
दिनेश अपने कार्यालयीन रणक्षेत्र में फाइलों की कँटीली झाड़ियों से जूझ रहा था, तभी फोन की घंटी ने उसे युद्धस्थल से खींच लिया। उधर से मोहिनी की मीठी, किंतु संकोचभरी वाणी आई, “सुनो, एक बात है, गुस्सा तो नहीं करोगे ?” दिनेश, जो स्वभाव से व्यंग्य के महारथी थे, बोले, “अरे गृहलक्ष्मी, आज्ञा करो। आप ही तो इस साम्राज्य की अधिष्ठात्री देवी हैं। घर हो या ऑफिस, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।’’
मोहिनी ने गला खंखारते हुए कहा, “आज हमारी बिल्डिंग में एक बंगाली साड़ी बेचने वाला आया था। सभी ने उससे साड़ियां खरीदीं, तो मैंने भी एक ले ली। किंतु… थोड़ा सा दाम ज्यादा था।”
दिनेश, जो व्यंग्य की कटार चलाने में निपुण थे, मुस्कराकर बोले, “गृहदेवी, यह तो आपका सामंतवादी अधिकार है। जो भी आपकी दृष्टि को भाए, वह हमारे खजाने से बाहर न जा सके। आपसे कोई पूछताछ कौन कर सकता है ?”
मोहिनी ने राहत की साँस ली और स्वर में एक नई ऊर्जा भरते हुए बोली, “यदि ऐसा है, तो वह गुलाबी साड़ी भी ले लूँ ? उस पर तो मेरा दिल ही आ बैठा है।”
दिनेश ने आँखें बंदकर लंबी सांस ली और बोला, “गृहलक्ष्मी, जब सिंहासन का भाग्य आपके हाथों में है, तो यह छोटी-छोटी साड़ियाँ तो सत्तानशीं होंगी ही। कृपया अपनी अभिलाषा पूर्ण करें। आपके इस प्रसाद से राज्य का कोष किंचित हल्का अवश्य होगा, पर आपकी मुस्कान इसे भारी कर देगी।” मोहिनी ने प्रसन्नचित्त होकर फोन रख दिया और गुलाबी साड़ी खरीदने निकल पड़ी।
इधर दिनेश अपनी मेज की फाइलों को समेटते हुए सोचने लगा, “अमूल्य साड़ी-युद्ध का यह प्रसंग मुझे महान कथाओं की याद दिला रहा है। एक साड़ी पर चर्चा आरंभ हुई और देखते ही देखते यह प्रसंग दूसरी साड़ी तक पहुँच गया। परन्तु, यदि अधिष्ठात्री प्रसन्न हैं, तो कोषागार के क्षरण का क्या गम। हाँ ! पर …. यदि मैं मना करता भी, तो क्या मोहतरमा दूसरी साड़ी न लेती ? ……..ऐसा तो सपने में भी नहीं हो सकता था !!
अब वह घर जाने की तैयारी करने लगा। महाभारत का एक और अध्याय बिना किसी युद्ध के समाप्त हो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। उसके चेहरे पर व्यंग्य और संतोष की मिली-जुली मुस्कान थी। वह अपना थैला उठाए ऑफिस से घर की ओर निकाल पड़ा था।
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