
ऑफिस से घर आकर विभोर ने देखा कि आज भी डाइनिंग टेबल पर, अंकित की पसंद की ढेर सारी खाने की चीजें रखी हुई थी; लेकिन अंकित कुछ भी ठीक से नहीं खा रहा था। विभोर को देख रति परेशान होते हुए उससे बोली- “देखो यह इनमें से कुछ भी नहीं खा रहा। इसकी पसंद की हर चीज़ ऑर्डर करके देख ली। पहले इन्हीं चीजों से कितना ख़ुश रहता था। टिफिन में सैंडविच और ब्रेड भी ऐसे ही वापस ले आता है। आजकल न जाने क्या शौक चढ़ गया है, पता नहीं किसके घर के बने पराठे टिफ़िन में घर लाकर खाता है। ”
“क्या बात है अंकित? तुम यह खाना क्यों नहीं खा रहे? क्यों माँ को परेशान कर रखा है?”
“पता नहीं क्या हो गया है इसको। इसके टिफ़िन से रोज़ अचार की अज़ीब- सी महक आती है। पता नहीं किसके टिफ़िन का खाना खाता है। मैं बाजार से इतना महँगा सब कुछ मँगवाती हूँ और यह न जाने किसके यहाँ का अन हाइजीनिक खाना खा लेता है।” रति का गुस्सा चरम पर था।
अंकित सिर झुकाए चुपचाप बैठा था।
“देखो न विभोर। मैं भी ऑफिस से थकी-हारी आई हूँ। आजकल न मीना के हाथ का खाना खा रहा है, न बाजार का। कभी मिर्च तेज बताता है, कभी नमक कम। मैं क्या करूँ?” रति रूँआसी हो उठी।
“क्या बात है अंकित? तबियत ठीक नहीं क्या बेटा? चलो डॉक्टर को दिखा दें। ”
“मैं ठीक हूँ पापा। मुझे अभी भूख नहीं हैं। दादी कब आएँगी?” अंकित धीरे से बोला।
“जब से मम्मी आकर यहाँ रहकर वापस गईं हैं। यह ऐसे ही परेशान कर रहा है। जाने क्या जादू कर गईं मेरे बच्चे पर। अब दादी को बुलाने की रट लगा रखी है।।’’रति गुस्से में बोली।
“बेटा! तुम्हारा स्कूल है। मेरा और तुम्हारी मम्मी का ऑफिस भी है। हम अभी कैसे चल सकते हैं? छुट्टी में ज़रूर चलेंगे। तब दादी को साथ ले आएँगे। प्रॉमिस बेटा। शाबाश अब खाना खा लो। देखो मम्मी ने बाहर से भी कितना कुछ मँगवा लिया। और किस बात की कमी है हमारे घर जो तुम दूसरों के टिफिन का खाना खाते हो?”
“उसकी मम्मी रोज़ अपने हाथों से खाना बनाती हैं, जिसमें मुझे दादी के हाथ के खाने की खुशबू आती है। ” कहकर अंकित अपने कमरे में चला गया।
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