“पहले आप बहुत गरीब थे।’’

“अच्छा…।”

“आपके पिता जी शराब पीते  थे….।”

मास्टर साब को ऐसा लगा कि उनके कान गर्म हो गए। तभी एक छात्र ने कहा –“और आप की दूसरी शादी हुई है।”

मास्टर साब के कान में सीटियाँ  बजने लगी। पर खुद को सँभालकर पूछे –“इतना सब कैसे जान गए आप लोग?”

“गाँव में सब लोग बात करते हैं।”

“मेरे बारे में?”

“हाँ।“

“और जो मैं पढ़ाता हूँ, उस पर भी कोई चर्चा होती है?”

“…….”

सब छात्र एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।

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